📍 नई दिल्ली
🗓️ 21 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
दिल्ली की अदालत ने सोनिया गांधी के मतदाता सूची मामले में FIR और जांच की मांग खारिज करने वाले मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले में नए सिरे से विचार का रास्ता खोला है।
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के मतदाता सूची से जुड़े मामले में दिल्ली की अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने उस मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी का नाम भारतीय मतदाता सूची में शामिल किए जाने से जुड़े आरोपों की जांच और FIR के अनुरोध को आगे बढ़ाने से इनकार किया गया था।
अदालत के ताजा आदेश के बाद मामला फिर से मजिस्ट्रेट के सामने जाएगा। इसका अर्थ यह है कि FIR दर्ज करने का अंतिम आदेश अभी नहीं हुआ है। अब संबंधित अदालत को मामले पर नए सिरे से विचार करना होगा।
मामला सोनिया गांधी के नाम के पुराने मतदाता रिकॉर्ड में शामिल होने से जुड़े आरोपों का है। शिकायतकर्ता अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले मतदाता सूची में दर्ज था।
याचिका में इस आधार पर जांच और FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि सोनिया गांधी की भारतीय नागरिकता वर्ष 1983 में हुई, जबकि उनका नाम इससे पहले के मतदाता रिकॉर्ड में दिखाई देता है। इस दावे को लेकर उन्होंने आपराधिक जांच की मांग की।
यह आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं है। मामले में अदालत को यह तय करना है कि शिकायत के आधार पर आपराधिक जांच के लिए पर्याप्त आधार बनता है या नहीं।
इस मामले में मजिस्ट्रेट अदालत ने 11 सितंबर 2025 को FIR दर्ज करने की मांग खारिज कर दी थी। अदालत ने उस समय शिकायत के आधार पर जांच का आदेश देने से इनकार किया था।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने इस आदेश को सत्र अदालत में चुनौती दी। पुनर्विचार याचिका में दलील दी गई कि मामले में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जांच की जरूरत है।
सोनिया गांधी की ओर से अदालत में इस शिकायत का विरोध किया गया। उनके वकीलों ने शिकायत और पेश किए गए दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए थे। अगस्त 2026 में सुनवाई के दौरान उनकी ओर से यह भी कहा गया था कि शिकायत राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है।
21 सितंबर 2026 को दिल्ली की अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि पुराना आदेश पर्याप्त कारणों के साथ नहीं था और उसमें मामले पर समुचित विचार नहीं किया गया।
अदालत ने आदेश को गैर-स्पीकिंग बताते हुए यह भी कहा कि उसमें कानून से जुड़ी गंभीर त्रुटि थी। विशेष रूप से शिकायत को पर्याप्त विवरण नहीं होने के आधार पर खारिज करने के तरीके पर अदालत ने आपत्ति दर्ज की।
जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेजने का निर्देश दिया है, ताकि सभी दलीलों पर फिर से विचार किया जा सके और कारणों के साथ नया आदेश पारित किया जाए।
नहीं। यह अंतर महत्वपूर्ण है।
अदालत ने पुराने आदेश को रद्द किया है। इससे FIR अपने आप दर्ज नहीं हुई है। अब मजिस्ट्रेट को मामले पर दोबारा विचार करना होगा।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज हो चुकी है। मौजूदा स्थिति यह है कि FIR की मांग पर निचली अदालत को नए सिरे से निर्णय लेना है।
शिकायतकर्ता की दलील पुराने मतदाता रिकॉर्ड और सोनिया गांधी की नागरिकता की तारीख के बीच कथित अंतर पर आधारित है। शिकायत में कहा गया कि उनका नाम 1980 के मतदाता रिकॉर्ड में शामिल था, जबकि भारतीय नागरिकता 1983 में हासिल हुई थी।
शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत में कथित दस्तावेजी अनियमितता और जांच की जरूरत का मुद्दा उठाया। दूसरी ओर, सोनिया गांधी की तरफ से इन आरोपों और दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर आपत्ति जताई गई।
इसलिए मामले का अगला चरण दस्तावेजों और कानूनी आधार की न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करेगा।
दिल्ली अदालत के आदेश के बाद अब मजिस्ट्रेट अदालत को शिकायत पर नए सिरे से विचार करना होगा। अदालत यह देखेगी कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर पुलिस जांच या FIR का निर्देश देने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद है या नहीं।
यदि मजिस्ट्रेट जांच का आदेश देते हैं, तो पुलिस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच कर सकती है। यदि अदालत फिर से FIR की मांग खारिज करती है, तो उस आदेश को कानून के तहत आगे चुनौती देने का रास्ता भी खुला रहेगा।
इस स्तर पर किसी भी पक्ष को दोषी मानना जल्दबाजी होगी। अदालत ने अभी आरोपों की सत्यता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
सोनिया गांधी से जुड़ा यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में मतदाता सूची और मतदाता रिकॉर्ड की शुद्धता को लेकर व्यापक कानूनी और राजनीतिक बहस चल रही है। दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर भी अदालतों में याचिकाएं और दलीलें चल रही हैं।
हालांकि सोनिया गांधी से जुड़ा यह मामला एक अलग न्यायिक कार्यवाही है। इसे दिल्ली में चल रही व्यापक मतदाता सूची समीक्षा प्रक्रिया के साथ सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा।
ताजा आदेश का सबसे बड़ा असर यह है कि वर्ष 2025 में बंद हुआ कानूनी रास्ता फिर खुल गया है। शिकायतकर्ता को अब मामले पर दोबारा सुनवाई का अवसर मिला है।
लेकिन यह आदेश अपने आप में सोनिया गांधी के खिलाफ आरोपों की पुष्टि नहीं करता। अदालत ने पुराने मजिस्ट्रेट आदेश की कानूनी प्रक्रिया और उसके कारणों की समीक्षा की है।
अब अगला महत्वपूर्ण पड़ाव मजिस्ट्रेट अदालत का नया आदेश होगा।
सोनिया गांधी के मतदाता सूची मामले में दिल्ली अदालत के 21 सितंबर 2026 के आदेश ने कानूनी प्रक्रिया को एक बार फिर सक्रिय कर दिया है। मजिस्ट्रेट द्वारा FIR और जांच से इनकार करने वाला पुराना आदेश रद्द हो चुका है और मामले पर नए सिरे से विचार का निर्देश दिया गया है।
फिलहाल FIR दर्ज होने की पुष्टि नहीं है और आरोप भी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। आगे की दिशा मजिस्ट्रेट अदालत के नए आदेश और उसके बाद होने वाली कानूनी कार्यवाही से तय होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।