सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने फैसले में कुछ टिप्पणियों को “offending observations” बताया और आरोपी हिमांशु कुमार पाठक को नोटिस देने का निर्देश दिया। मामला 2008 के बांका केस से जुड़ा है और हाईकोर्ट के फैसले पर अंतिम निर्णय बाकी है।
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📍 नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026 | ✍️ अपूर्वा चौधरी
पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के एक फैसले से जुड़ी टिप्पणियों पर स्वतः संज्ञान लिया है। मामला 2008 के बिहार के बांका जिले में सामने आए एक यौन अपराध के मामले से संबंधित है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने के आरोप में दोषी ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियों को “ऑफेंडिंग ऑब्जर्वेशन” यानी आपत्तिजनक टिप्पणियां बताया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करने या उसमें हस्तक्षेप करने से पहले आरोपी को सुनना जरूरी होगा।
9 जुलाई के फैसले में क्या कहा गया था?
पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक से जुड़े आपराधिक अपील मामले में ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी ठहराया था।
हाईकोर्ट के सामने अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने महिला को अपने फोटो स्टूडियो में रोक लिया, दरवाजा अंदर से बंद किया और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। आरोपों में महिला के सीने को दबाने और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने की बात भी शामिल थी।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए कहा था कि अभियोजन ऐसा स्पष्ट कृत्य साबित नहीं कर सका, जिससे रेप करने के प्रयास की मंशा unequivocally यानी स्पष्ट रूप से स्थापित हो। अदालत ने मामले के तथ्यों को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने वाले अपराध के संदर्भ में देखा था।
2008 के बांका मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा बताया गया है। अभियोजन के अनुसार, जनवरी 2008 में महिला अपने पिता के साथ आरोपी के फोटो स्टूडियो गई थी।
आरोप है कि फोटो खिंचवाने के बाद आरोपी ने महिला के पिता को कंप्यूटर पर फोटो देखने के लिए बाहर जाने को कहा। इसके बाद स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया गया।
अभियोजन के मुताबिक, आरोपी ने खुद कपड़े उतारे और महिला की सलवार उतारने की कोशिश की। महिला ने शोर मचाया, जिसके बाद उसके पिता ने हस्तक्षेप किया और दरवाजा खुलवाया। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
ट्रायल कोर्ट ने मामले में हिमांशु कुमार पाठक को भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत रेप के प्रयास और धारा 342 के तहत गलत तरीके से बंधक बनाने के अपराध में दोषी ठहराया था।
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने धारा 376/511 के तहत तीन वर्ष के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत छह महीने के कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ चलने का निर्देश दिया गया था।
इसके बाद आरोपी ने पटना हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन की दलीलों का दोबारा परीक्षण करते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। इसी फैसले की कुछ टिप्पणियां अब सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान का विषय बनी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने किन टिप्पणियों पर सवाल उठाया?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को देखने के बाद कहा कि उसमें कुछ “ऑफेंडिंग ऑब्जर्वेशन” हैं। हालांकि पीठ ने तत्काल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करने का आदेश नहीं दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी को सुने बिना उसके खिलाफ हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया जा सकता। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने हिमांशु पाठक को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
यह प्रक्रिया न्यायिक सुनवाई के उस सिद्धांत से जुड़ी है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।
आरोपी को नोटिस पहुंचाने की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय से कहा कि आरोपी को नोटिस की तामील सुनिश्चित की जाए। इसके लिए स्थानीय पुलिस की मदद लेने का निर्देश दिया गया।
इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की न्यायिक समीक्षा शुरू कर दी है, लेकिन अभी यह तय नहीं किया है कि पटना हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह रद्द किया जाएगा या उसमें किसी विशेष टिप्पणी को हटाया जाएगा।
अदालत की आगे की सुनवाई में आरोपी का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले में अगला न्यायिक कदम स्पष्ट होगा।
स्वतः संज्ञान का क्या मतलब है?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए जाने का अर्थ है कि अदालत ने किसी अलग अपील या पक्षकार की नियमित याचिका के बजाय सामने आए न्यायिक रिकॉर्ड और उसमें मौजूद मुद्दे के आधार पर स्वयं मामले को विचार के लिए लिया है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 9 जुलाई 2026 के पटना हाईकोर्ट के आदेश को संज्ञान में लिया और अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में फैसले के कुछ हिस्सों पर आपत्ति दर्ज की।
हालांकि, स्वतः संज्ञान लेने का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पहले ही रद्द कर दिया है। अभी आरोपी को नोटिस दिया गया है और आगे की सुनवाई के बाद ही अदालत किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचेगी।
मामले में यौन अपराध की कानूनी व्याख्या का सवाल
इस मामले की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी यौन अपराध में किए गए कथित कृत्य को कानून के तहत किस अपराध की श्रेणी में रखा जाए।
पटना हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह माना था कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री रेप के प्रयास के अपराध को स्थापित करने के लिए आवश्यक स्पष्ट कृत्य और मंशा साबित नहीं करती। हाईकोर्ट ने कथित कृत्यों को महिला की गरिमा भंग करने के अपराध के संदर्भ में देखा था।
सुप्रीम कोर्ट अब हाईकोर्ट के फैसले में की गई संबंधित टिप्पणियों और उसके कानूनी दृष्टिकोण की समीक्षा कर रहा है। इस स्तर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के पूरे फैसले को बदल देगा।
पहले भी ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने की है टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के सामने यौन अपराधों से जुड़े न्यायिक फैसलों में संवेदनशील भाषा और कानूनी दृष्टिकोण का मुद्दा पहले भी आया है। इसी वर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़े मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था और बाद में हाईकोर्ट की संबंधित टिप्पणियों पर हस्तक्षेप किया था।
पटना हाईकोर्ट का मौजूदा मामला उसी व्यापक न्यायिक संदर्भ में देखा जा रहा है, लेकिन दोनों मामलों के तथ्य और कानूनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए किसी पुराने फैसले के आधार पर मौजूदा मामले का परिणाम तय मानना उचित नहीं होगा।
अभी हाईकोर्ट का फैसला रद्द नहीं हुआ
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले को रद्द नहीं किया है।
अदालत ने केवल स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले में आरोपी को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की है। पीठ ने साफ कहा है कि आरोपी को सुनने के बाद ही हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करने पर विचार किया जा सकता है।
इसलिए मौजूदा स्थिति को “सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया” के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। अभी मामला न्यायिक समीक्षा के चरण में है।
आगे क्या होगा?
अब आरोपी हिमांशु कुमार पाठक को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद अदालत मामले में हाईकोर्ट के फैसले, संबंधित टिप्पणियों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करेगी।
अदालत यह तय कर सकती है कि हाईकोर्ट की किन टिप्पणियों में हस्तक्षेप आवश्यक है और क्या मूल फैसले के किसी हिस्से को बरकरार रखा जा सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की 24 सितंबर की सूची में भी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ दर्ज है।