पश्चिम बंगाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा कार्यक्रम स्थल की छोटी व्यवस्था और प्रोटोकॉल पालन पर जताई गई नाराज़गी ने राष्ट्रीय सियासत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है।
यह विवाद केवल एक कार्यक्रम स्थल या स्वागत प्रोटोकॉल का मामला नहीं है। इसके भीतर कई परतें हैं—संवैधानिक पदों की गरिमा, राज्य-केंद्र संबंधों की नाज़ुक राजनीति, आदिवासी प्रतिनिधित्व की वास्तविकता और चुनावी माहौल का दबाव।
Shah Times संपादकीय इसी पूरे मसले की तह तक जाने की कोशिश करता है—क्या यह सचमुच प्रोटोकॉल का सवाल है, या फिर सियासी narrative का नया अध्याय?
संथाल समुदाय भारत के बड़े आदिवासी समूहों में से एक है। उनका इतिहास, उनकी तहज़ीब और उनका सामुदायिक ढांचा भारतीय सामाजिक ताने-बाने का अहम हिस्सा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस का आयोजन सिर्फ एक सांस्कृतिक इवेंट नहीं होता, बल्कि यह identity और representation की बहस से भी जुड़ा होता है।
जब देश की राष्ट्रपति, जो स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं, ऐसे सम्मेलन में शामिल होती हैं तो उसका symbolism और भी बड़ा हो जाता है। यह संदेश देता है कि लोकतंत्र के सर्वोच्च पद तक समाज के हर वर्ग की पहुंच है।
लेकिन यही मंच उस समय सियासी बहस का विषय बन गया जब राष्ट्रपति ने कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था और प्रोटोकॉल को लेकर नाराज़गी जताई।
उनका कहना था कि कार्यक्रम स्थल इतना छोटा था कि बड़ी संख्या में संथाल समुदाय के लोग शामिल ही नहीं हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि पास में ही मौजूद बड़ा मैदान इस आयोजन के लिए अधिक उपयुक्त होता।
यह टिप्पणी साधारण प्रशासनिक टिप्पणी भी हो सकती थी। मगर जिस तरह यह सार्वजनिक मंच से कही गई, उसने इसे तुरंत राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया।
भारत के संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति का पद प्रतीकात्मक होने के बावजूद अत्यंत गरिमामय माना जाता है। प्रोटोकॉल का उद्देश्य केवल औपचारिकता निभाना नहीं होता बल्कि संस्थागत सम्मान बनाए रखना होता है।
सामान्यतः जब राष्ट्रपति किसी राज्य का दौरा करते हैं तो राज्यपाल स्वागत करते हैं। कई बार मुख्यमंत्री भी मौजूद रहते हैं। अगर दोनों अनुपस्थित हों तो कोई वरिष्ठ मंत्री स्वागत के लिए उपस्थित रहता है।
राष्ट्रपति ने यह कहते हुए अफसोस जताया कि इस बार ऐसा नहीं हुआ।
यहां एक दिलचस्प सवाल उठता है—क्या प्रोटोकॉल की हर छोटी चूक को सार्वजनिक मंच से उठाना चाहिए?
कई बार सरकारी दौरे में समय, सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से बदलाव होते रहते हैं। मगर जब यह बात सार्वजनिक हो जाती है तो उसका अर्थ बदल जाता है।
यानी जो बात प्रशासनिक नोट में दर्ज हो सकती थी, वह राष्ट्रीय बहस बन जाती है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पूरे मामले को बिल्कुल अलग नजरिए से देखा।
उन्होंने कहा कि उन्हें संबंधित सम्मेलन के बारे में जानकारी ही नहीं थी और राज्य सरकार आयोजन का हिस्सा नहीं थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी माहौल में हर कार्यक्रम में शामिल होना संभव नहीं होता।
यह बयान एक तरह से प्रशासनिक सफाई भी है और राजनीतिक जवाब भी।
लेकिन ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि राष्ट्रपति को राजनीतिक एजेंडे के तहत भेजा गया है।
यह बयान निश्चित रूप से असामान्य है। क्योंकि संवैधानिक पदों के संदर्भ में इस तरह की टिप्पणी भारतीय राजनीतिक परंपरा में कम ही देखने को मिलती है।
यह पूरा विवाद हमें एक बड़े प्रश्न की तरफ ले जाता है—क्या भारत में संवैधानिक पद अब पूरी तरह राजनीतिक विमर्श से अलग रह पाए हैं?
सैद्धांतिक रूप से राष्ट्रपति दलगत राजनीति से ऊपर होते हैं। मगर व्यवहारिक राजनीति में उनके बयान भी कई बार सियासी अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
दूसरी ओर मुख्यमंत्री भी चुनावी दबाव और राजनीतिक समीकरणों के बीच काम करते हैं।
इसलिए जब दोनों पक्ष सार्वजनिक टिप्पणी करते हैं तो मामला केवल प्रोटोकॉल का नहीं रह जाता।
यह लोकतंत्र की उस वास्तविकता को सामने लाता है जहां संस्थागत मर्यादा और राजनीतिक narrative लगातार एक दूसरे से टकराते रहते हैं।
इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—आदिवासी राजनीति।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक पहुंचना आदिवासी प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ऐतिहासिक घटना माना गया था।
ऐसे में जब वह आदिवासी सम्मेलन में शामिल होती हैं तो उसका राजनीतिक और सामाजिक अर्थ दोनों निकलता है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आदिवासी समाज के मुद्दे वास्तव में राष्ट्रीय नीति के केंद्र में हैं या वे केवल प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।
ममता बनर्जी ने मणिपुर और अन्य राज्यों में आदिवासी मुद्दों का जिक्र करके यही सवाल उठाने की कोशिश की।
हालांकि यह तर्क भी आलोचना से मुक्त नहीं है। क्योंकि हर राज्य में आदिवासी समुदाय की स्थिति अलग है और हर मुद्दे की अपनी जटिलता होती है।
लोकतंत्र में शब्दों की शक्ति बहुत बड़ी होती है।
राष्ट्रपति का एक वाक्य, मुख्यमंत्री की एक प्रतिक्रिया—दोनों तुरंत राष्ट्रीय चर्चा बन जाते हैं।
यहां एक साधारण उदाहरण समझना उपयोगी होगा।
अगर किसी विद्यालय के प्रिंसिपल सार्वजनिक सभा में स्कूल की व्यवस्था पर नाराज़गी जताएं तो उसका असर अलग होगा। लेकिन अगर वही बात प्रशासनिक बैठक में कही जाए तो उसका स्वर अलग होता है।
सार्वजनिक मंच पर कही गई बात का अर्थ केवल शब्दों से नहीं बल्कि उसके संदर्भ से बनता है।
इस मामले में भी यही हुआ।
भारत एक संघीय ढांचा है जहां केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है।
कई बार राजनीतिक दल अलग होने की वजह से यह संतुलन तनावपूर्ण हो जाता है।
पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के संबंध पिछले कुछ वर्षों से अक्सर टकरावपूर्ण रहे हैं।
ऐसे में राष्ट्रपति के दौरे से जुड़ा विवाद भी उसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।
यानी यह केवल एक कार्यक्रम स्थल का मुद्दा नहीं है, बल्कि संघीय राजनीति की एक झलक भी है।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल शायद कहीं पीछे छूट गया है—संथाल समुदाय की वास्तविक समस्याएं।
आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और भूमि अधिकार जैसे मुद्दे अभी भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
अगर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केवल राजनीतिक बयानबाज़ी का मंच बन जाए तो उसके मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाते हैं।
इसलिए जरूरी है कि चर्चा केवल प्रोटोकॉल या बयान तक सीमित न रहे।
बल्कि यह सवाल भी उठे कि ऐसे सम्मेलन से आदिवासी समाज को वास्तविक लाभ क्या मिलेगा।
लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। मगर संवैधानिक पदों के बीच संवाद की शैली भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उनके बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवाद की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो संस्थागत गरिमा को मजबूत करे।
संथाल सम्मेलन का विवाद हमें यही याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का खेल नहीं है। यह संवाद, मर्यादा और विश्वास की निरंतर प्रक्रिया भी है।
और शायद यही वह बात है जिसे हमारी राजनीति को बार-बार याद करने की ज़रूरत है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।