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UGC भेदभाव-विरोधी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

None 2026-01-29 15:35:46
UGC भेदभाव-विरोधी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अंतरिम रोक

भेदभाव-विरोधी गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी की नई भेदभाव-विरोधी गाइडलाइंस पर रोक लगा दी है। अदालत ने नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए विशेषज्ञ समिति के गठन का संकेत दिया।

📍New Delhi ✍️ Asif Khan 

यूजीसी द्वारा जारी 2026 के नए भेदभाव-विरोधी नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक लागू न करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल 2012 की गाइडलाइंस ही प्रभावी रहेंगी।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा जारी किए गए नए भेदभाव-विरोधी नियमों पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने इन नियमों की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए और इनके संभावित दुरुपयोग की आशंका जताई। इसके बाद कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए इन नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी।

अदालत की पीठ और टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि नियमों की भाषा पहली नज़र में अस्पष्ट प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि इस्तेमाल किए गए शब्दों की स्पष्ट व्याख्या नहीं है और इससे गलत इस्तेमाल की संभावना बन सकती है।

नियमों पर रोक का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को औपचारिक नोटिस जारी किया। अदालत ने साफ किया कि विवादित नियम अगले आदेश तक लागू नहीं होंगे। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि इस दौरान 2012 में यूजीसी द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस ही प्रभावी रहेंगी।

अगली सुनवाई की तारीख

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 19 मार्च तय की है। इस दिन केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब दाखिल करने को कहा गया है। साथ ही कोर्ट इस बात पर भी विचार कर सकती है कि नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।

विशेषज्ञ समिति का सुझाव

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई जा सकती है। इस समिति में शिक्षाविद, प्रोफेसर, समाजशास्त्री और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। समिति का उद्देश्य नियमों की भाषा को स्पष्ट करना और यह सुनिश्चित करना होगा कि इनका दुरुपयोग न हो।

समाज पर प्रभाव को लेकर चिंता

चीफ जस्टिस ने कहा कि यदि अदालत इस मामले में दखल नहीं देती तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति समाज को विभाजित कर सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी पीड़ित को बिना उपाय के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

यूजीसी के नए नियम क्या थे

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए भेदभाव-विरोधी नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समानता को बढ़ावा देना और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के लिए एक संस्थागत व्यवस्था बनाना था।

2012 और 2026 के नियमों में अंतर

2012 की गाइडलाइंस में भेदभाव की सामान्य परिभाषा दी गई थी। 2026 के संशोधित नियमों में इसमें जाति-आधारित भेदभाव को विशेष रूप से जोड़ा गया। नए नियमों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के संदर्भ में प्रावधान शामिल किए गए थे।

समान अवसर केंद्र का प्रावधान

नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य किया गया था। इस केंद्र का काम वंचित समुदायों से जुड़ी योजनाओं की निगरानी करना और छात्रों व कर्मचारियों को शैक्षणिक, सामाजिक और वित्तीय सलाह देना था।

समता समिति की भूमिका

समान अवसर केंद्र के अंतर्गत एक समता समिति बनाने का प्रावधान था। इस समिति की अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख को करनी थी। समिति में वरिष्ठ शिक्षक, सिविल सोसायटी के सदस्य और छात्र प्रतिनिधि शामिल होने थे। समिति को भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच का अधिकार दिया गया था।

हेल्पलाइन और शिकायत प्रणाली

नए नियमों में चौबीसों घंटे उपलब्ध समता हेल्पलाइन शुरू करने की बात कही गई थी। इसके अलावा ऑनलाइन पोर्टल और ईमेल के जरिए भी शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था रखी गई थी। नियमों के अनुसार, शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जानी थी।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कहा गया कि ये प्रावधान कुछ समूहों को अलग-थलग कर सकते हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह भी कहा कि नियमों का मसौदा तैयार करते समय सभी पहलुओं पर विचार नहीं किया गया।

सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि नए नियमों का उद्देश्य भेदभाव रोकना है और इनके दुरुपयोग को रोका जाएगा। हालांकि अदालत ने इस दलील के बावजूद नियमों की भाषा को लेकर चिंता जताई।

अदालत का अंतरिम निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026 के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है। अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह नियमों को दोबारा ड्राफ्ट करने पर विचार करे।

2012 की गाइडलाइंस की वापसी

अंतरिम आदेश के साथ अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नए नियमों पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक 2012 में जारी गाइडलाइंस ही लागू रहेंगी। इससे पहले भी उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव से जुड़े मामलों में इन्हीं गाइडलाइंस का पालन किया जा रहा था।

आगे की प्रक्रिया

अब 19 मार्च को होने वाली सुनवाई में यह तय होगा कि विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा या नहीं। इस दिन केंद्र सरकार और यूजीसी अपने जवाब और सुझाव अदालत के सामने रखेंगे।

शिक्षा क्षेत्र में असर

इस आदेश का असर देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर पड़ेगा। नए नियमों के तहत बनाई जाने वाली समितियां और केंद्र फिलहाल लागू नहीं होंगे। संस्थानों को अभी पुराने ढांचे के तहत ही काम करना होगा।

कानूनी पहलू

अदालत ने कहा कि इस मामले में कुछ संवैधानिक और कानूनी सवालों की जांच अभी बाकी है। इसलिए अंतिम निर्णय से पहले सभी पक्षों को सुनना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद यूजीसी के नए नियमों का भविष्य अब अगली सुनवाई पर निर्भर करता है। अदालत ने साफ किया है कि नियमों की भाषा को स्पष्ट और निरापद बनाना जरूरी है ताकि किसी भी तरह का भ्रम या दुरुपयोग न हो।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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