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RELOS Defence Deal : भारत-रूस की रणनीतिक साझेदारी का नया दौर

None 2025-12-03 16:28:17
RELOS Defence Deal : भारत-रूस की रणनीतिक साझेदारी का नया दौर

पुतिन यात्रा से पहले न्यूक्लियर और डिफेंस सहयोग में बड़ी प्रगति

रूस-भारत लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौते से सेना को बड़ी बढ़त

भारत और रूस ने RELOS डिफेंस एग्रीमेंट और असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग को पुतिन की भारत यात्रा से पहले मंजूरी दी। यह कदम दोनों देशों की सैन्य क्षमता, लॉजिस्टिक सपोर्ट और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देता है।

📍New Delhi ✍️ Asif Khan

RELOS डिफेंस डील ने भारत-रूस रिश्तों को नई मजबूती दी

भारत और रूस के दरमियान जो नया दौर शुरू हो रहा है, वह केवल कागज पर लिखे गए समझौतों का मामला नहीं है। यह असल में उस भरोसे की कहानी है जो दशकों से दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद बना हुआ है। अभी जो सबसे अहम विकास सामने आया है, वह है रूस की संसद द्वारा रिक्रिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट (RELOS) समझौते को औपचारिक मंजूरी। इसके साथ ही पुतिन की भारत यात्रा से पहले असैन्य परमाणु सहयोग पर नए समझौते को हरी झंडी भी मिल गई है। यह दो अलग-अलग कदम हैं, मगर दोनों मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाते हैं: भारत और रूस के रिश्ते न केवल स्थिर हैं बल्कि बदलती दुनिया की राजनीति के बीच खुद को नए सिरे से मजबूत भी कर रहे हैं।

यह पूरा मामला सिर्फ डिप्लोमैसी की औपचारिकता नहीं है। रूस की स्टेट डूमा में जब RELOS को मंजूरी दी गई, तो स्पीकर व्याचेस्लाव वोलोदिन ने साफ कहा कि रिश्ते सिर्फ पुराने नहीं, बल्कि रणनीतिक और व्यापक हैं। इसी तरह की भाषा अक्सर राजनयिक बयानबाज़ी में सुनाई देती है, लेकिन इस बार जो बात दिलचस्प है, वह है इसका व्यावहारिक असर। समझौता कहता है कि दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इलाकों, बंदरगाहों, एयरफील्ड्स और बेस का उपयोग कर सकेंगी। यह सिर्फ एक औपचारिक अनुमति नहीं है; यह वह मॉडल है जिस पर बड़ी शक्तियाँ अपनी वैश्विक मौजूदगी गढ़ती हैं।

यही वजह है कि  यह फैसला “सिर्फ तआवुन का एहेदनामा नहीं, बल्कि दो क़ौमों के दरमियान एतमाद की नई तामीर” की तरफ इशारा करता है। जिस तरह आज दुनिया की सियासत बदल रही है, बड़े देश अपने पुराने दोस्तों के साथ रिश्तों को नए रंग में ढालने की कोशिश कर रहे हैं। भारत और रूस का यह कदम भी उसी बदलते नक्शे का हिस्सा दिखता है।

भारत और रूस के रिश्तों की रणनीतिक गहराई

पिछले कुछ सालों में कई बार ऐसा कहा गया कि भारत का झुकाव पश्चिम की तरफ बढ़ रहा है, खासकर अमेरिका के साथ उसकी नजदीकियां यह कहानी और मजबूत करती रहीं। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि भारत की विदेश नीति “मल्टी-अलाइनमेंट” पर आधारित है, यानी बहुत सारे देशों के साथ संतुलित रिश्ते रखना। इस वजह से रूस के साथ पुराने भरोसे वाले संबंध लगातार कायम रहे। रूस ने भी भारत को एक ऐसे साथी के रूप में देखा है जो बदलती भू-राजनीति में उसके लिए एक स्थिर और भरोसेमंद भागीदार है।

 कहें तो, India-Russia ties are not transactional, they are structural। Arms trade, nuclear energy, space, strategic coordination—ये सब उन हिस्सों में शामिल हैं जिन्होंने दोनों देशों को कई दशकों तक जोड़े रखा।

इसी बैकड्रॉप में RELOS समझौता लगभग एक स्वाभाविक कदम जैसा दिखाई देता है। लेकिन इसकी अहमियत सिर्फ इस वजह से नहीं है कि यह एक साधारण लॉजिस्टिक एग्रीमेंट है। इसकी अहमियत इस बात में है कि यह ऐसे समय में हो रहा है जब रूस दुनिया के कई मोर्चों पर दबाव में है—यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, यूरोप के साथ रिश्तों में तनाव। यह मंजूरी रूस की तरफ से एक संदेश भी है कि वह भारत को अपने सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है।

समझौते का असल मतलब

अब जब यह समझौता प्रभावी होगा, तो दोनों तरफ से लगभग पांच युद्धपोत, दस सैन्य विमान और तीन हजार सैनिक तैनात किए जा सकेंगे, वह भी पाँच साल तक और आगे बढ़ाने का विकल्प भी मौजूद रहेगा। यह एक साधारण व्यवस्था नहीं है। किसी भी संप्रभु देश की भूमि पर दूसरे देश के सैनिकों का रहना तभी संभव होता है जब दोनों के बीच बहुत ऊँचे स्तर का भरोसा हो।

 “ये इत्तेफाक़ आम military agreements की फेहरिस्त में नहीं रखा जा सकता। ये एक ऐसी सतह पर खड़ा है जहाँ दोनों मुल्क एक-दूसरे की जमीन पर अपने अफ़वाज, जहाज़ और हवाई जहाज़ भेजने का एतबार रखते हैं।”

भारत के लिए यह सहयोग कई तरह से असर डालता है। सबसे बड़ा फायदा नौसेना को मिलेगा। हिंद महासागर में भारतीय नौसेना पहले से ही कई मिशनों पर लगातार सक्रिय रहती है। कई बार यह जहाज़ महीनों तक समुद्र में रहते हैं, और हर मिशन के लिए अलग-अलग लॉजिस्टिक शिप भेजना संभव नहीं होता। ऐसे में रूस जैसे दोस्ती वाले देश के बंदरगाह, सप्लाई, रिपेयर सुविधाएँ एक बड़ी राहत साबित हो सकती हैं।

चीन का फैक्टर और हिन्द-प्रशांत की बदलती रणनीति

इसके प्रभाव को चीन के संदर्भ में देखना भी जरूरी है। चीन लगातार हिंद-प्रशांत में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह चिंता का मुद्दा है कि उसका समुद्री इलाका सुरक्षित रहे, खासकर मालदीव, श्रीलंका और अफ्रीका के रास्तों पर चीन की बढ़ती पहुँच को देखते हुए। विश्लेषकों का मानना है कि रूस के साथ ऐसा समझौता भारत की इस रणनीति को थोड़ा और मजबूत कर देता है। वह सीधे तौर पर चीन को चुनौती देने जैसा नहीं है, लेकिन उसकी बैलेंस-ऑफ-पावर में निश्चित रूप से कुछ असर डालता है।

इंग्लिश में कहें तो, India’s maritime strategy benefits from diversified logistic partners, and Russia fits perfectly because the relationship carries no mistrust.

परमाणु सहयोग का नया अध्याय

दूसरी तरफ, रूस ने पुतिन की यात्रा से पहले असैन्य परमाणु ऊर्जा के लिए नए सहमति पत्र को भी मंजूरी दी है। यह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चल रहे सहयोग का नया पड़ाव है। कुडनकुलम परियोजना में रूस पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अब जब रोसएटम के सीईओ भारत आ रहे हैं, तो छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों से लेकर उन्नत रिएक्टरों के स्थानीयकरण तक कई मुद्दों पर बातचीत होनी तय है।

 “ये तआवान सिर्फ बिजली पैदा करने का मसला नहीं, बल्कि टेक्नॉलजी की मंज़िलों में आगे बढ़ने की कोशिश है जो दोनों मुल्कों के लिए बराबर एहमियत रखती है।”

भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह आने वाले वर्षों में साफ ऊर्जा (Clean Energy) के लक्ष्य को हासिल करना चाहता है। अगर रूस की डिजाइन वाली तकनीक का स्थानीयकरण होता है, तो भारत की परमाणु क्षमता घरेलू स्तर पर मजबूत होगी। इससे लागत भी कम होगी और निर्भरता भी।

रूस के लिए यह साझेदारी क्यों जरूरी?

रूस आज वैश्विक राजनीति में एक अलग दौर से गुजर रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने उसकी सीमाओं को तंग कर दिया है। ऐसे माहौल में भारत उसके लिए एक बड़ा बाजार, बड़ा साझेदार और बड़ा भू-राजनीतिक समर्थन है। RELOS समझौते से उसे हिंद महासागर में ऐसी पहुँच मिलती है जो पहले उसके लिए आसान नहीं थी। यह एक तरह से रूस की एशिया नीति को नए तरीके से आकार देता है।

इंग्लिश में कहें तो, For Russia, India is not just an ally—it is a gateway
Gateway to markets, gateway to the Indian Ocean, और gateway to geopolitical relevance beyond Europe.

भारत के सामरिक हित

भारत के हित भी उतने ही स्पष्ट हैं। भारत के लगभग 70 प्रतिशत सैन्य प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं—सुखोई, मिग, टी-90, टी-72, एस-400। ऐसे में रूस के साथ लॉजिस्टिक सहयोग से स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस और सप्लाई चेन और आसान होगी। यह साफ फायदा है।

उर्दू में कहें तो, “जब किसी मुल्क की जंगजू कुव्वत का बड़ा हिस्सा एक ही मुल्क की टेक्नॉलजी से जुड़ा हो, तो लॉजिस्टिक का ताल्लुक दरअसल उसकी सलामती से जुड़ जाता है।”

संभावित चुनौतियाँ

हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने इस समझौते को लेकर चेतावनी भी दी है। उनका मानना है कि रूस और चीन के रिश्ते बहुत गहरे हैं, और रूस कभी भी चीन को नाराज़ करने वाला कदम आसानी से नहीं उठाएगा। दूसरी चुनौती यह है कि भारत पहले ही अमेरिका, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ ऐसे समझौते कर चुका है। ज्यादा विवाद से बचने के लिए भारत को सावधानी रखनी होगी ताकि वह एक दिशा में ज्यादा झुकता हुआ न दिखे।

Strategic autonomy will remain India’s biggest balancing tool.

पुतिन की यात्रा से उम्मीदें

पुतिन की यात्रा समय के लिहाज से भी दिलचस्प है। यह ऐसे मौके पर हो रही है जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव में है—यूरोप, पश्चिम एशिया, इंडो-पैसिफिक। भारत और रूस दोनों अपने-अपने मोर्चों पर दबाव में हैं। ऐसे माहौल में यह मुलाकात एक तरह का संदेश है कि साझेदारी न सिर्फ कायम है बल्कि विस्तार की तरफ बढ़ रही है।

उ“ये दौरा सिर्फ सरकारी दस्तावेज़ों का तबादला नहीं, बल्कि एक दूसरे के साथ खड़े रहने का एलान भी है।”

कुल मिलाकर, भारत-रूस संबंधों में जो ताज़ा विकास सामने आए हैं, वे भविष्य के लिए एक नई दिशा बनाते हैं। RELOS समझौता सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे का प्रतीक है। वहीं असैन्य परमाणु ऊर्जा पर नया समझौता दोनों देशों के लंबे-अवधि वाले सहयोग को और गहरा बनाता है।

कहें तो, the partnership is evolving, not fading
यह रिश्ता इतिहास की मजबूरी से नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों से मजबूत हो रहा है।

भारत और रूस दोनों जानते हैं कि आज की दुनिया में किसी भी देश के लिए अकेले चलना संभव नहीं। इसलिए यह सहयोग दोनों के लिए एक ऐसा रास्ता खोलता है जहाँ सुरक्षा, ऊर्जा, रणनीति और विकास—चारों दिशाओं में नए अवसर दिखाई देते हैं।

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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