📍 कानपुर, उत्तर प्रदेश
🗓️ 21 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य की सियासत में गठबंधन और सामाजिक समीकरणों को लेकर हलचल तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कानपुर में विपक्षी दलों को साथ आने की पेशकश की और कहा कि भाजपा को सत्ता में लौटने से रोकने के इच्छुक दल उनसे बातचीत करें। इसी दौरान उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी के पक्ष में बात करते हुए समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधा।
ओवैसी का यह रुख ऐसे वक्त सामने आया है, जब अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज है। दोनों नेता पहले गठबंधन में साथ रहे हैं, लेकिन अब अलग राजनीतिक खेमों में हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में जाट और मुस्लिम मतदाताओं के बीच रिश्तों तथा अलग-अलग दलों की राजनीतिक पहुंच को लेकर यह विवाद खास अहमियत रखता है।
ओवैसी ने क्या कहा?
कानपुर में जनसभा और मीडिया से बातचीत के दौरान ओवैसी ने जयंत चौधरी को अपना मित्र बताया। उन्होंने कहा कि वह जयंत चौधरी से मिलते रहते हैं और उनके भाजपा के साथ जाने से राजनीतिक असहमति रखते हैं। साथ ही उन्होंने अखिलेश यादव की ओर से जयंत को लेकर की गई टिप्पणी के लहजे पर आपत्ति जताई।
मामला उस बयान से जुड़ा है, जिसमें अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को लेकर चवन्नी का संदर्भ दिया था। इस टिप्पणी के बाद जयंत ने भी अखिलेश पर पलटवार किया। जयंत ने कहा कि अगर उनके पास पुराने गठबंधन से जुड़ी बातें हैं तो वह उन्हें सार्वजनिक कर सकते हैं। दोनों नेताओं के बीच सीट बंटवारे और पुराने गठबंधन को लेकर भी बयानबाजी हुई है।
ओवैसी ने इसी विवाद के बीच जयंत के पक्ष में बात की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी नेता के बारे में इस तरह की भाषा इस्तेमाल करना उचित नहीं है। उनके बयान का सीधा राजनीतिक असर यह है कि वह अखिलेश और जयंत के बीच चल रही खींचतान को अपने संदेश के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
गठबंधन को लेकर ओवैसी का खुला प्रस्ताव
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों को गठबंधन का खुला प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि जो दल भाजपा को लगातार तीसरी बार सरकार बनाने से रोकना चाहते हैं, उन्हें साथ आकर चुनावी रणनीति बनानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एआईएमआईएम अपने गठबंधन को लेकर 2 अक्टूबर तक फैसला करेगी।
इससे पहले भी ओवैसी उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभावना की बात कर चुके हैं। जुलाई 2026 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ भी गठबंधन की इच्छा जताई थी। उस समय उन्होंने भाजपा को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए विपक्षी एकता की जरूरत बताई थी।
एआईएमआईएम की रणनीति क्या है?
एआईएमआईएम ने इस बार उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दिया है। पार्टी ने राज्य के कई हिस्सों में जनसभाएं शुरू की हैं। जून 2026 में पार्टी की चुनावी तैयारी के दौरान करीब 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना की खबर सामने आई थी। हालांकि पार्टी ने गठबंधन का विकल्प खुला रखा था।
सितंबर में ओवैसी ने बहुजन समाज पार्टी समेत अलग-अलग दलों के साथ संभावित तालमेल की संभावना खुली रखी। अब उनका नया संदेश व्यापक विपक्षी गठबंधन की ओर है। हालांकि किन दलों के साथ सीटों का समझौता होगा, इसका अंतिम खाका अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
अखिलेश के लिए मुद्दा कितना अहम?
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ पर अपनी चुनावी रणनीति आगे बढ़ा रही है। पार्टी ने बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की तैयारी शुरू की है। अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं को व्यापक संगठनात्मक अभियान के लिए दिशा-निर्देश दिए हैं।
ऐसे में एआईएमआईएम की सक्रियता सपा के लिए एक अलग राजनीतिक चुनौती पैदा करती है। लेकिन किसी दल के वोट पर वास्तविक असर का आकलन चुनावी आंकड़ों, उम्मीदवारों, सीटों के बंटवारे और स्थानीय स्तर के संगठन को देखकर ही किया जा सकता है।
ओवैसी के साथ गठबंधन होने की स्थिति में भी उसका असर पूरे उत्तर प्रदेश में एक जैसा होगा, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय मुद्दे और विपक्षी दलों के बीच सीट समायोजन अहम भूमिका निभाते हैं।
जयंत चौधरी वाला मोर्चा क्यों महत्वपूर्ण है?
जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभाव रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख हैं। उनकी पार्टी इस समय भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है। इसी वजह से ओवैसी का जयंत के प्रति नरम रुख और भाजपा के साथ उनके गठबंधन पर असहमति, दोनों बातें एक साथ सामने आई हैं।
अखिलेश और जयंत के बीच मौजूदा विवाद पुराने राजनीतिक रिश्ते की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव में साथ चुनाव लड़ा था। बाद में राजनीतिक रास्ते अलग हो गए और जयंत चौधरी का दल भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हो गया।
इसलिए ओवैसी का जयंत के पक्ष में बोलना केवल व्यक्तिगत बयानबाजी तक सीमित नहीं है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों और विपक्षी एकता की बहस के बीच दिया गया संदेश भी है। हालांकि इससे भविष्य में किसी नए गठबंधन की पुष्टि नहीं होती।
क्या सपा के समीकरण बदलेंगे?
फिलहाल इसे सपा के समीकरणों के ध्वस्त होने के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। अभी एआईएमआईएम ने किसी सीट बंटवारे या अंतिम गठबंधन की घोषणा नहीं की है। ओवैसी ने 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन पर फैसला करने की बात कही है।
दूसरी तरफ सपा भी अपने संगठन और चुनावी नेटवर्क को मजबूत करने में जुटी है। इसलिए मौजूदा स्थिति को सपा बनाम एआईएमआईएम के सीधे मुकाबले के बजाय विपक्षी खेमे के भीतर संभावित पुनर्संयोजन के तौर पर देखना अधिक सटीक होगा।
एक और अहम पहलू यह है कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल ओवैसी के अभियान का प्रमुख हिस्सा है। एआईएमआईएम इसी मुद्दे को लेकर अपना अलग राजनीतिक स्पेस बनाने की कोशिश कर रही है। ओवैसी का तर्क है कि मुस्लिम समुदाय को विधानसभा में पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
दूसरी तरफ कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने ओवैसी के गठबंधन प्रस्ताव पर अलग रुख रखा है। उन्होंने कहा कि केवल मुस्लिम वोट के जरिए भाजपा को हराने की रणनीति पर्याप्त नहीं है। यह बयान बताता है कि विपक्षी खेमे के भीतर भी ओवैसी की रणनीति और उसके चुनावी असर को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबसे अहम तारीख 2 अक्टूबर बताई जा रही है। एआईएमआईएम उस समय तक अपने गठबंधन सहयोगियों के बारे में फैसला करने की बात कह चुकी है। इसके बाद यह साफ होगा कि पार्टी सपा, कांग्रेस, बसपा या किसी अन्य राजनीतिक समूह के साथ चुनावी तालमेल करती है या अलग रास्ता अपनाती है।
इसके साथ ही अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच जारी बयानबाजी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने वाला मुद्दा बनी हुई है। आने वाले महीनों में सीटों का बंटवारा, स्थानीय उम्मीदवारों का चयन और सामाजिक गठजोड़ इस बहस को और स्पष्ट करेंगे।
उत्तर प्रदेश की चुनावी सियासत में फिलहाल तस्वीर खुली हुई है। ओवैसी ने विपक्षी एकता का प्रस्ताव देकर अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट की है और जयंत चौधरी के मुद्दे पर अखिलेश यादव को निशाने पर लिया है। लेकिन इससे अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सपा का चुनावी आधार या उसका पूरा सामाजिक समीकरण बदल गया है। वास्तविक तस्वीर गठबंधन की अंतिम संरचना और चुनावी मैदान में उम्मीदवारों के उतरने के बाद ही ज्यादा साफ होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।