भारत में 2026 का मॉनसून सीजन उम्मीद से कमजोर रहने का अंदेशा बढ़ गया है। मौसम विभाग ने जून से सितंबर के बीच सामान्य से कम बारिश और ज्यादा तापमान की चेतावनी दी है। अल-नीनो की संभावित वापसी ने खेती, पानी, बिजली और महंगाई को लेकर नई फिक्र पैदा कर दी है। शाह टाइम्स एडिटोरियल इसी बदलते क्लाइमेट नैरेटिव, सरकारी तैयारी और जमीनी हकीकत का गहरा जायज़ा पेश करता है।
📍नई दिल्ली 📰 29 मई 2026 ✍️ Asif Khan
भारत में मॉनसून सिर्फ मौसम नहीं होता। यह मुल्क की खेती, अर्थव्यवस्था, पानी, बिजली और करोड़ों परिवारों की रोज़मर्रा जिंदगी का आधार है। ऐसे में जब मौसम विभाग यह कहे कि इस साल जून से सितंबर के बीच सामान्य से कम बारिश हो सकती है और तापमान सामान्य से ऊपर बना रहेगा, तो यह खबर सिर्फ वेदर अपडेट नहीं रहती। यह एक बड़ा नेशनल अलर्ट बन जाती है।
इस बार चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि मौसम विभाग ने अल-नीनो के असर की संभावना जताई है। पिछले कई वर्षों में दुनिया ने देखा है कि अल-नीनो अक्सर बारिश के पैटर्न को बिगाड़ देता है। भारत जैसे कृषि आधारित देश में इसका असर खेतों से लेकर शहरों की बिजली खपत तक दिखाई देता है।
भारत का ग्रामीण ढांचा आज भी मॉनसून पर काफी हद तक निर्भर है। लाखों किसान अभी भी सिंचाई के लिए बारिश का इंतजार करते हैं। ऐसे में अगर बारिश कम हुई, देरी से हुई या असमान तरीके से हुई, तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा। यही वजह है कि इस बार मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से देखा जा रहा है।
मौसम विभाग के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक जून और जुलाई में तापमान सामान्य से ज्यादा रह सकता है। इसके साथ ही कई राज्यों में मॉनसूनी बारिश का वितरण कमजोर रहने की आशंका जताई गई है। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि मॉनसून की रफ्तार कई हिस्सों में धीमी पड़ सकती है।
हालांकि मौसम विज्ञान एक जटिल साइंस है और लंबी अवधि के पूर्वानुमान हमेशा सौ फीसदी सटीक नहीं होते। लेकिन पिछले वर्षों के डेटा को देखें तो अल-नीनो और कमजोर मॉनसून के बीच मजबूत संबंध देखा गया है। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स फिलहाल सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।
अल-नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में होने वाला असामान्य बदलाव है। इसका असर सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहता। यह पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है।
भारत में जब अल-नीनो सक्रिय होता है, तब अक्सर मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। बारिश कम होती है। तापमान बढ़ता है। कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बनने लगती है। हालांकि हर बार अल-नीनो का असर एक जैसा नहीं होता, लेकिन इसका जोखिम हमेशा बना रहता है।
यहीं पर एक अहम सवाल उठता है। क्या भारत ने पिछले वर्षों से कोई सबक लिया है?
कमजोर मॉनसून का पहला झटका खेती को लगता है। खरीफ फसलें सीधे बारिश पर निर्भर करती हैं। धान, दाल, मक्का, गन्ना और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई मॉनसून की टाइमिंग से जुड़ी होती है।
अगर बारिश देर से आई तो बुवाई प्रभावित होगी। अगर बारिश कम हुई तो उत्पादन घटेगा। अगर बारिश असमान हुई तो फसल खराब होगी। इन तीनों स्थितियों का मतलब है किसान की आय पर दबाव।
भारत में खेती पहले ही लागत, कर्ज और बाजार अस्थिरता जैसी चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में कमजोर मॉनसून ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर सकता है।
कुछ एक्सपर्ट्स यह तर्क देते हैं कि अब सिंचाई नेटवर्क पहले से बेहतर है और देश पहले जितना मॉनसून पर निर्भर नहीं रहा। यह बात आंशिक रूप से सही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी लाखों छोटे किसान मानसून आधारित खेती करते हैं।
अक्सर मॉनसून की चर्चा सिर्फ किसानों तक सीमित रह जाती है। लेकिन कमजोर बारिश का असर शहरों पर भी पड़ता है।
कम बारिश का मतलब है जलाशयों में कम पानी। इसका असर पीने के पानी की सप्लाई पर पड़ सकता है। कई महानगर पहले ही गर्मियों में पानी संकट झेल रहे हैं। अगर बारिश कमजोर रही तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
इसके अलावा ज्यादा तापमान का मतलब बिजली की मांग में तेज उछाल भी होगा। एयर कंडीशनर, कूलर और पंपों का इस्तेमाल बढ़ेगा। इससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है।
यह वही भारत है जहां हर साल गर्मी के दौरान कई इलाकों में बिजली कटौती की शिकायतें सामने आती हैं।
कम बारिश और कम फसल उत्पादन का सीधा असर खाद्य कीमतों पर पड़ता है। सब्जियां, दालें और अनाज महंगे हो सकते हैं। इसका असर आम परिवारों के बजट पर दिखाई देगा।
भारत की इकोनॉमी फिलहाल कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। ग्लोबल मार्केट अस्थिर है। जियोपॉलिटिक्स से ऊर्जा कीमतों पर असर पड़ रहा है। ऐसे में अगर खाद्य महंगाई बढ़ी तो रिजर्व बैंक और सरकार दोनों के सामने नई चुनौती खड़ी होगी।
हालांकि कुछ अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि भारत ने पिछले वर्षों में बफर स्टॉक और सप्लाई मैनेजमेंट में सुधार किया है। इससे बड़े संकट को टाला जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तैयारी लंबे सूखे या लगातार कमजोर मॉनसून का सामना कर पाएगी?
कुछ साल पहले तक लोग असामान्य मौसम को एक अस्थायी घटना मानते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। कभी रिकॉर्ड गर्मी, कभी अचानक बाढ़, कभी लंबे सूखे, यह सब एक बड़े क्लाइमेट बदलाव की तरफ इशारा करते हैं।
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जो क्लाइमेट चेंज से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। आबादी बड़ी है। संसाधनों पर दबाव ज्यादा है। खेती मौसम पर निर्भर है।
यही वजह है कि अब मौसम रिपोर्ट सिर्फ साइंस अपडेट नहीं रह गई। यह नेशनल सिक्योरिटी और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी का मामला बन चुकी है।
सरकार हर साल मॉनसून को लेकर तैयारियों का दावा करती है। लेकिन असली सवाल तैयारी की गहराई का है।
क्या जल संरक्षण पर गंभीर काम हुआ?
क्या ग्रामीण सिंचाई नेटवर्क पर्याप्त है?
क्या शहरों ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग को मजबूती से लागू किया?
क्या बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ती मांग संभालने के लिए तैयार है?
इन सवालों के जवाब अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं दिखते।
भारत में अक्सर संकट आने के बाद प्रतिक्रिया होती है। लेकिन क्लाइमेट संकट ऐसा मुद्दा है जिसमें पहले तैयारी करनी पड़ती है। यहां देर की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।
यह भी समझना जरूरी है कि लंबी अवधि के मौसम पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होते हैं। कई बार वास्तविक बारिश अनुमान से अलग भी निकलती है।
पिछले वर्षों में कुछ ऐसे मौके आए जब शुरुआती आशंकाओं के बावजूद बारिश बेहतर रही। इसलिए घबराहट फैलाना सही नहीं होगा।
लेकिन दूसरी तरफ चेतावनी को नजरअंदाज करना भी खतरनाक होगा। जिम्मेदार रवैया यही है कि संभावित संकट को गंभीरता से लिया जाए और तैयारी मजबूत की जाए।
भारत को मॉनसून आधारित सोच से आगे बढ़ना होगा। जल प्रबंधन को इमरजेंसी एजेंडा बनाना पड़ेगा। शहरों और गांवों दोनों में पानी बचाने की नीति मजबूत करनी होगी।
खेती में कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। भूजल दोहन पर सख्ती करनी होगी। मौसम डेटा और अर्ली वार्निंग सिस्टम को गांव स्तर तक पहुंचाना होगा।
इसके साथ ही क्लाइमेट पॉलिसी को सिर्फ इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस तक सीमित रखने के बजाय जमीनी योजनाओं में बदलना होगा।
क्या भारत हर साल मौसम संकट पर सिर्फ चर्चा करेगा या लंबे समय की रणनीति बनाएगा?
कमजोर मॉनसून की चेतावनी एक मौसम खबर से कहीं ज्यादा है। यह उस भविष्य की झलक है जहां पानी, खेती और तापमान आने वाले दशकों की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस बन सकते हैं।
अभी भी समय है। लेकिन समय तेजी से निकल रहा है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।