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नई दिल्ली | 25 सितंबर 2026
By Mohd Naved
ज्ञानेश कुमार पर राहुल गांधी का हमला, सरकारी गवाह बनने की सलाह
नई दिल्ली में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने और कथित चुनावी गड़बड़ियों के मामले में सरकारी गवाह बनने की सलाह दी। राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हो गई है।
हालांकि, राहुल गांधी के आरोप अभी राजनीतिक दावे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों को स्वीकार करने वाला कोई आधिकारिक बयान नहीं मिला है। इसके उलट चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने कहा है कि एसआईआर समेत आयोग के फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए और निर्णय प्रक्रिया में सर्वसम्मति थी।
मुख्य विवाद की शुरुआत कहां से हुई
विवाद की मौजूदा कड़ी द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट से जुड़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं।
इन कथित आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची के प्रबंधन, नए मतदाताओं के पंजीकरण, फॉर्म 6 में बदलाव, चुनावी डेटा तक पहुंच और मतदाता नामों को हटाने जैसी प्रक्रियाओं से बताया गया है। रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ कदमों को लेकर गंभीर प्रक्रियागत सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।
एसआईआर पर क्या है विवाद
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यह प्रक्रिया बिहार में जून 2025 में शुरू हुई थी और बाद में कई राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची। रिपोर्ट में कहा गया कि ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे, जिससे चुनाव आयोग की भूमिका और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर व्यापक बहस शुरू हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मतदाता सूची से किसी नाम का ड्राफ्ट स्तर पर हटना अपने आप में वोट चोरी या चुनाव में धांधली का प्रमाण नहीं है। इसके पीछे पात्रता, दस्तावेज, पता, मृत्यु या स्थान परिवर्तन जैसे अलग-अलग प्रशासनिक कारण हो सकते हैं। इसी वजह से किसी भी निष्कर्ष के लिए अंतिम मतदाता सूची, आपत्तियों की प्रक्रिया और संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
राहुल गांधी ने क्या कहा
24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियां सामने आने के बाद अब उन्हें अपनी स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और सरकारी गवाह बन जाना चाहिए।
राहुल गांधी ने चुनाव प्रक्रिया में कथित हेरफेर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य लोगों पर भी आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि चुनावों में धांधली के बारे में पर्याप्त जानकारी मौजूद है। ये दावे कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति और राहुल गांधी के लंबे समय से चले आ रहे वोट चोरी के आरोपों का हिस्सा हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना अभी उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी ने दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को भी महत्वपूर्ण बताया और कहा कि उन्होंने आंतरिक प्रक्रिया के बारे में सामने आकर बात की है।
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बीजेपी ने क्या जवाब दिया
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बीजेपी ने उनके आरोपों को खारिज किया। बीजेपी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के दावों के आधार और इस्तेमाल की गई रिपोर्ट पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया कानूनी ढांचे के तहत चलती है और फैसले बहुमत तथा संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर लिए जाते हैं।
बीजेपी ने यह भी सवाल उठाया कि राहुल गांधी की प्रस्तुति में जिन दावों का इस्तेमाल किया गया, उनके लिए प्रत्यक्ष और प्रमाणित आधार क्या है। त्रिवेदी ने कांग्रेस के अलग-अलग राज्यों में चुनावी प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी की एंटी-इनकंबेंसी संबंधी दलील पर भी पलटवार किया।
बीजेपी का मुख्य तर्क यह है कि चुनाव आयोग की आंतरिक चर्चा या किसी अधिकारी की आपत्ति को संस्थागत निर्णय में धांधली के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह राजनीतिक पक्ष है और इसे चुनाव आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण से अलग समझना जरूरी है।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने रिपोर्ट में बताए गए आंतरिक मतभेद की व्याख्या को चुनौती दी। अधिकारियों के अनुसार एसआईआर समेत आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे और निर्णय सर्वसम्मति से हुए।
इसलिए मौजूदा विवाद में तीन अलग-अलग स्तर के दावे सामने हैं। पहला, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दर्ज की गई कथित आपत्तियां। दूसरा, राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप कि इन घटनाओं से चुनाव प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी साबित होती है। तीसरा, चुनाव आयोग का पक्ष कि संस्थागत फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
इन तीनों को एक ही तथ्य के रूप में मिलाना पत्रकारिता की दृष्टि से सही नहीं होगा।
14 आपत्तियों का महत्व क्या है
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कथित आपत्तियों में फॉर्म 6 से जुड़े बदलाव, चुनावी डेटा के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से संबंधित अपील और गोवा में कुछ पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसे मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी सॉफ्टवेयर और डेटा के संचालन को लेकर सवाल उठाए और अपनी चिंताओं को आगे के स्तर तक पहुंचाया।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग भारत के चुनावी ढांचे की संवैधानिक संस्था है। उसके फैसलों की पारदर्शिता, मतदाता सूची की शुद्धता और आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर उठे सवाल सीधे चुनावी भरोसे से जुड़े होते हैं।
लेकिन किसी संस्थागत मतभेद को चुनाव में धांधली का अंतिम प्रमाण मानने से पहले संबंधित दस्तावेजों, फैसलों, मतदाता सूची के आंकड़ों और कानूनी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
ज्ञानेश कुमार कौन हैं
ज्ञानेश कुमार वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की प्रोफाइल रिपोर्ट के अनुसार वे 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और मौजूदा चुनाव आयोग के नेतृत्व में एसआईआर को लेकर विपक्ष की लगातार आलोचना का सामना कर चुके हैं।
उनके कार्यकाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर विवाद राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग ने अपने निर्णयों का बचाव किया है।
विवाद अब किस मोड़ पर है
फिलहाल राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई है। उन्होंने कथित चुनावी गड़बड़ी को लेकर आगे जांच की बात भी कही है। दूसरी ओर बीजेपी ने आरोपों को खारिज करते हुए उनके आधार पर सवाल उठाए हैं। चुनाव आयोग का उपलब्ध पक्ष यह है कि एसआईआर से जुड़े फैसले संस्थागत प्रक्रिया और सर्वसम्मति से लिए गए।
इस विवाद का अगला अहम चरण दस्तावेजी और संस्थागत जवाबों से तय होगा। यदि कथित आपत्तियों के मूल रिकॉर्ड सार्वजनिक होते हैं, तो उनसे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन मुद्दों पर असहमति थी, किस स्तर पर निर्णय लिया गया और अंतिम आदेश किस प्रक्रिया से जारी हुए।
इसी तरह मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर भी वास्तविक प्रभाव समझने के लिए ड्राफ्ट और अंतिम सूची, दावों-आपत्तियों के निपटारे तथा नाम हटाने और जोड़ने के आधिकारिक आंकड़ों की समीक्षा जरूरी होगी।
ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बनने की राहुल गांधी की सलाह मौजूदा चुनाव आयोग विवाद को एक नए राजनीतिक स्तर पर ले गई है। इसके पीछे चुनाव आयोग के भीतर कथित 14 आपत्तियों वाली रिपोर्ट और एसआईआर को लेकर चल रही बहस है।
लेकिन अभी उपलब्ध सामग्री से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि चुनावों में धांधली साबित हो चुकी है। एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों पर आधारित इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। बीजेपी भी राहुल गांधी के आरोपों के आधार पर सवाल उठा रही है।
अब सार्वजनिक बहस का केंद्र आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेज, प्रक्रिया, मतदाता सूची के सत्यापन और संस्थागत जवाबदेही पर होना महत्वपूर्ण होगा। यही तथ्य इस पूरे विवाद की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट करेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।