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पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीजफायर : हक़ीक़त या हिक्मत-ए-'अमली ?

None 2025-10-20 09:32:42
पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीजफायर : हक़ीक़त या हिक्मत-ए-'अमली ?

 

पाक-अफगान जंग थमी: दोहा में तालिबान और पाकिस्तान में सीजफायर

दोहा में बनी सहमति: पाकिस्तान-तालिबान ने किया युद्धविराम

क़तर में तुर्की की मध्यस्थता से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी संघर्ष पर युद्धविराम की सहमति बनी। दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने दोहा में बातचीत कर सीजफायर एग्रीमेंट साइन किया।

 📍दोहा, क़तर🗓️ 20 अक्टूबर 2025✍️ AsifKhan

 क़तर में तुर्की की मध्यस्थता  से थमा पाक-अफगान संघर्ष

क़तर के दोहा में हुई लंबी बातचीत के बाद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी खूनी जंग पर फिलहाल विराम लग गया है। तुर्की की मध्यस्थता में दोनों देशों ने एक अस्थायी सीजफायर एग्रीमेंट पर सहमति जताई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह युद्ध विराम टिकेगा, या यह सिर्फ़ कूटनीतिक राहत का एक छोटा-सा पल है?

पिछले एक हफ़्ते का लहू, धुआं और डर

पिछले हफ्ते ड्यूरंड लाइन के दोनों तरफ़ गोलाबारी और हवाई हमले होते रहे। अफगानिस्तान का कहना है कि पाकिस्तान ने उसकी सरज़मीन पर 1200 बार सीमा उल्लंघन किया और 710 बार एयरस्पेस तोड़ा। इस्लामाबाद का दावा है कि अफगान सीमा से आए आतंकी पाकिस्तानी चौकियों पर हमले कर रहे हैं। दोनों देश खुद को ‘रक्षा कर रहे हैं’, लेकिन नतीजा — 102 नागरिकों की मौत, सैकड़ों घायल, दर्जनों गांव तबाह।

तालिबान सरकार ने कहा कि अब बहुत हुआ। मुल्ला मुहम्मद याक़ूब, जो अफगान रक्षा मंत्री हैं, ने पाकिस्तानी हमलों के खिलाफ़ “माक़ूल जवाब” देने का एलान किया। अफगान इंटीरियर मिनिस्टर मौलवी मुहम्मद नबी ओमारी ने तो यहाँ तक कह दिया कि — “अगर अफगान सरज़मीन पर दोबारा हमला हुआ, तो पाक सैनिकों को भारत की सरहद तक खदेड़ दिया जाएगा।”

यह बयान किसी भी सामान्य युद्धविराम के माहौल से बहुत अलग है। इसमें न सिर्फ़ धार्मिक भाषा, बल्कि राष्ट्रवादी जुनून की झलक भी दिखती है।

पाकिस्तान की दलील और अफगानिस्तान की दास्तान

इस्लामाबाद का दावा है कि अफगानिस्तान के अंदर बैठे आतंकवादी — खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) — उसके इलाक़ों पर हमले कर रहे हैं। पाकिस्तान चाहता है कि काबुल उन्हें काबू करे।
लेकिन तालिबान हुकूमत का जवाब है कि TTP के लोग “हमारे नहीं, तुम्हारे पैदा किए हुए हैं।” तालिबान का आरोप है कि पाकिस्तान अब इस्लामिक स्टेट (IS-K) जैसे गुटों का इस्तेमाल कर अफगानिस्तान को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है।

हक़ीक़त यह है कि दोनों देश एक-दूसरे को वही इल्ज़ाम दे रहे हैं जो वो खुद दशकों से करते आए हैं — “आतंकवाद को पनाह देना” और “विदेशी ताकतों के इशारे पर चलना।”

दोहा में बातचीत की बुनियाद — भरोसे की दरारों पर पुल

क़तर की मेज़बानी और तुर्की की मध्यस्थता में दोनों देशों के रक्षा मंत्री — पाकिस्तान से ख्वाजा मुहम्मद आसिफ और अफगानिस्तान से मुल्ला याक़ूब — आमने-सामने बैठे।
बातचीत में सहमति बनी कि फिलहाल बॉर्डर पर सीजफायर लागू रहेगा, और 25 अक्टूबर को इस्तांबुल में फॉलो-अप मीटिंग होगी।

क़तर के विदेश मंत्रालय ने बयान दिया कि यह युद्धविराम सिर्फ़ अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी शांति की बुनियाद रखने की कोशिश है।
लेकिन क्या पाकिस्तान वाक़ई अपने वादों पर कायम रहेगा? पिछले साल भी इसी तरह का समझौता हुआ था, जिसके कुछ ही हफ़्तों बाद पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक ने सीजफायर तोड़ दिया था।

तालिबान की अंदरूनी सियासत — हक़ीक़त में किसके हाथ में है सत्ता?

तालिबान के अंदर दो बड़े धड़े हैं — एक जो पाकिस्तान के साथ रिश्तों को ज़रूरी मानता है, दूसरा जो पाकिस्तान को “अमेरिका का प्रॉक्सी” कहता है।
मुल्ला याक़ूब और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच सत्ता संघर्ष खुला राज़ है। पाकिस्तान की नीति अक्सर इन फूटों का फायदा उठाने की कोशिश करती है।

अफगान विश्लेषकों का कहना है कि यह सीजफायर सिर्फ़ बाहरी राहत नहीं, बल्कि अंदरूनी तालमेल का टेस्ट भी है।

International impact: नई जंग का डर या पुरानी आग का धुआं?

क़तर, तुर्की, और चीन इस शांति समझौते को अपनी कूटनीतिक जीत बताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका और रूस फिलहाल खामोश हैं।
कई जानकार मानते हैं कि अगर यह संघर्ष बढ़ता, तो पूरा क्षेत्र चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और मध्य एशियाई सुरक्षा व्यवस्था को झटका दे सकता था।

भारत ने आधिकारिक बयान नहीं दिया, लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि तालिबान का पाकिस्तान से टकराव भारत के लिए रणनीतिक मौका बन सकता है।

अफगान जनता की आवाज़ — “हम अमन चाहते हैं, न कि और कब्रें”

काबुल से आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि लोग अब थक चुके हैं। पिछले बीस साल की जंग ने उन्हें बस एक चीज़ सिखाई — हर जंग के बाद सिर्फ़ आम लोग मरते हैं।
एक बुज़ुर्ग अफगान महिला ने मीडिया से कहा, “हमारे बेटे न पाकिस्तान के हैं न तालिबान के — वो बस इंसान हैं।”

यह लफ़्ज़ पूरे हालात का निचोड़ हैं।

क्या यह स्थायी शांति का आग़ाज़ है या अस्थायी राहत?

इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हर “सीजफायर” कुछ हफ्तों से ज़्यादा नहीं टिकता।
लेकिन इस बार एक फर्क़ है — तालिबान की सरकार खुद को एक वैध राज्य की तरह पेश करना चाहती है। उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान चाहिए, आर्थिक मदद चाहिए।
वो जानता है कि अगर बॉर्डर पर जंग जारी रही, तो उसकी साख और सियासत दोनों डूब जाएंगी।

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की सियासत भी संकट में है। शहबाज़ शरीफ़ सरकार, आर्थिक कर्ज़ और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे में एक और मोर्चा खोलना उसके लिए आत्मघाती कदम होता।

 युद्धविराम की कीमत — भरोसा और बचे हुए इंसानियत के टुकड़े

दोहा समझौता सिर्फ़ एक दस्तख़त नहीं, बल्कि दो थके हुए देशों की ज़रूरत का नाम है।
फिलहाल गोलाबारी थमी है, लेकिन ज़मीन पर शांति तभी आएगी जब दोनों देश सत्य बोलने और अपने आतंरिक विरोधाभासों को स्वीकारने की हिम्मत दिखाएंगे।अंततः, यह जंग सीमाओं की नहीं, नज़रिए की है — कौन पहले यह मानेगा कि दुश्मन सिर्फ़ दूसरी तरफ़ नहीं, बल्कि अपने अंदर भी है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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