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रूस,चीन और डॉलर की जंग के दरमियान भारत-अमेरिका समझौते की तस्वीर

None 2025-09-12 10:10:19
रूस,चीन और डॉलर की जंग के दरमियान भारत-अमेरिका समझौते की तस्वीर

 व्यापार, रक्षा और ऊर्जा: सर्जियो गोर के एजेंडा पर भारत-अमेरिका रिश्ते

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: ट्रंप- मोदी समीकरण और Geopolitics

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर नई उम्मीदें, सर्जियो गोर ने ट्रंप-मोदी रिश्ते को अहम बताते हुए रक्षा, ऊर्जा और डॉलर राजनीति पर जोर दिया।

New Delhi ,(Shah Times)। भारत और अमेरिका के रिश्ते हमेशा से दुनिया की Geopolitical तस्वीर को प्रभावित करते आए हैं। जब भी वॉशिंगटन और नई दिल्ली एक-दूसरे के करीब आए, वैश्विक शक्ति समीकरण बदलते नज़र आए। अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत में अमेरिकी राजदूत पद के लिए नामित सर्जियो गोर का बयान इस दिशा में नया अध्याय खोलता दिख रहा है। उन्होंने कहा है कि दोनों देश एक बड़े व्यापार समझौते के करीब हैं। गोर का मानना है कि भारत-अमेरिका साझेदारी “दुनिया में सबसे अहम रिश्तों में से एक” है।

हालात और तनाव की पृष्ठभूमि

पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में तनाव दिखा था। वॉशिंगटन ने नई दिल्ली पर रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बढ़ाया और इसे “क्रेमलिन का ऑयल मनी लॉन्ड्रोमैट” कहा। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजिंग में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के साथ मंच साझा किया। इसने अमेरिकी हलकों में बेचैनी पैदा कर दी।

लेकिन राजनीति की यही खूबसूरती है—जहां टकराव दिखता है, वहीं समझौते की गुंजाइश भी बनती है। ट्रंप और मोदी के हालिया बयानों ने रिश्तों को फिर से सकारात्मक मोड़ दिया।

मोदी-ट्रंप समीकरण की अहमियत

सर्जियो गोर ने साफ कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच व्यक्तिगत ताल्लुकात इस साझेदारी की कुंजी हैं। ट्रंप भले भारत पर आलोचना करते रहे हों, लेकिन मोदी की तारीफ उन्होंने कभी छिपाई नहीं। अमेरिकी कूटनीति में यह पहलू अनोखा है—जहां सख़्त बातचीत के साथ दोस्ताना प्रशंसा भी मौजूद रहती है।

रूस का फैक्टर और ऊर्जा सुरक्षा

सीनेट की सुनवाई के दौरान भारत के रूस से तेल आयात पर तीखी बहस हुई। सीनेटर जिम रिश ने इसे “खतरनाक” बताया। वहीं लिंडसे ग्राहम ने तो रूसी तेल खरीदने वालों पर 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव तक दिया।

गोर का कहना था कि प्रशासन की प्राथमिकता भारत को रूसी ऊर्जा पर निर्भरता से दूर करना है। लेकिन सवाल उठता है—क्या भारत इतनी आसानी से रूसी कच्चे तेल से दूरी बना सकता है? ऊर्जा सुरक्षा किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए अहम होती है और भारत के लिए तो और भी ज़्यादा।

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रक्षा और रणनीतिक सहयोग

गोर ने भविष्य का खाका पेश किया—संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा उपकरणों का सह-विकास और क्वाड ढांचे में मज़बूत भागीदारी। हाल ही में अलास्का में 500 भारतीय सैनिकों ने अमेरिकी बलों के साथ अभ्यास किया। यह दिखाता है कि दोनों देश सिर्फ़ व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि सुरक्षा सहयोगी भी हैं।

व्यापारिक लक्ष्य और ‘मिशन 500’

ट्रंप प्रशासन ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक दोगुना करने का लक्ष्य तय किया है। इसे ‘मिशन 500’ कहा जा रहा है। अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार तक पहुंचाना और भारत से दवा व विनिर्माण क्षेत्र में निवेश बढ़ाना प्राथमिक एजेंडा है।

ब्रिक्स, डॉलर और वैश्विक अर्थशास्त्र

भारत ब्रिक्स का अहम सदस्य है। वहीं ब्राजील और चीन डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशों में लगे हैं। गोर का दावा है कि भारत कई बार अमेरिका के हितों की रक्षा में “स्टॉपगैप” की भूमिका निभाता रहा है। यह स्पष्ट करता है कि वॉशिंगटन भारत को सिर्फ़ एक साझेदार नहीं बल्कि वैश्विक मुद्रा राजनीति में भी अहम बैलेंस-कीपर मानता है।

काउंटरप्वाइंट्स

लेकिन यहां कुछ गंभीर सवाल भी हैं:

क्या भारत अपने ऊर्जा हितों को अमेरिका की रणनीति के हिसाब से बदल पाएगा?

क्या अमेरिकी कृषि उत्पादों की बड़ी एंट्री भारतीय किसानों के लिए चुनौती नहीं होगी?

क्या अमेरिका भारत को चीन से पूरी तरह दूर रख सकता है, जबकि दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक है?

इन सवालों का जवाब सीधा नहीं, बल्कि बहुआयामी है। भारत अपनी विदेश नीति में ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर ज़ोर देता है। वह वॉशिंगटन का करीबी भी है और मॉस्को व बीजिंग से संवाद भी जारी रखता है।

Conclusion

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर जो चर्चा आज हो रही है, वह सिर्फ़ टैरिफ या व्यापारिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह भविष्य की भू-राजनीति का संकेत है। ट्रंप-मोदी समीकरण इस साझेदारी का भावनात्मक पहलू है, लेकिन असली चुनौती है—ऊर्जा सुरक्षा, कृषि संतुलन और वैश्विक मुद्रा राजनीति।

सर्जियो गोर जैसे युवा और प्रभावशाली राजनयिक की नियुक्ति से यह साफ है कि ट्रंप प्रशासन भारत को वॉशिंगटन की विदेश नीति का केंद्रीय स्तंभ मान रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या भारत अपनी स्वायत्तता खोए बिना इस साझेदारी को संतुलित रख पाएगा। यही आने वाले वर्षों में देखने वाली असली कहानी होगी।

Asif Khan 

Sub Editor 

Shah Times Digital 

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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