देश में बढ़ते डॉग बाइट मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर नगर निगम, लोकल एडमिनिस्ट्रेशन और एनिमल वेलफेयर सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। कोर्ट ने पूछा कि आखिर आम लोग सड़कों पर डर के माहौल में क्यों जी रहे हैं। दूसरी तरफ एनिमल राइट्स ग्रुप्स का कहना है कि समाधान केवल पकड़ने या हटाने में नहीं, बल्कि लंबे प्लान और जिम्मेदार पॉलिसी में छिपा है।
📍नई दिल्ली 📰 19 मई 2026
✍️ आसिफ खान
भारत के कई शहरों में आवारा कुत्तों का मुद्दा अब केवल लोकल परेशानी नहीं रह गया है। डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर हमलों और अस्पतालों में बढ़ते मामलों ने इस बहस को नेशनल लेवल तक पहुंचा दिया है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख दिखाते हुए प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए।
कोर्ट के सामने कई ऐसी याचिकाएं आईं जिनमें दावा किया गया कि शहरों और रिहायशी इलाकों में लोग डर के माहौल में रह रहे हैं। कई जगह बच्चों के खेलने तक पर असर पड़ रहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि अगर नागरिक सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे तो फिर लोकल बॉडीज़ की जवाबदेही कहां है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल कागजी योजनाएं काफी नहीं हैं। जमीन पर असर दिखना चाहिए। कोर्ट की टिप्पणियों ने पूरे देश में फिर से उस बहस को जिंदा कर दिया जिसमें एक तरफ इंसानी सुरक्षा का सवाल है और दूसरी तरफ एनिमल राइट्स और स्ट्रे डॉग प्रोटेक्शन का मुद्दा।
पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों से डॉग बाइट के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। सोशल मीडिया और लोकल न्यूज रिपोर्ट्स में बच्चों पर हमले, स्कूल जाते समय पीछा किए जाने और रात में सड़क पर लोगों को काटने जैसी घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ाई।
शहरी इलाकों में कूड़े के ढेर, खुले फूड वेस्ट और अनियोजित वेस्ट मैनेजमेंट को भी इस संकट की बड़ी वजह माना जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जहां भोजन आसानी से उपलब्ध होता है वहां स्ट्रे डॉग्स की संख्या तेजी से बढ़ती है। कई शहरों में नसबंदी कार्यक्रम धीमे पड़े हुए हैं या उनका असर सीमित दिखाई देता है।
दूसरी तरफ कुछ एनिमल एक्टिविस्ट्स का कहना है कि हर स्ट्रे डॉग आक्रामक नहीं होता। उनका तर्क है कि हिंसक घटनाओं के पीछे कई बार इंसानों का व्यवहार, पत्थर मारना, डराना या गलत हैंडलिंग भी कारण बनती है। उनका कहना है कि बिना वैज्ञानिक डेटा के पूरे स्ट्रे डॉग सिस्टम को खतरा बताना सही नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान मुख्य फोकस नागरिक सुरक्षा पर रहा। अदालत ने पूछा कि अगर छोटे बच्चे और बुजुर्ग सड़क पर सुरक्षित नहीं हैं तो राज्य सरकारें और नगर निकाय क्या कर रहे हैं। अदालत ने यह भी देखा कि कई राज्यों में डॉग कंट्रोल और नसबंदी कार्यक्रमों का डेटा स्पष्ट नहीं है।
कोर्ट की चिंता इस बात को लेकर भी दिखी कि अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल कमजोर है। नगर निगम, पशुपालन विभाग, हेल्थ डिपार्टमेंट और एनिमल वेलफेयर संगठनों के बीच समन्वय की कमी लंबे समय से सामने आती रही है।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कई इलाकों में लोग शिकायत करते हैं लेकिन कार्रवाई नहीं होती। वहीं दूसरी तरफ पशु प्रेमी समूहों का आरोप है कि कई जगहों पर कानून के खिलाफ कुत्तों को हटाने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है।
यह बहस सबसे ज्यादा इसी बिंदु पर अटकती है। एक पक्ष का कहना है कि अगर आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ रही है तो उन्हें शहरों से हटाना जरूरी है। दूसरा पक्ष कहता है कि ऐसा करने से समस्या खत्म नहीं होती क्योंकि खाली जगहों पर दूसरे स्ट्रे डॉग्स आ जाते हैं।
एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम को लंबे समय से सरकारी समाधान माना जाता रहा है। इसके तहत नसबंदी और वैक्सीनेशन के जरिए संख्या नियंत्रित करने की कोशिश होती है। लेकिन कई शहरों में यह कार्यक्रम पर्याप्त स्तर तक नहीं पहुंच पाया।
कुछ हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि केवल नसबंदी काफी नहीं है। रेबीज़ वैक्सीनेशन, वेस्ट कंट्रोल, पब्लिक अवेयरनेस और इमरजेंसी मेडिकल रिस्पॉन्स भी उतने ही जरूरी हैं। अगर किसी इलाके में लगातार डॉग बाइट हो रहे हैं तो वहां लोकल सर्वे और व्यवहारिक स्टडी की जरूरत पड़ती है।
डॉग बाइट की घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर अक्सर दो धड़े बन जाते हैं। एक तरफ लोग सख्त कार्रवाई और स्ट्रे डॉग हटाने की मांग करते हैं। दूसरी तरफ एनिमल लवर्स इसे क्रूरता और भावनात्मक प्रतिक्रिया बताते हैं।
कई मामलों में वीडियो क्लिप्स वायरल होने के बाद बहस और ज्यादा उग्र हो जाती है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि हर वायरल वीडियो पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। कुछ घटनाओं में संदर्भ अधूरा होता है। इसलिए नीति तय करते समय भावनाओं से ज्यादा डेटा और ग्राउंड रियलिटी को महत्व देना जरूरी माना जा रहा है।
डॉग बाइट केवल सड़क सुरक्षा का मामला नहीं है। इसका सीधा असर हेल्थ सिस्टम पर भी पड़ता है। रेबीज़ वैक्सीन, एंटी रेबीज़ इंजेक्शन और इमरजेंसी ट्रीटमेंट पर सरकारी खर्च बढ़ता है। ग्रामीण और छोटे शहरों में समय पर इलाज न मिलने का खतरा भी बना रहता है।
कई डॉक्टर मानते हैं कि लोगों में जागरूकता की कमी बड़ी समस्या है। कई बार लोग काटने के बाद घरेलू इलाज करते रहते हैं और अस्पताल देर से पहुंचते हैं। रेबीज़ को लेकर डर इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह बीमारी गंभीर मानी जाती है।
भारत में एनिमल प्रोटेक्शन से जुड़े कानून मौजूद हैं। एनिमल क्रुएल्टी रोकने और स्ट्रे डॉग्स की सुरक्षा के नियम भी लागू हैं। लेकिन जब इंसानी सुरक्षा का सवाल सामने आता है तो टकराव पैदा हो जाता है।
कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों को संतुलित मॉडल अपनाना होगा। ऐसा मॉडल जिसमें इंसानी सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों साथ चलें। केवल भावनात्मक या राजनीतिक बयान इस जटिल समस्या को हल नहीं कर सकते।
कई शहरों में डॉग कैचर टीम, वैक्सीनेशन यूनिट और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनका असर हर जगह बराबर नहीं दिखाई देता। छोटे शहरों और कस्बों में संसाधनों की कमी अक्सर सामने आती है।
लोकल निकायों के सामने फंड, स्टाफ और ट्रेनिंग की चुनौती भी रहती है। कई जगहों पर रिकॉर्ड अपडेट नहीं होते। इससे असली संख्या और जोखिम वाले इलाकों की पहचान मुश्किल हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद राज्यों पर दबाव बढ़ सकता है। संभव है कि आने वाले समय में केंद्र और राज्य सरकारें नई गाइडलाइन, सख्त मॉनिटरिंग या संयुक्त एक्शन प्लान पर काम करें।
कुछ एक्सपर्ट्स राष्ट्रीय स्तर पर एक यूनिफॉर्म डॉग मैनेजमेंट पॉलिसी की जरूरत बता रहे हैं। इसमें हेल्थ, वेस्ट मैनेजमेंट, वैक्सीनेशन, नसबंदी और पब्लिक सेफ्टी को एक साथ जोड़ा जा सकता है।
हालांकि यह भी साफ है कि कोई एक कदम तुरंत समाधान नहीं देगा। यह लंबी और संवेदनशील प्रक्रिया होगी जिसमें प्रशासन, हेल्थ सिस्टम, लोकल कम्युनिटी और एनिमल वेलफेयर ग्रुप्स सभी की भूमिका अहम रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने उस मुद्दे को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है जिसे आम लोग रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस करते हैं। सवाल केवल स्ट्रे डॉग्स का नहीं, बल्कि शहरों की प्लानिंग, पब्लिक सेफ्टी, हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है।
अगर नीति केवल भावनाओं पर बनी तो विवाद बढ़ेगा। अगर केवल आंकड़ों पर बनी और जमीन की सच्चाई नजरअंदाज हुई तब भी समाधान अधूरा रहेगा। आने वाले दिनों में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि इंसानी सुरक्षा और एनिमल वेलफेयर के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।