📍New Delhi ✍️ Asif Khan
राष्ट्रपति भवन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मान में आयोजित स्टेट डिनर में कांग्रेस सांसद शशि थरूर को आमंत्रण और विपक्ष के शीर्ष नेताओं को बाहर रखने से देश की राजनीतिक परंपराओं, लोकतांत्रिक मर्यादा और कूटनीति की सीमाओं पर एक नई बहस खड़ी हो गई है।
राष्ट्रपति भवन का स्टेट डिनर आम तौर पर महज़ कई कोर्स के खाने और औपचारिक तस्वीरों का कार्यक्रम नहीं होता, वह देश की सियासत, उसकी सोच और उसकी कूटनीतिक दिशा का भी आईना होता है। जब उस दावत से लोकसभा और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष बाहर रह जाएं, और वहीं विपक्ष के ही एक वरिष्ठ सांसद भीतर मेज़ पर बैठे दिखें, तो सवाल खाने से ज़्यादा गहरे हो जाते हैं। इस बार सवाल यह नहीं है कि पुतिन को बिरयानी पसंद आई या नहीं, असली सवाल यह है कि लोकतंत्र की मेज़ पर किसे बैठने का हक़ मिला और किसे नहीं।
सरकार का दावा है कि यह महज़ एक औपचारिक आयोजन था और न्योते प्रोटोकॉल के तहत भेजे गए। लेकिन प्रोटोकॉल भी कभी आसमान से नहीं गिरता, उसे इंसान बनाते हैं, और इंसान अपने फैसलों के ज़िम्मेदार भी होते हैं। जब तक नेता प्रतिपक्ष को बुलाने की परंपरा निभाई जाती रही, तब तक किसी ने नहीं कहा कि यह प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है। अब अचानक वही परंपरा बोझ क्यों लगने लगी, यह सवाल लोगों के मन में बार बार उठ रहा है।
शशि थरूर का इस दावत में जाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। वह एक अनुभवी नेता हैं, दुनिया देखी है, डिप्लोमेसी की भाषा जानते हैं और विदेश नीति पर उनकी समझ से शायद ही कोई इनकार करे। उन्होंने खुद यह भी कहा कि विपक्ष के नेताओं को न बुलाया जाना सही नहीं था। लेकिन राजनीति में कई बार सही बात कहना और सही जगह खड़ा होना दो अलग चीज़ें होती हैं। पार्टी के भीतर से भी यही सवाल उठ रहा है कि जब आपके अपने नेता दरवाज़े के बाहर हैं, तब क्या आपको भीतर जाना चाहिए था।
पवन खेड़ा का यह कहना कि “हर इंसान के ज़मीर की एक आवाज़ होती है” कोई हल्का वाक्य नहीं है। यह सीधे उस नैतिक दुविधा की ओर इशारा करता है जिसमें थरूर फंसे दिखते हैं। एक तरफ राष्ट्रप्रमुख का न्योता, दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी का असंतोष। ऐसे हालात में कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि मैं व्यक्तिगत हैसियत से गया हूं, लेकिन राजनीति में व्यक्ति शायद ही कभी पूरी तरह निजी रह पाता है।
दूसरी ओर सरकार की भूमिका भी सवालों से खाली नहीं है। अगर यह सिर्फ सम्मान का कार्यक्रम था तो विपक्ष के दोनों शीर्ष नेताओं को बाहर रखने की ज़रूरत क्या थी। यह दलील कि शशि थरूर को विदेश मामलों की समिति के संदर्भ में बुलाया गया, आधी सच्चाई लगती है, क्योंकि समिति की परंपरा ही तब पूरी होती जब नेता प्रतिपक्ष भी वहां मौजूद होते। परंपरा केवल सुविधा के लिए नहीं होती, वह लोकतंत्र की रीढ़ होती है।
इस पूरे विवाद में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि हाल के महीनों में शशि थरूर और सत्ता पक्ष के रिश्तों को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। कभी प्रधानमंत्री की तारीफ़, कभी विदेशी दौरों में सरकार के साथ प्रतिनिधित्व, और अब यह दावत। इन सबको जोड़कर देखने वाले यह कह रहे हैं कि यह महज़ एक संयोग नहीं है। हालांकि राजनीति में संयोग भी कभी कभी संकेत बन जाते हैं, और संकेत धीरे धीरे संदेश में बदल जाते हैं।
राजदीप सरदेसाई की यह टिप्पणी कि “राजनीति सिमटती और ध्रुवीकृत होती जा रही है” बहुत सटीक बैठती है। राष्ट्रपति भवन को हमेशा राजनीति के शोर से ऊपर रहने की जगह माना गया है। वहां सत्ता और विपक्ष, दोनों का प्रतिनिधित्व लोकतंत्र के संतुलन का प्रतीक होता है। जब वही संतुलन बिगड़ता दिखाई दे, तो चिंता स्वाभाविक है। यह केवल कांग्रेस बनाम भाजपा का मामला नहीं रह जाता, यह देश की संस्थाओं की साख का मामला बन जाता है।
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि विदेश नीति में सरकार को खुली छूट मिलनी चाहिए। यह बात आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी नहीं। विदेश नीति सरकार बनाती है, मगर उसकी वैधता संसद और जनता के भरोसे से आती है। जब विपक्ष के नेताओं को जान बूझकर अलग रखा जाता है, तो यह संदेश जाता है कि राष्ट्रीय सहमति की ज़रूरत अब उतनी अहम नहीं रही। यह सोच आज भले सत्ता के लिए सुविधाजनक हो, लेकिन कल लोकतंत्र के लिए भारी पड़ सकती है।
रूस और भारत का रिश्ता कोई नया नहीं है। यह रिश्ता केवल तेल, गैस या एस फोर हंड्रेड जैसे डिफेंस सिस्टम तक सीमित नहीं है। इसमें इतिहास, 1971 का युद्ध, संयुक्त राष्ट्र में साथ खड़े रहना, और दशकों की राजनीतिक समझ भी शामिल है। ऐसे रिश्ते में प्रतीकों की भी अहमियत होती है। जब नेता प्रतिपक्ष को रूसी राष्ट्रपति से मिलने का मौका नहीं मिलता, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि परंपरा का अपमान बन जाता है।
राहुल गांधी का यह कहना कि उन्हें विदेशी मेहमानों से मिलने से रोका जाता है, इस बहस को और गहरा करता है। अगर यह सच है तो यह एक गंभीर लोकतांत्रिक समस्या है। विपक्ष का नेता केवल सरकार की आलोचना करने वाला नहीं होता, वह व्यवस्था का आधिकारिक हिस्सा होता है। उसे किनारे करना, अनजाने में ही सही, व्यवस्था को एक तरफ झुका देता है।
अब सवाल यह भी है कि क्या शशि थरूर को यह न्योता स्वीकार करना चाहिए था। कुछ लोग कहेंगे कि वह एक अंतरराष्ट्रीय छवि वाले नेता हैं और उनका वहां होना भारत के लिए फायदेमंद हो सकता था। यह भी हो सकता है कि उन्होंने अंदर जाकर रूस के साथ रिश्तों पर ऐसी बात रखी हो जो बाहर से संभव नहीं थी। लेकिन समस्या यह है कि हम यह कभी जान नहीं पाएंगे कि भीतर क्या बात हुई, जबकि बाहर यह संदेश साफ चला गया कि विपक्ष की सामूहिक आवाज़ को उस कमरे में जगह नहीं मिली।
पूर्व टीएमसी सांसद जवाहर सरकार का यह कहना कि उन्होंने मतभेद होने पर पार्टी और सांसद पद दोनों छोड़ दिए, एक कठोर उदाहरण है। हर व्यक्ति से ऐसा कदम उठाने की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि असहमति की कीमत क्या होनी चाहिए और उसकी सीमा कहां तक होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति कोई गुनाह नहीं, बल्कि उसकी जान है।
यशोवर्धन झा आज़ाद की यह बात भी गौर करने लायक है कि बाहरी दुनिया को हमें अपना लोकतंत्र दिखाना चाहिए। जब विदेशी नेता भारत आते हैं, तो वे केवल सरकार से नहीं, पूरे देश से मिलने आते हैं। देश में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन परंपराएं ही स्थिरता का अहसास कराती हैं। अगर वही परंपराएं कमजोर होती दिखें, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारी छवि भी प्रभावित होती है।
शशि थरूर ने कूटनीति को प्रतीक और सार दोनों का मिश्रण बताया। यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन प्रतीक अगर एकतरफा हो जाएं, तो वे संतुलन खो देते हैं। प्रधानमंत्री का एयरपोर्ट पर जाना, निजी कार में ले जाना, गीता का अनुवाद भेंट करना, यह सब प्रतीक हैं, सुंदर प्रतीक। लेकिन उतनी ही अहमियत यह भी रखती है कि लोकतंत्र के भीतर की विविध आवाज़ें भी उस प्रतीक में शामिल हों।
कांग्रेस के भीतर भी यह घटना एक आईने की तरह सामने आई है। पार्टी के कुछ नेता इसे सरकार की चाल मानते हैं, कुछ इसे थरूर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखते हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है। राजनीति में कोई भी कदम पूरी तरह मासूम नहीं होता, और कोई भी प्रतिक्रिया पूरी तरह स्वार्थ से खाली नहीं होती।
इस पूरे विवाद का एक आम नागरिक पर क्या असर पड़ता है, यह भी सोचने की बात है। सड़क पर चाय की दुकान पर बैठा आदमी शायद यह न जाने कि प्रोटोकॉल क्या होता है, लेकिन वह यह जरूर समझता है कि अगर विपक्ष के नेता को इज्जत नहीं मिली, तो कल उसकी आवाज़ की इज्जत भी घट सकती है। लोकतंत्र बड़े शब्दों से नहीं, छोटे अनुभवों से कमजोर या मजबूत होता है।
कुछ लोग कह रहे हैं कि यह सब बेकार का हंगामा है, असली मुद्दे तो अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी और महंगाई हैं। यह बात भी गलत नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि संस्थागत मर्यादा धीरे धीरे टूटती है, एक एक कदम करके। जब तक लोग बड़े मुद्दों पर जागते हैं, तब तक छोटे उल्लंघन बड़े ढांचे को खोखला कर चुके होते हैं।
सरकार के समर्थक यह भी पूछ रहे हैं कि क्या हर विदेशी दौरों और भोज में विपक्ष को बुलाना ज़रूरी है। तकनीकी रूप से शायद नहीं, लेकिन नैतिक रूप से यह हमेशा से बेहतर माना गया है। यही फर्क होता है सत्ता के पास बल होने और सत्ता के पास नैतिक बल होने में।
यह विवाद जल्द ही शांत भी हो सकता है। मीडिया अगली खबर पर चला जाएगा, सोशल मीडिया नया मुद्दा ढूंढ लेगा। लेकिन जो सवाल यहां उठे हैं, वे लंबे समय तक हमारे लोकतांत्रिक व्यवहार का पीछा करेंगे। क्या हम परंपरा को बोझ समझने लगे हैं, या वह अब भी हमारी राजनीति की राह दिखाने वाली रोशनी है।
शशि थरूर के लिए यह घटना शायद एक निजी कसौटी भी है। उन्हें अब यह तय करना होगा कि वह पार्टी के भीतर किस जगह खड़े हैं और बाहर उन्हें किस नजर से देखा जा रहा है। सरकार के लिए यह एक राजनीतिक जीत जैसा पल हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए यह एक चेतावनी है कि शक्ति के संकेत जितने चमकदार होते हैं, उतनी ही सावधानी की ज़रूरत भी होती है।
आखिर में सवाल बहुत सीधा है। क्या हम ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहां प्रतीक गिने चुने लोगों के लिए हों और बाकी के लिए दरवाज़े बंद हों। या फिर यह केवल एक चूक थी, जिससे सबक लेकर व्यवस्था खुद को सुधार लेगी। इस सवाल का जवाब किसी एक नेता, किसी एक पार्टी या किसी एक भोज में नहीं छिपा है। इसका जवाब हमारे सामूहिक व्यवहार, हमारी प्रतिक्रिया और हमारी अपेक्षाओं में छिपा है।
अगर हम नागरिक के रूप में यह मान लें कि नेता प्रतिपक्ष को न बुलाना कोई बड़ी बात नहीं, तो कल यह “कोई बड़ी बात नहीं” और आगे बढ़ जाएगी। और अगर हम यह कहें कि परंपरा और संतुलन ही लोकतंत्र की असली जान हैं, तो शायद अगली बार मेज़ पर कुर्सियों की गिनती अलग होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।