📍नई दिल्ली ✍️Asif Khan
आरबीआई द्वारा रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती और जीडीपी अनुमान बढ़ाने के फैसले ने बाजार को नई दिशा दी है। यह फैसला आम आदमी, निवेशकों और सरकार तीनों के लिए क्या मायने रखता है, इसी का संतुलित विश्लेषण।
रेपो रेट में एक और कटौती की खबर सुनते ही बाजार की धड़कन तेज हो जाती है। जैसे किसी शांत झील में अचानक पत्थर गिरा दिया गया हो। शुक्रवार की सुबह जब RBI गवर्नर ने यह घोषणा की, तो शेयर बाजार ने फौरन प्रतिक्रिया दी, बैंकिंग सेक्टर में रौनक आ गई और आम आदमी के मन में एक सी उम्मीद जागी कि शायद अब मासिक किश्त कुछ हल्की हो जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फैसला वाकई हर तबके तक बराबरी से पहुंच पाएगा, या फिर यह राहत हमेशा की तरह कुछ सीमित दायरों में ही सिमट कर रह जाएगी।
पिछले एक साल में लगातार चार बार रेपो रेट में कटौती होना कोई मामूली घटना नहीं है। कुल मिलाकर एक सौ पच्चीस बेसिस प्वाइंट की गिरावट अपने आप में बहुत बड़ा संकेत है। इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं कि ब्याज सस्ता हो रहा है, बल्कि यह भी कि मौद्रिक नीति लगातार विकास को सहारा देने की कोशिश में लगी हुई है। लेकिन हर सस्ते फैसले के पीछे एक महंगी जिम्मेदारी भी छिपी होती है। जब ब्याज दरें गिरती हैं, तो कर्ज लेना आसान होता है, लेकिन बचत पर मिलने वाला रिटर्न भी कमजोर पड़ने लगता है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार को ही देख लीजिए। अगर किसी ने घर के लिए लोन लिया है, तो उसकी किश्त अब कुछ हजार रुपये कम हो सकती है। यह राहत सुनने में छोटी लगती है, लेकिन हर महीने के बजट में यही छोटे-छोटे आंकड़े बड़ा फर्क पैदा करते हैं। दूसरी तरफ वही परिवार अगर फिक्स्ड डिपॉजिट में पैसे रखता है, तो अब उसे पहले जितना ब्याज नहीं मिलेगा। यानी एक तरफ से राहत, दूसरी तरफ से नरमी। यही मौद्रिक नीति की असली चाल है, जिसमें फायदा और नुकसान एक ही सांस में चलते हैं।
इस बार आरबीआई ने सिर्फ रेपो रेट ही नहीं घटाया, बल्कि जीडीपी ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाया है। सात दशमलव तीन प्रतिशत की वृद्धि का लक्ष्य सुनने में बहुत भरोसेमंद लगता है। इसका सीधा संदेश यही है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार सरकार और नीति निर्माताओं को मजबूत नजर आ रही है। लेकिन आंकड़ों की यह दुनिया अक्सर आम जिंदगी से थोड़ी दूर खड़ी रहती है। किसी छोटे दुकानदार से पूछिए, किसी दिहाड़ी मजदूर से बात कीजिए, तो वह आपको बताएगा कि ग्रोथ का यह प्रतिशत उसकी प्लेट में रखी रोटी से सीधा जुड़ा हुआ नहीं दिखता।
महंगाई को लेकर इस बार जो अनुमान सामने आया है, वह कागज पर तो बहुत सुकून देने वाला है। दो प्रतिशत के आसपास की महंगाई किसी भी देश के लिए एक आरामदायक स्थिति मानी जाती है। लेकिन यह भी सच है कि सब्जी के दाम, दूध का भाव और बच्चों की स्कूल फीस इन अनुमानों से अलग अपनी ही चाल चलते हैं। आंकड़ों की दुनिया में महंगाई नीचे जाती दिखती है, मगर बाजार की टोकरीनुमा सच्चाई में कई बार वही पुरानी चुभन अब भी बनी रहती है।
आरबीआई की नीति का एक और पहलू है, जो कम चर्चा में रहता है, वह है रुपये की कमजोरी। डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग नब्बे के स्तर के आसपास घूम रहा है। यह संकेत है कि वैश्विक दबाव अभी खत्म नहीं हुए हैं। सस्ता रुपया निर्यातकों के लिए तो राहत बन सकता है, लेकिन आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए यह जोखिम भी पैदा करता है। पेट्रोल, गैस और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसी चीजों की कीमतों पर इसका असर धीरे-धीरे जनता तक पहुंचता है।
शेयर बाजार की तेज प्रतिक्रिया यह बताती है कि निवेशकों को इस फैसले से बड़ा आत्मविश्वास मिला है। सेंसेक्स और निफ्टी की छलांग सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की झलक है जो बाजार को नीति पर है। बैंकिंग शेयरों में जो तेजी दिखी, वह इस बात का संकेत है कि लोन की मांग बढ़ने की उम्मीद पहले से ही बन चुकी है। लेकिन बाजार का यह उत्साह हमेशा स्थायी नहीं होता। इतिहास गवाह है कि बाजार कभी-कभी उम्मीद से ज्यादा तेजी से ऊपर चढ़ता है और फिर उतनी ही तेजी से नीचे भी आ जाता है।
यहां एक जरूरी सवाल उठता है कि लगातार कटौती के बाद भी क्या कर्ज लेना वाकई आसान हो गया है। कागज पर ब्याज कम है, लेकिन बैंक अब भी अपने जोखिम देखकर ही लोन देते हैं। छोटे कारोबारियों को आज भी बिना गारंटी के लोन लेना मुश्किल लगता है। बड़े कॉरपोरेट को पैसे आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन छोटे दुकानदार और स्वरोजगार करने वाला आदमी आज भी बैंक के चक्कर काटता रहता है। यानी नीति का फायदा बराबरी से बंटता नहीं दिखता।
सरकार और आरबीआई के रिश्ते को भी इस फैसले के आईने में देखने की जरूरत है। एक तरफ सरकार को विकास की रफ्तार तेज चाहिए, ताकि रोजगार बने और राजस्व बढ़े। दूसरी तरफ आरबीआई को महंगाई और मुद्रा संतुलन की जिम्मेदारी निभानी होती है। कई बार ये दोनों लक्ष्य एक-दूसरे से टकराते हुए दिखते हैं। इस बार लगता है कि दोनों ही पक्ष एक सुर में चलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि यह तालमेल कब तक बना रहेगा।
रेपो रेट की इस कटौती से रियल एस्टेट सेक्टर में भी नई हलचल की उम्मीद है। घर खरीदने का सपना देखने वाले लाखों लोगों के लिए यह एक पॉजिटिव संकेत हो सकता है। सस्ती किश्त का मतलब है कि ज्यादा लोग अब घर खरीदने का मन बना सकते हैं। लेकिन जमीन के दाम, निर्माण लागत और सरकारी टैक्स जैसे तत्व भी इस सपने को महंगा बना देते हैं। सिर्फ ब्याज घटने से ही सब कुछ आसान हो जाएगा, ऐसा सोचना थोड़ी जल्दीबाजी होगी।
स्टूडेंट लोन और एजुकेशन सेक्टर पर भी इस फैसले का असर पड़ेगा। उच्च शिक्षा पहले ही आम आदमी के लिए भारी खर्च बन चुकी है। अगर लोन सस्ता होता है तो कुछ राहत जरूर मिलेगी, लेकिन शिक्षा की कुल लागत लगातार बढ़ रही है। यहां भी नीति का लाभ तब तक अधूरा रहेगा, जब तक शिक्षा को सच में सुलभ बनाने की ठोस कोशिश नहीं होती।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी यह फैसला उम्मीद की नई किरण लेकर आया है। अगर बैंक सस्ते कर्ज को खेती और छोटे व्यापार तक पहुंचाते हैं तो गांवों में निवेश बढ़ सकता है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नीति की भाषा शहरों से गांवों तक पहुंचते-पहुंचते अपना असर खो देती है। किसान आज भी साहूकार के महंगे कर्ज के जाल में फंसा रहता है, क्योंकि बैंकिंग प्रक्रिया उसके लिए जटिल और दूर लगती है।
इस पूरी तस्वीर का एक वैश्विक पहलू भी है। दुनिया के कई बड़े देश अपनी ब्याज दरों को लेकर सतर्क हैं। कहीं महंगाई दोबारा सिर उठा रही है, तो कहीं मंदी का डर बना हुआ है। ऐसे माहौल में भारत का यह कदम साहसिक तो है, लेकिन जोखिम से खाली नहीं। अगर वैश्विक बाजार में बड़ा झटका आता है तो उसका असर हमारी नीतियों पर भी पड़ सकता है।
आरबीआई ने लिक्विडिटी को लेकर जो प्रावधान किए हैं, वे भी बहुत अहम हैं। खुले बाजार में बांड खरीद और डॉलर स्वैप जैसे कदम यह बताते हैं कि सिस्टम में नकदी बनाए रखने की पूरी तैयारी है। इसका सीधा लाभ यह होगा कि बैंकों के पास कर्ज देने के लिए पैसे की कमी नहीं होगी। लेकिन नकदी ज्यादा होने का मतलब यह भी हो सकता है कि अगर मांग जरूरत से ज्यादा बढ़ी तो महंगाई लौटकर दरवाजा खटखटा सकती है।
यहां एक बुनियादी सवाल उठता है कि क्या हम विकास को सिर्फ कर्ज के भरोसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। अगर उपभोग सिर्फ उधार के पैसे से बढ़ेगा, तो यह मॉडल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ नहीं रहेगा। असली मजबूती तब आएगी जब लोगों की आय स्थायी रूप से बढ़ेगी, कारोबार को स्थिर बाजार मिलेगा और रोजगार के मौके वास्तविक रूप से बनेंगे।
एक आम नौकरीपेशा इंसान के लिए यह खबर दो भाव लेकर आई है। एक तरफ खुशी है कि लोन सस्ता हो रहा है, दूसरी तरफ चिंता है कि बचत पर मिलने वाला ब्याज कम होगा। जो लोग रिटायरमेंट के करीब हैं, उनके लिए यह चिंता और गहरी है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा ब्याज पर निर्भर करता है। इस लिहाज से देखें तो मौद्रिक नीति का हर फैसला समाज के अलग-अलग वर्गों पर अलग-अलग असर छोड़ता है।
रेपो रेट में लगातार कटौती यह भी दिखाती है कि नीति निर्माता मांग को जगाने की कोशिश में हैं। वे चाहते हैं कि लोग ज्यादा खर्च करें, बाजार में लेन-देन बढ़े, और उत्पादन को सहारा मिले। लेकिन खर्च तभी बढ़ेगा जब आम आदमी को यह भरोसा होगा कि उसकी नौकरी सुरक्षित है और भविष्य अनिश्चित नहीं है। सिर्फ सस्ती दरों से उपभोग बढ़ाना हमेशा कारगर साबित नहीं होता।
आर्थिक फैसलों का असर सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि मनोविज्ञान में भी उतरता है। जब बार-बार यह संदेश जाता है कि हालात बेहतर हो रहे हैं, तो लोग जोखिम लेने के लिए तैयार होते हैं। निवेश बढ़ता है, नए कारोबार शुरू होते हैं। लेकिन अगर जमीनी हकीकत इस संदेश से मेल न खाए, तो भरोसा जल्दी टूट भी सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया और विशेषज्ञों की भूमिका भी अहम हो जाती है। अगर सिर्फ सकारात्मक तस्वीर दिखाई जाए और चुनौतियों पर चुप्पी रहे, तो समाज को अधूरी जानकारी मिलती है। जरूरत इस बात की है कि फैसले की तारीफ भी हो और उसके जोखिमों पर ईमानदार बहस भी।
अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि रेपो रेट में यह कटौती अपने आप में न तो पूरी तरह वरदान है और न ही अभिशाप। यह एक औजार है, जिसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इसका इस्तेमाल कैसे और किस दिशा में किया जाता है। अगर बैंक, सरकार और बाजार मिलकर इसे आम आदमी तक सही तरीके से पहुंचा पाए, तो यह कदम सच में अर्थव्यवस्था की धड़कन को मजबूत बना सकता है। लेकिन अगर यह राहत सिर्फ आंकड़ों और शेयर बाजार की स्क्रीन तक सीमित रही, तो यह फैसला एक सुनहरी खबर बनकर रह जाएगा, जिसकी चमक जमीन तक पहुंचते-पहुंचते फीकी पड़ जाती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।