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संसद में विपक्ष का हंगामा: लोकतंत्र की गरिमा बनाम राजनीतिक रणनीति?

None 2025-07-22 16:28:03
संसद में विपक्ष का हंगामा: लोकतंत्र की गरिमा बनाम राजनीतिक रणनीति?

संसद में विपक्ष का हंगामा, शून्यकाल लगातार बाधित

मानसून सत्र: संसद में बहस नहीं, सिर्फ बवाल

मानसून सत्र के दूसरे दिन भी संसद में हंगामा, विपक्ष की नारेबाजी से शून्यकाल बाधित, कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी।

New Delhi (Shah Times) ।लोकसभा का मानसून सत्र हमेशा से अहम राजनीतिक और नीतिगत फैसलों के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बार संसद के दोनों सदनों में जो हुआ, वह नीतियों से अधिक टकराव और रणनीति का प्रतीक बन गया है। मंगलवार को एक बार फिर शून्यकाल और प्रश्नकाल जैसे लोकतांत्रिक मंच विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गए।

 क्या हुआ संसद में?

मंगलवार को संसद की कार्यवाही दो बार स्थगित की गई। पहली बार सुबह 11 बजे शुरू होते ही हंगामे के चलते, फिर 12 बजे के बाद जब दोबारा शुरू हुई तो विपक्षी सदस्य नारेबाजी और तख्तियों के साथ वेल में पहुंच गए। अंततः पीठासीन अधिकारी को अपराह्न 2 बजे तक सदन स्थगित करना पड़ा।

विपक्षी सदस्य "ऑपरेशन सिंदूर" पर विस्तृत चर्चा की मांग कर रहे थे, जिसे सरकार ने स्वीकार भी कर लिया। लेकिन इसके बावजूद हंगामा थमा नहीं। कार्य मंत्रणा समिति की सहमति से इस मुद्दे पर 16 घंटे की चर्चा तय की गई थी। बावजूद इसके, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दल लगातार नारेबाजी करते रहे।

सरकार की प्रतिक्रिया

संसदीय कार्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और किरेन रिजिजू ने सदन में साफ तौर पर कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार है। उन्होंने अपील की कि विपक्षी सदस्य तख्तियां न लाएं और सदन की मर्यादा बनाए रखें। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी बार-बार विपक्ष को शांत होने को कहा लेकिन कोई असर नहीं हुआ।

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विपक्ष की रणनीति या जनहित की चिंता?

विपक्ष का दावा है कि वह जनता की आवाज़ उठा रहा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दल सरकार पर संवेदनशील विषयों पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि अगर चर्चा की सहमति बन गई है, तो फिर हंगामा क्यों?

क्या यह केवल मीडिया अटेंशन पाने की रणनीति है? या यह संदेश देने की कोशिश कि सरकार पर दबाव बनाए रखना जरूरी है?

 लोकतंत्र में संवाद बनाम प्रदर्शन

भारत का संसद भवन विचारों के आदान-प्रदान का पवित्र मंच है। हां, विपक्ष का हक है कि वह सरकार से जवाब मांगे, लेकिन यह अधिकार तब तक है जब तक वह संसद की प्रक्रिया में रुकावट न बने।

यदि हंगामा ही एकमात्र साधन बन जाए, तो इससे देश की लोकतांत्रिक परंपरा पर आंच आती है। करोड़ों रुपये करदाताओं के खर्च पर चलने वाली कार्यवाही यदि बाधित हो, तो उसकी जवाबदेही किस पर होगी?

ऑपरेशन सिंदूर पर सरकार की सहमति

"ऑपरेशन सिंदूर" एक संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है, जिस पर देश भर की निगाहें हैं। कार्य मंत्रणा समिति द्वारा 16 घंटे की बहस तय करना यह दर्शाता है कि सरकार गंभीरता से चर्चा के लिए तत्पर है।

लेकिन विपक्ष का यह कहना कि सरकार केवल दिखावे के लिए तैयार है, और असल मुद्दों से भाग रही है, इसे प्रमाणित करने के लिए विपक्ष को बहस में भाग लेना चाहिए ना कि वेल में जाकर शोर मचाना।

राज्यसभा में भी हालात बिगड़े

राज्यसभा में भी उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की घोषणा के दौरान विपक्षी दलों ने हंगामा किया। पीठासीन उपसभापति घनश्याम तिवाड़ी ने गृह मंत्रालय की अधिसूचना पढ़ी, जिसमें धनखड़ के इस्तीफे की पुष्टि की गई।

उपराष्ट्रपति का इस्तीफा एक संवैधानिक घटना है, लेकिन उसका सम्मान विपक्ष के व्यवहार से कमतर होता दिखा। इससे संसदीय गरिमा पर सवाल उठते हैं।

 राजनीतिक संदेश और आगामी रणनीति

कांग्रेस की संसदीय दल की बैठक से स्पष्ट होता है कि विपक्ष इस सत्र में पूरी तरह आक्रामक रुख अख्तियार करने वाला है। मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के नेतृत्व में यह तय किया गया है कि सरकार को हर मुद्दे पर घेरे रखा जाए।

राज्यसभा के सभापति पद से धनखड़ का इस्तीफा और उनके स्वास्थ्य कारणों का हवाला भी सियासी चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या यह केवल स्वास्थ्य कारणों तक सीमित है या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक संदेश है?

 सोशल मीडिया और जनमानस

संसद में जो कुछ भी होता है, वह अब सीधे सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुंचता है। जनता यह देख रही है कि किस दल का व्यवहार कैसा है।

यदि विपक्ष मुद्दे उठाता है और उस पर बहस में भाग नहीं लेता, तो उसकी साख को नुकसान होता है। वहीं सरकार भी यदि केवल "हम तैयार हैं" कहकर जिम्मेदारी से बचती है, तो वह भी आलोचना से नहीं बच सकती।

 निष्कर्ष: संवाद ही समाधान

भारत का लोकतंत्र बहस और संवाद पर टिका है। संसद में हर पक्ष को बोलने का अधिकार है, लेकिन शोर और तख्तियों से नीतियां नहीं बनतीं।

सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष की बात गंभीरता से सुने और विपक्ष को चाहिए कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर अपनी बात को मजबूत बनाए।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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