भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड’ बताने वाले राहुल गांधी के बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया। 7.8% जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों के बीच आर्थिक प्रदर्शन को लेकर सियासी बहस तेज है।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 25 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान ने एक बार फिर सियासी बहस तेज कर दी है। राहुल गांधी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ कहकर केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए थे। बीजेपी ने इस बयान को खारिज करते हुए आर्थिक वृद्धि के ताजा आंकड़ों को अपने पक्ष में रखा है।
हालांकि, उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में राहुल गांधी के बयान पर सीधे अमित शाह द्वारा ‘उनकी सोच ही मृत’ कहे जाने की पुष्टि नहीं मिलती। यह टिप्पणी बीजेपी के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं में दर्ज है। इसलिए इस रिपोर्ट में उस पंक्ति को अमित शाह का प्रत्यक्ष बयान मानकर प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
31 जुलाई 2025 को राहुल गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ कहे जाने वाले बयान का समर्थन किया था। उन्होंने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को छोड़कर बाकी लोग जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था खराब स्थिति में है।
राहुल गांधी की टिप्पणी उस समय आई थी जब अमेरिका की ओर से भारत पर 25% टैरिफ लगाए जाने और रूस के साथ भारत के व्यापार को लेकर अतिरिक्त दबाव की घोषणा हुई थी। इस मुद्दे ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के साथ-साथ घरेलू राजनीति में भी बहस को हवा दी थी।
राहुल गांधी के बयान के बाद बीजेपी नेताओं ने उनके आर्थिक आकलन को चुनौती दी। बीजेपी के राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड’ कहे जाने पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया उनकी सोच को दर्शाती है। यह बयान अमित शाह का नहीं, बल्कि ऋतुराज सिन्हा की टिप्पणी के रूप में दर्ज है।
बीजेपी की ओर से आर्थिक प्रदर्शन के पक्ष में वृद्धि दर, बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे संकेतकों का उल्लेख किया गया। पार्टी का तर्क रहा है कि भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति को ‘डेड इकोनॉमी’ कहना उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों से मेल नहीं खाता।
अगस्त 2026 में जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल से जून तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8% रही। गृह मंत्री अमित शाह ने इस वृद्धि दर को भारत की आर्थिक क्षमता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती का संकेत बताया।
इसी आंकड़े को बीजेपी ने राहुल गांधी के पुराने ‘डेड इकोनॉमी’ वाले दावे के जवाब में प्रमुखता से उठाया। सितंबर 2026 में बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने भी 7.8% वृद्धि दर का हवाला देते हुए राहुल गांधी से उनके आर्थिक आकलन पर सवाल किया।
अमित शाह पहले भी भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर सरकार के पक्ष को सामने रखते रहे हैं। जुलाई 2025 में राज्यसभा में दिए अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि बीते 11 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था 11वें स्थान से चौथे स्थान पर पहुंची है। उन्होंने जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय राजमार्ग और हवाई अड्डों सहित कई आर्थिक और बुनियादी ढांचा संकेतकों का उल्लेख किया था।
अगस्त 2026 में भी शाह ने 7.8% जीडीपी वृद्धि को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना की थी। उन्होंने इसे वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक मजबूती का संकेत बताया।
कांग्रेस और विपक्ष की आर्थिक आलोचना केवल जीडीपी वृद्धि दर तक सीमित नहीं है। राहुल गांधी लगातार रोजगार, युवाओं के अवसर, छोटे कारोबार, आय में असमानता और आर्थिक नीतियों के असर को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाते रहे हैं।
अगस्त 2026 में प्रयागराज में छात्रों से संवाद के दौरान राहुल गांधी ने रोजगार और शिक्षा के मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि भारत की 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में युवा और डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन युवाओं के सामने रोजगार और व्यवस्था से जुड़े सवाल बने हुए हैं।
इसलिए आर्थिक बहस का एक हिस्सा जीडीपी वृद्धि पर केंद्रित है, जबकि दूसरा हिस्सा रोजगार, आय और आर्थिक अवसरों के वितरण पर।
‘डेड इकोनॉमी’ शब्द भारतीय राजनीति में तब प्रमुखता से आया जब डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर यह टिप्पणी की थी। इसके बाद राहुल गांधी की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को घरेलू राजनीतिक विवाद में बदल दिया।
बीजेपी ने इसे भारत की आर्थिक उपलब्धियों पर सवाल के तौर पर पेश किया। विपक्ष ने दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता और आम नागरिकों तक उसके लाभ पहुंचने से जुड़े सवाल उठाए।
मौजूदा तस्वीर में एक तथ्य स्पष्ट है। भारत की जीडीपी में 2026 की अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज हुई। यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था में मजबूत उत्पादन और मांग की स्थिति का संकेत देता है।
लेकिन केवल जीडीपी वृद्धि से रोजगार, वास्तविक आय, उपभोग और क्षेत्रीय असमानता जैसे सभी सवालों का जवाब नहीं मिलता। आर्थिक सेहत का जायजा लेने के लिए इन संकेतकों को भी साथ देखना पड़ता है।
‘डेड इकोनॉमी’ विवाद अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं है। यह सत्ता और विपक्ष के बीच अलग-अलग आर्थिक नैरेटिव की लड़ाई का हिस्सा बन चुका है।
सरकार आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढांचे और भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। विपक्ष रोजगार, आय और आर्थिक नीतियों के सामाजिक असर को प्रमुख मुद्दा बना रहा है।
आगे की बहस में दोनों पक्षों के दावों को जीडीपी के साथ रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, निवेश, महंगाई, उपभोग और उत्पादकता जैसे संकेतकों के आधार पर परखा जाना महत्वपूर्ण होगा।
भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड’ बताने का राहुल गांधी का बयान और उसके जवाब में बीजेपी का पलटवार अब व्यापक आर्थिक बहस का हिस्सा बन चुका है। ताजा 7.8% जीडीपी वृद्धि सरकार के आर्थिक प्रदर्शन के पक्ष में एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है, जबकि रोजगार और आय से जुड़े सवाल विपक्ष के विमर्श में बने हुए हैं।
इसलिए पूरे विवाद को केवल सियासी आरोप-प्रत्यारोप के बजाय व्यापक आर्थिक संकेतकों के संदर्भ में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।