📍स्थान: क्वेटा, बलूचिस्तान, पाकिस्तान
📅 तारीख: 30 सितम्बर 2025
✍️ Asif Khan
क्वेटा के जरघून रोड पर हुए आत्मघाती धमाके ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दस लोगों की मौत और 32 घायल होने के बाद पूरे बलूचिस्तान में आपातकाल जैसी स्थिति है। सवाल ये है कि पाकिस्तान अपनी ही सरजमीं पर बार-बार क्यों नाकाम हो रहा है?
पाकिस्तान के बलूचिस्तान सूबे की राजधानी क्वेटा एक बार फिर खून और धुएँ की तस्वीर बन गया। जरघून रोड पर हुए आत्मघाती धमाके में 10 इंसानों की मौत हो गई और 32 से ज़्यादा लोग घायल हैं। सड़कों पर चीख-पुकार, अस्पतालों में अफरातफरी और हर चौराहे पर बंदूकें ताने खड़े सुरक्षाकर्मी – यही मंजर पूरी दुनिया ने देखा।
इस ब्लास्ट ने न सिर्फ पाकिस्तान की हुकूमत की नाकामी को उजागर किया बल्कि यह भी दिखाया कि बलूचिस्तान अब भी अस्थिरता और हिंसा का कैदी है।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन सबसे गरीब और सबसे पिछड़ा भी। यहां की आबादी लंबे वक्त से शिकायत करती रही है कि इस सूबे के संसाधनों का फायदा उन्हें नहीं मिलता। गैस, मिनरल्स और जियोग्राफिक लोकेशन – सब पाकिस्तान की फेडरल हुकूमत और सेना के लिए अहम हैं, मगर बलूच अवाम के लिए बेरोजगारी और हाशिये पर धकेला हुआ जीवन है।
यही हालात वहां बग़ावत और अलगाववाद की बुनियाद बने। बलूच मिलिटेंट ग्रुप्स ने कई बार पाकिस्तानी फौज और सरकारी ठिकानों पर हमला किया। हुकूमत ने जवाब में सख़्त कार्रवाई की, मगर नतीजा यह हुआ कि दहशत और नफ़रत का दायरा और बढ़ता चला गया।
इस बार का धमाका क्वेटा के दिल में हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ एक सुसाइड बॉम्बर ने भीड़भाड़ वाले इलाके को निशाना बनाया। धुएँ और आग की लपटों ने लोगों को दहशत में डाल दिया। कुछ ही मिनटों में पूरा शहर पुलिस और आर्मी की गाड़ियों से भर गया।
डॉक्टरों का कहना है कि घायलों की हालत गंभीर है। बलूचिस्तान मेडिकल कॉलेज और सिविल हॉस्पिटल में इमरजेंसी घोषित कर दी गई। वहां मौजूद एक चश्मदीद ने कहा – “हम सोचे भी नहीं थे कि हमारे शहर में इतने बड़े पैमाने पर खूनखराबा होगा। हर तरफ चीखें गूंज रही थीं।”
क्वेटा और बलूचिस्तान में धमाके कोई नई बात नहीं। पिछले एक महीने में यह दूसरा बड़ा हमला है। इससे पहले 2 सितम्बर को पूर्व मुख्यमंत्री अख़्तर मेंगल के काफ़िले पर हमला हुआ था।
सवाल यह है कि पाकिस्तान अपनी ही सरज़मीं पर बार-बार क्यों नाकाम हो रहा है? क्या इंटेलिजेंस एजेंसियां कमजोर हैं या फिर आतंकवादियों को पकड़ने की नीयत ही अधूरी है?
दरअसल, पाकिस्तान की सुरक्षा पॉलिसी हमेशा से “आंतरिक विरोध” और “बाहरी दुश्मन” के बीच झूलती रही है। एक तरफ वो अफ़ग़ान बॉर्डर पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जूझता है, दूसरी तरफ बलूच अलगाववादियों से। मगर नतीजा यह है कि आम लोग बार-बार बम धमाकों और गोलियों की जद में आ जाते हैं।
दुनिया की नज़रें बलूचिस्तान पर लंबे वक्त से हैं। यह इलाका सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि चीन और अमेरिका जैसे मुल्कों के लिए भी अहम है।
चीन का CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) क्वेटा और ग्वादर पोर्ट से होकर गुजरता है। अगर इस इलाके में अस्थिरता रहेगी तो चीन के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट खतरे में पड़ जाएंगे। यही वजह है कि बीजिंग हर बार इस तरह के धमाकों पर चिंता जताता है।
वहीं अमेरिका और यूरोपियन यूनियन पहले ही पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ “सख़्त कदम” उठाने की नसीहत देते रहे हैं। मगर हकीकत यह है कि हालात बेहतर होने की बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं।
भारत के लिए बलूचिस्तान हमेशा से चिंता का विषय रहा है। अफग़ानिस्तान से लेकर क्वेटा तक जो भी अस्थिरता होती है उसका सीधा असर दक्षिण एशिया की शांति पर पड़ता है।
भारतीय मीडिया ने इस धमाके को पाकिस्तान की “सुरक्षा विफलता” कहा है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन पर पल रहे आतंकी ठिकानों को खत्म नहीं करेगा, तब तक ऐसे ब्लास्ट रुकने वाले नहीं।
बलूचिस्तान की अवाम दो तरफा मुश्किल में है। एक तरफ उन्हें मिलिटेंट ग्रुप्स का खौफ़ है जो सरकारी ठिकानों और आम लोगों को निशाना बनाते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तानी फौज की सख़्त कार्रवाई है जिसमें कई बार निर्दोष लोग भी मारे जाते हैं।
इस दोहरी मार ने वहां के नौजवानों को और ज़्यादा नाराज़ कर दिया है। बेरोजगारी, तालीम की कमी और हेल्थ सुविधाओं का अभाव – यह सब मिलकर वहां के लोगों को हताश कर रहे हैं।
इस धमाके के कुछ ही घंटों बाद #QuettaBlast और #Balochistan ट्विटर (X) पर ट्रेंड करने लगे।
फेसबुक और इंस्टाग्राम पर खून से लथपथ तस्वीरें वायरल हो गईं।
कुछ लोग पाकिस्तान की हुकूमत पर बरस रहे थे, कुछ सीधे सेना को जिम्मेदार ठहरा रहे थे।
मगर सबसे दर्दनाक थीं वो पोस्ट्स जो घायलों के परिजनों ने डालीं – “मेरा भाई लापता है, किसी को जानकारी हो तो बताएं।”
बलूचिस्तान की यह कहानी नई नहीं है। जब तक वहां की अवाम को बराबरी का हक़ नहीं मिलेगा, जब तक उनकी आवाज़ को सुना नहीं जाएगा, तब तक बारूद की गंध वहां से मिटने वाली नहीं।
पाकिस्तान को चाहिए कि वह सुरक्षा को सिर्फ बंदूकों और चेकपोस्ट तक सीमित न रखे, बल्कि लोगों के दिल जीतने की कोशिश करे।
इंटरनेशनल कम्युनिटी को भी बलूचिस्तान को सिर्फ “स्ट्रेटेजिक कॉरिडोर” की नजर से नहीं देखना चाहिए, बल्कि वहां की अवाम की तकलीफ को भी समझना होगा।
फ्रंटियर कांस्टेबुलरी पर हमला
इस्लामाबाद का दावा है कि FC बलूचिस्तान में अमन-ओ-अमान कायम रखने और CPEC की हिफाज़त करने वाली फ़ोर्स है। लेकिन FC के दफ़्तर पर हमला यह बताता है कि हाई-सिक्योरिटी ज़ोन भी सेफ़ नहीं रहे। चंद सेकंड्स में 10 जानें गईं और 30 से ज़्यादा लोग जख़्मी हुए। अफ़वाहें थीं कि हमले के बाद गनफायरिंग भी हुई, जिससे यह एक "Suicide Assault" ऑपरेशन बन गया।
BNP रैली पर हमला
2 सितंबर की शाम शाहवानी स्टेडियम के बाहर BNP की रैली ख़त्म हो रही थी, तभी ब्लास्ट ने 11 से ज़्यादा जानें ले लीं। टार्गेट BNP चीफ़ अख़्तर मेंगल थे, जो बलूच ग़ायब शुदा अफ़राद की रिहाई की मांग करते रहे हैं। हमला मैसेज था कि सियासी और मॉडरेट आवाज़ें भी अब महफ़ूज़ नहीं।
2024 से 2025 तक बलूच मूवमेंट ने "लो-इंटेंसिटी" इन्सर्जेन्सी से "हाई-ऑपरेशनल" स्ट्रक्चर की तरफ़ छलांग लगाई।
BLA (बलोच लिबरेशन आर्मी) और उसके ब्रिगेड, जैसे मज़ीद ब्रिगेड, हाई-प्रोफाइल टार्गेट्स चुन रहे हैं।
BRAS (बलोच राज़ी आज़ोई संग़र) का अलायंस BLF जैसे ग्रुप्स को जोड़ता है।
TTP और ISKP भी अपनी-अपनी पहचान बनाने के लिए क्वेटा में एक्टिव रहते हैं।
टैक्टिकल शिफ़्ट
बलूच ग्रुप अब सिर्फ़ रोडसाइड बम या स्मॉल अटैक तक सीमित नहीं हैं। क्वेटा रेलवे स्टेशन (2024), जाफ़र एक्सप्रेस (2025) और FC हेडक्वार्टर (2025) जैसे ऑपरेशन यह दिखाते हैं कि उनकी "सिटी-वारफ़ेयर" कैपेसिटी बढ़ चुकी है।
CPEC पर हमला
CPEC, जो पाकिस्तान की "इकॉनॉमिक ग़ज़बगाह" कहलाती है, बलूच रेसिस्टेंस की निगाह में "इस्तेआमारी (colonial)" प्रोजेक्ट है। जरघून रोड पर FC हेडक्वार्टर पर हमला दरअसल CPEC की हिफ़ाज़त करने वाले स्ट्रक्चर पर डाइरेक्ट वार था।
आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर
बलूचिस्तान पाकिस्तान का 44% ज़मीन और नेचुरल गैस-खनिज का खज़ाना रखता है, लेकिन सबसे गरीब और पिछड़ा प्रांत बना हुआ है। बलूच नज़रिए से पंजाब और GHQ (Rawalpindi) सब कुछ ले जाते हैं, बदले में फक़त दमन और फ़ोर्स।
लापता व्यक्ति
एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि 2011 से अब तक 10 हज़ार से ज़्यादा बलूच लापता हैं। 2025 में ही 785 केस रिपोर्ट हुए। माएँ और बहनें कोर्ट और सड़कों पर रो रही हैं, लेकिन राज्य खामोश है। यही ख़ामोशी BLA और BLF के लिए सबसे बड़ा भर्ती नारा बन जाती है।
External Blame Game
हर ब्लास्ट के बाद इस्लामाबाद "India-backed terrorism" का इल्ज़ाम लगाता है। लेकिन असल मसला CPEC की स्ट्रक्चर, सिक्योरिटी दमन और पॉलिटिकल डायलॉग की कमी है। बाहर की साज़िश का हवाला दे कर अंदर की नाकामी छुपाना अब मुश्किल हो रहा है।
China के लिए यह सीधी सिक्योरिटी चैलेंज है। बीजिंग हर साल अरबों डालर CPEC में लगाता है, लेकिन बलूच हमले उसके वर्कर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को टार्गेट कर रहे हैं।
Iran और Pakistan के बीच बॉर्डर पर हवाई हमले यह साबित करते हैं कि विद्रोह सरहद पार भी फैल सकता है।
India Factor पर इल्ज़ाम लगाना साउथ एशिया की स्ट्रेटेजिक पॉलिटिक्स को और उलझा रहा है।
जवाबदेही और इंसाफ़
बलूचिस्तान में FC और आर्मी के हाथों इंसानी हक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ियां रुकें। जब तक ग़ायब शुदा अफ़राद के केस हल नहीं होते, डायलॉग बेकार रहेगा।
पॉलिटिकल डायलॉग
BNP और मॉडरेट बलूच लीडरशिप से बग़ैर शर्त बातचीत होनी चाहिए। ये ही रास्ता है जिससे हथियारबंद रेसिस्टेंस कम हो सकता है।
CPEC की री-स्ट्रक्चरिंग
लोकल एम्प्लॉयमेंट, राजस्व शेयरिंग और पारदर्शिता के बग़ैर CPEC बलूच के लिए "economic colonization" ही रहेगा।
क्वेटा के धमाके एक अलार्म हैं। यह बताते हैं कि बलूचिस्तान का मसला सिर्फ़ सिक्योरिटी का नहीं, बल्कि हक़ूक़, इंसाफ़ और सियासी इख़्तियार का है। पाकिस्तान अगर इस मसले को सिर्फ़ "दमन और डिफ़ेंस" से हल करना चाहता है, तो यह एक "permanent security quagmire" बनेगा। लेकिन अगर इंसाफ़, पॉलिटिकल डायलॉग और रिसोर्स कंट्रोल बलूच को दिया जाए, तो यही मसला "solution" बन सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।