चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर से जुड़े फैसलों पर दो आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी ने तीखा हमला बोला। आयोग ने सभी फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 23 सितंबर 2026
✍️ मोहम्मद नावेद
राहुल गांधी का चुनाव आयोग पर हमला
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर तीखा हमला बोला है। यह प्रतिक्रिया ऐसी रिपोर्ट के बाद सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार औपचारिक आपत्ति दर्ज की।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में कुछ फैसलों को लेकर उनकी ओर से जानकारी या सहमति के अभाव की बात भी कही गई है।
राहुल गांधी की तीखी प्रतिक्रिया
रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर अपने पुराने आरोपों को फिर धार दी। उन्होंने चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों पर देशहित के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया और कहा कि समय आने पर ऐसे लोगों की जवाबदेही तय की जाएगी।
राहुल गांधी इससे पहले भी मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। अगस्त 2025 में उन्होंने आयोग पर वोट चोरी में शामिल होने का आरोप लगाया था और कहा था कि जिम्मेदार अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। चुनाव आयोग ने उस समय इन आरोपों को बेबुनियाद और गैरजिम्मेदाराना बताया था।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट में क्या है
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियां कई अहम मुद्दों से जुड़ी थीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में बदलाव, मतदाता डेटा के प्रबंधन और कुछ राज्यों में मतदाता नाम हटाने तथा बहाली की प्रक्रिया शामिल थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम के नियंत्रण को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने को लेकर चिंता जताई थी। कुछ मामलों में राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका और सिस्टम में उनके फैसलों को दर्ज करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे।
एसआईआर को लेकर विवाद क्यों बढ़ा
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर मतदाता सूचियों की समीक्षा और शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। इसका मकसद मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र, मृत या दोहरे पंजीकरण जैसे मामलों की पहचान करना है।
हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि पात्र मतदाताओं का नाम किसी गलती या दस्तावेजी समस्या के कारण सूची से बाहर न हो जाए। इसी वजह से मतदाता डेटा की प्रक्रिया, अपील व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर बहस तेज हुई है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिहार में जून 2025 से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। रिपोर्ट में कहा गया कि ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। यह आंकड़ा ड्राफ्ट स्तर की प्रक्रिया से जुड़ा है और इसे अंतिम रूप से मताधिकार से वंचित लोगों की संख्या के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग का पक्ष
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के सूत्रों ने दो चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच मतभेद की तस्वीर को खारिज किया। आयोग की ओर से बताया गया कि एसआईआर समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए।
टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग के सूत्रों ने कहा कि दोनों आयुक्तों ने कुछ मुद्दों पर सवाल या आपत्तियां जरूर उठाई थीं, लेकिन अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए।
इसलिए मौजूदा विवाद में दो अलग-अलग दावे सामने हैं। एक तरफ रिपोर्ट में औपचारिक आपत्तियों और प्रक्रियागत असहमति का उल्लेख है। दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सभी आयुक्तों की मंजूरी से हुए।
विवाद का राजनीतिक असर
इस रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल और तेज कर दिए हैं। कई विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए जवाबदेही की मांग की है।
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि मतदाता सूची की शुद्धता सीधे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ी है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।
राजनीतिक आरोप और संस्थागत तथ्य
राहुल गांधी की ओर से चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोप राजनीतिक दावे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में इन आरोपों को अपने आप में प्रमाणित तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
दूसरी ओर, दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित रूप से दर्ज की गई आपत्तियां एक अलग संस्थागत तथ्य हैं, जिसकी रिपोर्टिंग इंडियन एक्सप्रेस ने अपने दस्तावेजी आधार पर की है। आयोग ने इस रिपोर्ट की व्याख्या को स्वीकार नहीं किया और सभी अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।
आगे क्या होगा
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि चुनाव आयोग इन कथित आपत्तियों से जुड़े रिकॉर्ड और प्रक्रियाओं पर कितना विस्तृत स्पष्टीकरण देता है। साथ ही, एसआईआर के तहत मतदाता सूची में हुए बदलावों, नाम हटाने की प्रक्रिया और अपील के अधिकार पर भी सार्वजनिक तथा न्यायिक निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।
मतदाता के लिए मूल सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू राजनीतिक बयानबाजी से अलग मतदाता के अधिकार से जुड़ा है। मतदाता सूची में पात्र नागरिक का नाम सही तरीके से दर्ज रहना और गलत तरीके से हटाए गए नाम के लिए प्रभावी अपील व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बुनियादी हिस्से हैं।
फिलहाल उपलब्ध सूचनाएं एक तरफ आयोग के भीतर दर्ज कथित आपत्तियों और दूसरी तरफ आयोग के सर्वसम्मत निर्णय के दावे को सामने रखती हैं। आगे की पारदर्शी जानकारी और आधिकारिक रिकॉर्ड ही यह स्पष्ट करेंगे कि इन आपत्तियों का वास्तविक प्रशासनिक प्रभाव कितना था।
राहुल गांधी का हमला इस राजनीतिक विवाद को और तीखा करता है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष के लिए आरोपों, आयोग के जवाब और संबंधित दस्तावेजों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।