Politics
कांग्रेस में बदल रहा सत्ता-संतुलन? राहुल गांधी और युवा टीम के बढ़ते असर के बीच पुराने चेहरों की भूमिका पर सवाल
Mohammad Naved
•
2026-10-01 11:30:46
CWC में नीतीश कुमार पर चर्चा से लेकर ‘छात्रों की गूंज’ और पंजाब में सचिन पायलट की जिम्मेदारी तक, कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन के बदलते समीकरण दिखाई दे रहे हैं।
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नई दिल्ली
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1 अक्टूबर 2026
✍️Mohd Naved
कांग्रेस के भीतर बदलता राजनीतिक समीकरण
कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में इस समय एक अहम सवाल फिर उभर रहा है। क्या पार्टी का संगठनात्मक और राजनीतिक फोकस धीरे-धीरे पुराने नेतृत्व के अनुभव से आगे बढ़कर राहुल गांधी और नई पीढ़ी के नेताओं की सक्रिय भूमिका की ओर जा रहा है?
इस सवाल के पीछे कोई एक फैसला नहीं है। पिछले कुछ समय में पार्टी के भीतर हुए कई घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नीतीश कुमार के मुद्दे पर हुई कथित बहस, राहुल गांधी का छात्रों के बीच लगातार संवाद, पंजाब में सचिन पायलट को नई जिम्मेदारी और पुराने G-23 समूह के कई प्रमुख चेहरों का कांग्रेस से बाहर होना इस बहस को आधार देते हैं।
फिर भी इसे सीधे तौर पर “ओल्ड गार्ड का अंत” कहना राजनीतिक निष्कर्ष होगा। उपलब्ध घटनाक्रम इतना जरूर दिखाते हैं कि कांग्रेस के संगठन में वरिष्ठ अनुभव और नई पीढ़ी की राजनीतिक सक्रियता के बीच संतुलन का सवाल पहले से ज्यादा अहम हो गया है।
CWC में नीतीश कुमार का मुद्दा क्यों चर्चा में आया
सितंबर के अंत में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विपक्षी गठबंधन से उनके अलग होने का मुद्दा चर्चा में आया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने नीतीश कुमार के गठबंधन से अलग होने को लेकर अपनी राय रखी।
रिपोर्टों में दावा किया गया कि दिग्विजय सिंह ने नीतीश के पुराने राजनीतिक संबंधों और विपक्षी गठबंधन की शुरुआत में उनकी भूमिका का संदर्भ दिया। इसके बाद सोनिया गांधी ने कथित तौर पर इस आकलन से असहमति जताई। इस बातचीत को लेकर सामने आई जानकारी कांग्रेस की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के रूप में उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय रिपोर्टेड घटनाक्रम के रूप में देखना जरूरी है। Jagran
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक समझ और मौजूदा नेतृत्व की रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच अंतर को लेकर चर्चा पहले भी होती रही है।
राहुल गांधी और छात्रों के बीच सीधा संवाद
दूसरी तरफ राहुल गांधी ने युवाओं और छात्रों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को आगे बढ़ाया है।
राहुल गांधी के आधिकारिक अभियान पेज के मुताबिक, इस पहल का फोकस शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, रोजगार और छात्रों की समस्याओं से जुड़े मुद्दों पर है। अभियान के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों से संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। Rahul Gandhi
देहरादून, प्रयागराज और इंदौर जैसे स्थानों पर कार्यक्रमों के जरिए छात्रों से संवाद किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस नेतृत्व युवा मतदाताओं और छात्र समुदाय से सीधे राजनीतिक संपर्क को संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा बना रहा है। NDTV India
यह रणनीति केवल भाषण तक सीमित नहीं है। अभियान में छात्रों से उनकी समस्याओं और प्राथमिकताओं पर प्रतिक्रिया लेने का प्रयास भी शामिल है।
लेकिन युवा राजनीति के सामने चुनौती भी मौजूद
युवा संपर्क बढ़ाना और युवाओं के बीच राजनीतिक प्रभाव बनाना दो अलग चीजें हैं।
हालिया दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI को केंद्रीय पैनल में कोई सीट नहीं मिली। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, राहुल गांधी ने इसके बाद NSUI से जुड़े पदाधिकारियों के साथ समीक्षा की और उम्मीदवार चयन तथा चुनावी रणनीति पर सवाल उठाए। Jansatta
यह घटनाक्रम एक अहम विरोधाभास सामने रखता है। एक तरफ कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों और Gen Z से संवाद बढ़ा रही है, दूसरी तरफ छात्र राजनीति के एक महत्वपूर्ण मंच पर संगठन को चुनौती का सामना करना पड़ा।
इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ का वास्तविक राजनीतिक असर केवल कार्यक्रमों की संख्या से नहीं, बल्कि स्थानीय संगठन, उम्मीदवार चयन और छात्र समुदाय के साथ लंबे समय के संपर्क से तय होगा।
पंजाब में सचिन पायलट की जिम्मेदारी
कांग्रेस संगठन में बदलाव का दूसरा अहम उदाहरण पंजाब है।
सितंबर में सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया। उनसे पहले यह जिम्मेदारी भूपेश बघेल के पास थी। कांग्रेस संगठन में इस बदलाव को पंजाब में गुटबाजी और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच महत्वपूर्ण नियुक्ति के तौर पर देखा गया। NDTV India
पायलट ने पंजाब में संगठन को मजबूत करने, नेताओं के बीच समन्वय बढ़ाने और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी पर फोकस किया है। उन्होंने यह भी कहा है कि पार्टी चुनाव सामूहिक नेतृत्व के साथ लड़ेगी और राहुल गांधी अभियान का चेहरा रहेंगे। The Indian Express
इसका अर्थ यह नहीं है कि पंजाब में पूरी कमान किसी एक नेता के हाथ में चली गई है। बल्कि संगठनात्मक जिम्मेदारी, चुनावी रणनीति और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल बनाने की कोशिश दिखाई देती है।
G-23 का दौर और आज की स्थिति
G-23 कांग्रेस के इतिहास में नेतृत्व और संगठनात्मक सुधार को लेकर एक महत्वपूर्ण असहमति समूह के रूप में सामने आया था। 2020 में 23 वरिष्ठ नेताओं ने तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को संगठन और नेतृत्व से जुड़े सुधारों की मांग वाला पत्र भेजा था। Moneycontrol
उस समूह में गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, शशि थरूर, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कई अन्य वरिष्ठ नेता शामिल थे।
बाद के वर्षों में समूह की राजनीतिक एकजुटता कमजोर हुई। गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल कांग्रेस छोड़ चुके हैं। मिलिंद देवड़ा भी कांग्रेस से अलग होकर दूसरी राजनीतिक पार्टी में चले गए। दूसरी ओर कुछ G-23 से जुड़े नेता कांग्रेस में बने रहे और अलग-अलग संगठनात्मक भूमिकाओं में सक्रिय रहे। Wikipedia
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि G-23 का हर चेहरा कांग्रेस से बाहर हो गया। वास्तविक तस्वीर इससे अधिक जटिल है।
क्या राहुल गांधी की भूमिका बढ़ रही है?
उपलब्ध घटनाक्रम से इतना स्पष्ट है कि राहुल गांधी की राजनीतिक सक्रियता कई स्तरों पर दिखाई दे रही है।
वह संसद में विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रहे हैं। छात्रों के बीच अभियान चला रहे हैं। संगठनात्मक फैसलों में उनकी भूमिका दिखाई देती है। पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य में नई जिम्मेदारियों के साथ उनकी राजनीतिक रणनीति को जोड़ा जा रहा है।
कांग्रेस के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी राहुल गांधी की संगठनात्मक और राजनीतिक गतिविधियों की निरंतर मौजूदगी दर्ज है। सितंबर के अंत में पार्टी की बैठकों और विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है। Indian National Congress
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि कांग्रेस की पूरी राजनीति अब केवल राहुल गांधी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो चुकी है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, प्रियंका गांधी वाड्रा और राज्यों के वरिष्ठ नेता भी पार्टी की रणनीति और संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की बहस
कांग्रेस के सामने असली सवाल केवल यह नहीं है कि पुराने नेता कितने प्रभावशाली रहेंगे। बड़ा सवाल यह है कि पार्टी अनुभव और नई राजनीतिक ऊर्जा के बीच किस तरह का संगठनात्मक मॉडल तैयार करती है।
वरिष्ठ नेताओं के पास लंबा राजनीतिक अनुभव, राज्यों में संगठन की समझ और चुनावी नेटवर्क है। दूसरी तरफ नई पीढ़ी के सामने युवा मतदाताओं, डिजिटल राजनीति, रोजगार, शिक्षा और नए सामाजिक गठजोड़ से जुड़े मुद्दे हैं।
कांग्रेस यदि युवा राजनीति पर ज्यादा जोर देती है तो उसे स्थानीय स्तर पर नए चेहरों को अवसर देने, संगठन में जिम्मेदारी बांटने और युवाओं को केवल चुनावी अभियान तक सीमित न रखने की चुनौती का सामना करना होगा।
राहुल गांधी के लिए भी चुनौती आसान नहीं
राहुल गांधी की बढ़ती सक्रियता अपने आप में संगठनात्मक सफलता की गारंटी नहीं है।
छात्रों के बीच अभियान चलाना और युवाओं को पार्टी संगठन में जोड़ना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव का हालिया परिणाम इसी अंतर की ओर ध्यान खींचता है। Jansatta
इसी तरह पंजाब में सचिन पायलट को जिम्मेदारी देने के बाद सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय गुटों के बीच तालमेल बनाना है। पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक बदलाव जरूर किया है, लेकिन उसका असर जमीनी स्तर पर कितना दिखाई देता है, यह आगे के राजनीतिक घटनाक्रम से स्पष्ट होगा। Jagran
कांग्रेस की अगली राजनीति किस दिशा में जाएगीआने वाले महीनों में तीन संकेत महत्वपूर्ण होंगे।
पहला, क्या कांग्रेस युवा और छात्र संगठनों में नई पीढ़ी के नेताओं को अधिक जिम्मेदारी देती है।
दूसरा, क्या पंजाब जैसे राज्यों में संगठनात्मक फेरबदल के बाद गुटबाजी कम होती है और चुनावी मशीनरी मजबूत होती है।
तीसरा, क्या वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक विशेषज्ञता को नई रणनीति के साथ जोड़ा जाता है या दोनों धाराओं के बीच दूरी बढ़ती है।
इन तीन सवालों के जवाब कांग्रेस के अगले संगठनात्मक चरण की तस्वीर को काफी हद तक स्पष्ट करेंगे।
कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा नई नहीं है। G-23 के दौर में भी संगठन, नेतृत्व और नई पीढ़ी को लेकर सवाल उठे थे। आज परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन बहस का एक हिस्सा फिर उसी बिंदु पर लौटता दिखाई दे रहा है।
राहुल गांधी की छात्र और युवा केंद्रित सक्रियता, पंजाब में सचिन पायलट की जिम्मेदारी और पुराने G-23 नेटवर्क के कमजोर पड़ने से कांग्रेस की राजनीति में प्राथमिकताओं के बदलाव के संकेत जरूर मिलते हैं।
लेकिन इसे “पुराने नेताओं की विदाई” या “राहुल गांधी की पूरी पकड़” के रूप में देखना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी।
फिलहाल तस्वीर इतनी है कि कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक अनुभव को बनाए रखते हुए नई पीढ़ी, युवा मतदाताओं और नए संगठनात्मक चेहरों पर ज्यादा जोर दे रही है। आने वाले चुनाव और संगठनात्मक फैसले बताएंगे कि यह बदलाव स्थायी राजनीतिक मॉडल बनता है या केवल नेतृत्व की रणनीतिक पुनर्संरचना तक सीमित रहता है।
Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।