सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में हालिया रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा, पुलिस गश्त और निगरानी पर सवाल उठाए। कोर्ट ने जवाबदेही तय करने और measurable response की जरूरत बताई। दिल्ली, 2026।
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📍 नई दिल्ली 📰 28 सितंबर 2026 ✍️ Apurva Choudhary
दिल्ली-NCR में हालिया यौन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 28 सितंबर 2026 को दिल्ली-NCR में हाल के रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका दर्ज करने और आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
अदालत की कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब दिल्ली और आसपास के इलाकों में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ कई यौन अपराधों की रिपोर्ट सामने आई हैं। पीठ ने इन घटनाओं को सिर्फ अलग-अलग आपराधिक मामलों के तौर पर देखने के बजाय कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवालों के संदर्भ में देखा।
सार्वजनिक जगहों को High-Risk Zone नहीं बनने दिया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने पार्क, सड़क, बस, मेट्रो स्टेशन, फुटब्रिज और दूसरे सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा पर खास चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अपर्याप्त रोशनी, कमजोर निगरानी, CCTV की कमी या पर्याप्त पुलिस गश्त नहीं होने के कारण ऐसे स्थान High-Risk Zone में तब्दील नहीं होने चाहिए।
पीठ की टिप्पणी का फोकस केवल अपराध होने के बाद की पुलिस कार्रवाई पर नहीं था। अदालत ने अपराध की रोकथाम, सार्वजनिक व्यवस्था और vulnerable लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए सिर्फ आश्वासन या घटना के बाद प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। अदालत ने ऐसे उपायों की जरूरत बताई जिन्हें मापा और परखा जा सके तथा जिनके आधार पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सके।
स्लीपर बस मामले में 47 किलोमीटर का सफर बना अहम सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने Greater Noida से दिल्ली पहुंची एक sleeper bus में नाबालिग के कथित यौन उत्पीड़न का मामला भी आया। रिपोर्टों के मुताबिक 16 वर्षीय लड़की ने 4 अगस्त को Greater Noida से sleeper bus में यात्रा की थी और दिल्ली के Kashmere Gate क्षेत्र में पहुंचने के बाद मामला सामने आया।
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार बस ने करीब 47 किलोमीटर की दूरी तय की और रास्ते में किसी पुलिस पिकेट पर जांच नहीं हुई। इस पहलू ने सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी और enforcement को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
Akashvani की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में बस के conductor और driver को गिरफ्तार किया गया है। मामले में आरोपों की न्यायिक जांच अभी जारी है और आरोपियों की गिरफ्तारी को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
दिल्ली के Aastha Kunj Park मामले का भी संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट के सामने दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के Aastha Kunj Park में 17 वर्षीय लड़की के कथित gangrape का मामला भी आया। पुलिस के अनुसार घटना 21 सितंबर की शाम की है और आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर लड़की और उसके दोस्त को रोका तथा बाद में लड़की के साथ यौन हिंसा की।
पुलिस ने इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। रिपोर्टों के अनुसार जांच में CCTV और तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल किया गया और एक आरोपी पुलिस कार्रवाई के दौरान पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार हुआ।
इस मामले ने Aastha Kunj Park जैसे बड़े सार्वजनिक स्थानों में illumination, surveillance और नियमित patrolling की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। Indian Express की एक रिपोर्ट में पार्कों में dark spots और surveillance gaps की स्थिति का जायजा लिया गया।
Nirbhaya मामले का भी आया संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने हाल की घटनाओं को 2012 के Nirbhaya मामले से जोड़ते हुए “painful parallels” की बात कही। दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार और बाद में पीड़िता की मौत ने देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून एवं नीतिगत बदलावों को जन्म दिया था।
28 सितंबर की सुनवाई में अदालत का संदर्भ किसी नए आपराधिक मामले की दोषसिद्धि से संबंधित नहीं था। यह टिप्पणी हालिया घटनाओं के संदर्भ में सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की व्यवस्था का जायजा लेने के दौरान सामने आई।
कोर्ट ने सिर्फ संवेदना नहीं, जवाबदेही पर दिया जोर
पीठ ने कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद सार्वजनिक अधिकारियों या निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से चिंता और एकजुटता व्यक्त करना अपने आप में पर्याप्त जवाब नहीं है। अदालत ने संस्थागत स्तर पर measurable response और accountability की जरूरत पर जोर दिया।
इसका अर्थ यह है कि अदालत की चिंता केवल किसी एक घटना में आरोपी को पकड़ने तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक स्थानों की निगरानी, police patrolling, illumination, public transport security और vulnerable लोगों की सुरक्षा के लिए मौजूद व्यवस्था किस तरह काम कर रही है, यह भी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता है।
Article 21 से जोड़ा गरिमा और सुरक्षा का सवाल
पीठ ने महिलाओं और बच्चों को हिंसा के डर से मुक्त होकर गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को संविधान के Article 21 से जोड़ा। अदालत के अनुसार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा और भय से मुक्त जीवन का पहलू भी इसमें शामिल है।
इसी संवैधानिक संदर्भ में सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पर अदालत ने जोर दिया। पार्क, बस, सड़क या मेट्रो स्टेशन जैसी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था की कमी को केवल infrastructure की समस्या नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल के रूप में देखा गया।
दिल्ली में Patrolling और Visible Policing पर भी जोर
हालिया घटनाओं के बीच दिल्ली में पुलिस की visible presence और patrolling को बढ़ाने की बात भी सामने आई है। इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल कागज पर मौजूद होने के बजाय जमीन पर प्रभावी दिखाई देनी चाहिए।
हालांकि किसी एक घटना को किसी पूरे पुलिस तंत्र की कार्यक्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही का उद्देश्य व्यापक संस्थागत जवाबदेही के सवालों की जांच करना है।
अभी सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई शुरुआती चरण में
सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना इस मामले में अंतिम न्यायिक फैसला नहीं है। इससे किसी आरोपी की दोषसिद्धि, किसी घटना के सभी तथ्य या किसी विशेष अधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी अभी तय नहीं होती।
इस स्तर पर अदालत ने मुद्दे को न्यायिक निगरानी के दायरे में लिया है और सार्वजनिक सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था से जुड़े संस्थागत सवालों पर आगे सुनवाई का रास्ता खोला है।
आगे की कार्यवाही में पुलिस patrolling, CCTV और surveillance infrastructure, public transport safety, illumination, emergency response और vulnerable लोगों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जा सकता है।
जवाबदेही का दायरा कितना बढ़ेगा, आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा
दिल्ली-NCR के हालिया मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की पहल का केंद्र केवल अपराध के बाद की कार्रवाई नहीं बल्कि अपराध रोकने की व्यवस्था भी है। अदालत ने यह सवाल उठाया है कि जिन संस्थाओं पर सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उनकी कार्यप्रणाली को measurable तरीके से कैसे परखा जाए।
फिलहाल यह मामला प्रारंभिक न्यायिक चरण में है। आगे की सुनवाई में अदालत के निर्देशों से यह स्पष्ट होगा कि पुलिस, दिल्ली प्रशासन, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और अन्य संबंधित एजेंसियों से किस तरह की रिपोर्ट या जवाब मांगा जाता है।
इसलिए मौजूदा स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR के हालिया रेप और यौन उत्पीड़न मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर सार्वजनिक सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही का मुद्दा न्यायिक निगरानी में लिया है। यह किसी एक घटना पर अंतिम फैसला नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की न्यायिक समीक्षा की शुरुआत है।