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होर्मुज संकट पर वीटो की सियासत: बदलती वैश्विक ताकतों का नया खेल

None 2026-04-04 21:03:42
होर्मुज संकट पर वीटो की सियासत: बदलती वैश्विक ताकतों का नया खेल

होर्मुज पर टकराव: वीटो, वर्चस्व और वैश्विक संतुलन

यूएन में ठप प्रस्ताव, दुनिया में तेज़ शक्ति संघर्ष

फ्रांस की नई चाल और भारत की संतुलन नीति

होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अरब देशों के प्रस्ताव पर रूस, चीन और फ्रांस के वीटो ने वैश्विक राजनीति के नए समीकरण उजागर कर दिए हैं। यह सिर्फ एक समुद्री मार्ग का संकट नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया के उभरते शक्ति संघर्ष का प्रतीक है। अमेरिका की एकध्रुवीय ताकत को चुनौती मिल रही है, जबकि फ्रांस एक नई रणनीतिक धुरी बनाने की कोशिश कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका निर्णायक संतुलनकारी के रूप में उभर रही है।

📍नई दिल्ली / न्यूयॉर्क ✍️ आसिफ खान

होर्मुज: सिर्फ एक जलमार्ग नहीं, वैश्विक नस-ए-ज़िंदगी

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का दिल है। यहां से गुजरने वाला तेल और गैस सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांस है। जब यह मार्ग बाधित होता है, तो असर केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहता—दिल्ली से लेकर लंदन और टोक्यो तक हर बाजार में इसकी गूंज सुनाई देती है।

लेकिन सवाल यह है—क्या इस संकट का हल सैन्य कार्रवाई है?

अरब देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश प्रस्ताव इसी सोच से पैदा हुआ था। उनका तर्क सीधा था—अगर रास्ता बंद है, तो उसे खोलने के लिए “सभी आवश्यक साधन” इस्तेमाल किए जाएं। परंतु यह सोच जितनी सरल लगती है, उतनी ही खतरनाक भी है।

यूएन में वीटो: कूटनीति या रणनीतिक अवरोध?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों—रूस, चीन और फ्रांस—ने इस प्रस्ताव को रोक दिया।

पहली नज़र में यह फैसला अरब देशों के खिलाफ लगता है, लेकिन गहराई में जाएं तो यह एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा है।

रूस नहीं चाहता कि अमेरिका को सैन्य हस्तक्षेप का नया बहाना मिले

चीन वैश्विक व्यापार मार्गों को स्थिर रखना चाहता है, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व में नहीं

फ्रांस खुद को एक “मध्य शक्ति” के रूप में स्थापित करना चाहता है

यहां असली सवाल उठता है—क्या यह वीटो शांति के लिए था या शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए?

फ्रांस की चाल: मैक्रों का ‘मिडल पाथ’

इमैनुएल मैक्रों ने सैन्य विकल्प को “गैर-व्यावहारिक” बताया। लेकिन क्या यह केवल शांति की अपील है?

दरअसल, फ्रांस एक नया ग्लोबल ब्लॉक बनाना चाहता है—जो न पूरी तरह अमेरिका के साथ हो, न चीन के। यह विचार नया नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चार्ल्स डी गॉल ने भी इसी तरह की स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई थी।

मैक्रों उसी परंपरा को आधुनिक रूप दे रहे हैं।

उनका प्रस्ताव है—

मिड-साइज़ पावर का गठबंधन

टेक्नोलॉजी, एआई, डिफेंस और एनर्जी में सहयोग

अमेरिका और चीन के प्रभुत्व से दूरी

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—क्या यह गठबंधन वास्तव में संभव है?

नाटो की दरार: पश्चिमी एकता पर सवाल

नाटो का कमजोर होना इस पूरे संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

अमेरिका की अपेक्षा थी कि नाटो उसके साथ खड़ा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूरोप अब हर अमेरिकी युद्ध में शामिल होने के मूड में नहीं है।

इससे दो बातें साफ होती हैं:

अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है

यूरोप अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहता है

परंतु क्या यूरोप बिना अमेरिका के सुरक्षा छत्र के टिक सकता है? यह अभी अनुत्तरित प्रश्न है।

ईरान बनाम खाड़ी: पुराना संघर्ष, नई आग

ईरान और खाड़ी देशों—विशेषकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन—के बीच तनाव नया नहीं है।

लेकिन इस बार हालात अलग हैं:

ईरान ने सीधे समुद्री मार्ग को प्रभावित किया

नागरिक ठिकानों पर हमलों के आरोप लगे

क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया

बहरीन का आरोप है कि ईरान उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। दूसरी तरफ, ईरान खुद को “रक्षात्मक” स्थिति में बताता है।

यह वही क्लासिक जियोपॉलिटिकल नैरेटिव है—जहां हर पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताता है।

ऊर्जा संकट: दुनिया की जेब पर असर

होर्मुज के बंद होने से:

तेल की कीमतें बढ़ीं

शिपिंग कॉस्ट आसमान छू गई

बीमा प्रीमियम बढ़ गए

कतर जैसे देशों को भारी नुकसान हुआ। लेकिन इसका असर आम आदमी तक भी पहुंचा—पेट्रोल महंगा, ट्रांसपोर्ट महंगा, और अंततः महंगाई।

एक साधारण उदाहरण लें—
अगर तेल महंगा होता है, तो ट्रक का किराया बढ़ता है, जिससे सब्ज़ी से लेकर मोबाइल तक सब महंगा हो जाता है।

यूक्रेन और ईरान: दो युद्ध, एक संदेश

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही यह साबित कर दिया कि रूस को रोकना आसान नहीं है।

अब ईरान युद्ध ने एक और संदेश दिया है—
अमेरिका अब हर मोर्चे पर जीत की गारंटी नहीं दे सकता।

यहां एक दिलचस्प समानता है:

यूक्रेन में रूस को चीन का अप्रत्यक्ष समर्थन

ईरान में अमेरिका को उसी तरह चुनौती

यानी दुनिया अब “प्रॉक्सी बैटल्स” के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।

क्या अमेरिका फंस चुका है?

अमेरिका के लिए यह स्थिति मुश्किल है:

लंबे युद्ध का खर्च

घरेलू दबाव

अंतरराष्ट्रीय समर्थन में कमी

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया कि रूस और चीन ईरान की मदद कर रहे हैं।

अगर यह सही है, तो यह संघर्ष जल्दी खत्म नहीं होगा।

भारत: संतुलन का मास्टर या दबाव में खिलाड़ी?

भारत इस पूरे समीकरण में सबसे दिलचस्प भूमिका निभा रहा है।

हर बड़ी शक्ति उसे अपने साथ चाहती है:

अमेरिका: इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए

रूस: ऐतिहासिक रक्षा संबंधों के कारण

चीन: क्षेत्रीय संतुलन के लिए

यूरोप: नए गठबंधन के लिए

लेकिन भारत की नीति स्पष्ट है—
“किसी एक गुट में नहीं, सभी के साथ संतुलन”

यह आसान नहीं है।

एक उदाहरण:
अगर भारत अमेरिका के साथ जाता है, तो रूस नाराज हो सकता है।
अगर रूस के साथ जाता है, तो पश्चिमी प्रतिबंधों का खतरा।

इसलिए भारत “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चल रहा है।

फ्रांस बनाम अमेरिका-चीन-रूस: क्या संभव है?

फ्रांस की रणनीति महत्वाकांक्षी है, लेकिन चुनौतियां भी बड़ी हैं:

क्या यूरोप एकजुट रहेगा?

क्या एशियाई देश इसमें शामिल होंगे?

क्या यह गठबंधन केवल बयानबाजी तक सीमित रहेगा?

इतिहास बताता है कि ऐसे गठबंधन बनाना आसान है, चलाना मुश्किल।

काउंटर-आर्ग्युमेंट: क्या सैन्य कार्रवाई ही समाधान था?

अरब देशों का तर्क था कि:

अगर रास्ता बंद है, तो उसे बल से खोलना चाहिए

अंतरराष्ट्रीय कानून इसकी अनुमति देता है

लेकिन इसके खतरे भी हैं:

युद्ध का विस्तार

ईरान की जवाबी कार्रवाई

वैश्विक अस्थिरता

तो क्या वीटो सही था?

शायद हां… शायद नहीं।

 एक नई दुनिया की शुरुआत

यह संकट हमें एक बात साफ दिखाता है—

दुनिया अब बदल चुकी है।

अमेरिका अब अकेला सुपरपावर नहीं

रूस वापसी कर चुका है

चीन ताकतवर हो चुका है

यूरोप नई भूमिका तलाश रहा है

भारत संतुलन बना रहा है

और सबसे महत्वपूर्ण—
संघर्ष अब केवल युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति, अर्थव्यवस्था और गठबंधनों में लड़े जा रहे हैं।

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होर्मुज पर टकराव: वीटो, वर्चस्व और वैश्विक संतुलन

यूएन में ठप प्रस्ताव, दुनिया में तेज़ शक्ति संघर्ष

फ्रांस की नई चाल और भारत की संतुलन नीति

होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अरब देशों के प्रस्ताव पर रूस, चीन और फ्रांस के वीटो ने वैश्विक राजनीति के नए समीकरण उजागर कर दिए हैं। यह सिर्फ एक समुद्री मार्ग का संकट नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया के उभरते शक्ति संघर्ष का प्रतीक है। अमेरिका की एकध्रुवीय ताकत को चुनौती मिल रही है, जबकि फ्रांस एक नई रणनीतिक धुरी बनाने की कोशिश कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका निर्णायक संतुलनकारी के रूप में उभर रही है।

📍नई दिल्ली / न्यूयॉर्क ✍️ आसिफ खान

होर्मुज: सिर्फ एक जलमार्ग नहीं, वैश्विक नस-ए-ज़िंदगी

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का दिल है। यहां से गुजरने वाला तेल और गैस सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांस है। जब यह मार्ग बाधित होता है, तो असर केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहता—दिल्ली से लेकर लंदन और टोक्यो तक हर बाजार में इसकी गूंज सुनाई देती है।

लेकिन सवाल यह है—क्या इस संकट का हल सैन्य कार्रवाई है?

अरब देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश प्रस्ताव इसी सोच से पैदा हुआ था। उनका तर्क सीधा था—अगर रास्ता बंद है, तो उसे खोलने के लिए “सभी आवश्यक साधन” इस्तेमाल किए जाएं। परंतु यह सोच जितनी सरल लगती है, उतनी ही खतरनाक भी है।

यूएन में वीटो: कूटनीति या रणनीतिक अवरोध?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों—रूस, चीन और फ्रांस—ने इस प्रस्ताव को रोक दिया।

पहली नज़र में यह फैसला अरब देशों के खिलाफ लगता है, लेकिन गहराई में जाएं तो यह एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा है।

रूस नहीं चाहता कि अमेरिका को सैन्य हस्तक्षेप का नया बहाना मिले

चीन वैश्विक व्यापार मार्गों को स्थिर रखना चाहता है, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व में नहीं

फ्रांस खुद को एक “मध्य शक्ति” के रूप में स्थापित करना चाहता है

यहां असली सवाल उठता है—क्या यह वीटो शांति के लिए था या शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए?

फ्रांस की चाल: मैक्रों का ‘मिडल पाथ’

इमैनुएल मैक्रों ने सैन्य विकल्प को “गैर-व्यावहारिक” बताया। लेकिन क्या यह केवल शांति की अपील है?

दरअसल, फ्रांस एक नया ग्लोबल ब्लॉक बनाना चाहता है—जो न पूरी तरह अमेरिका के साथ हो, न चीन के। यह विचार नया नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चार्ल्स डी गॉल ने भी इसी तरह की स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई थी।

मैक्रों उसी परंपरा को आधुनिक रूप दे रहे हैं।

उनका प्रस्ताव है—

मिड-साइज़ पावर का गठबंधन

टेक्नोलॉजी, एआई, डिफेंस और एनर्जी में सहयोग

अमेरिका और चीन के प्रभुत्व से दूरी

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—क्या यह गठबंधन वास्तव में संभव है?

नाटो की दरार: पश्चिमी एकता पर सवाल

नाटो का कमजोर होना इस पूरे संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

अमेरिका की अपेक्षा थी कि नाटो उसके साथ खड़ा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूरोप अब हर अमेरिकी युद्ध में शामिल होने के मूड में नहीं है।

इससे दो बातें साफ होती हैं:

अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है

यूरोप अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहता है

परंतु क्या यूरोप बिना अमेरिका के सुरक्षा छत्र के टिक सकता है? यह अभी अनुत्तरित प्रश्न है।

ईरान बनाम खाड़ी: पुराना संघर्ष, नई आग

ईरान और खाड़ी देशों—विशेषकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन—के बीच तनाव नया नहीं है।

लेकिन इस बार हालात अलग हैं:

ईरान ने सीधे समुद्री मार्ग को प्रभावित किया

नागरिक ठिकानों पर हमलों के आरोप लगे

क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया

बहरीन का आरोप है कि ईरान उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। दूसरी तरफ, ईरान खुद को “रक्षात्मक” स्थिति में बताता है।

यह वही क्लासिक जियोपॉलिटिकल नैरेटिव है—जहां हर पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताता है।

ऊर्जा संकट: दुनिया की जेब पर असर

होर्मुज के बंद होने से:

तेल की कीमतें बढ़ीं

शिपिंग कॉस्ट आसमान छू गई

बीमा प्रीमियम बढ़ गए

कतर जैसे देशों को भारी नुकसान हुआ। लेकिन इसका असर आम आदमी तक भी पहुंचा—पेट्रोल महंगा, ट्रांसपोर्ट महंगा, और अंततः महंगाई।

एक साधारण उदाहरण लें—
अगर तेल महंगा होता है, तो ट्रक का किराया बढ़ता है, जिससे सब्ज़ी से लेकर मोबाइल तक सब महंगा हो जाता है।

यूक्रेन और ईरान: दो युद्ध, एक संदेश

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही यह साबित कर दिया कि रूस को रोकना आसान नहीं है।

अब ईरान युद्ध ने एक और संदेश दिया है—
अमेरिका अब हर मोर्चे पर जीत की गारंटी नहीं दे सकता।

यहां एक दिलचस्प समानता है:

यूक्रेन में रूस को चीन का अप्रत्यक्ष समर्थन

ईरान में अमेरिका को उसी तरह चुनौती

यानी दुनिया अब “प्रॉक्सी बैटल्स” के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।

क्या अमेरिका फंस चुका है?

अमेरिका के लिए यह स्थिति मुश्किल है:

लंबे युद्ध का खर्च

घरेलू दबाव

अंतरराष्ट्रीय समर्थन में कमी

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया कि रूस और चीन ईरान की मदद कर रहे हैं।

अगर यह सही है, तो यह संघर्ष जल्दी खत्म नहीं होगा।

भारत: संतुलन का मास्टर या दबाव में खिलाड़ी?

भारत इस पूरे समीकरण में सबसे दिलचस्प भूमिका निभा रहा है।

हर बड़ी शक्ति उसे अपने साथ चाहती है:

अमेरिका: इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए

रूस: ऐतिहासिक रक्षा संबंधों के कारण

चीन: क्षेत्रीय संतुलन के लिए

यूरोप: नए गठबंधन के लिए

लेकिन भारत की नीति स्पष्ट है—
“किसी एक गुट में नहीं, सभी के साथ संतुलन”

यह आसान नहीं है।

एक उदाहरण:
अगर भारत अमेरिका के साथ जाता है, तो रूस नाराज हो सकता है।
अगर रूस के साथ जाता है, तो पश्चिमी प्रतिबंधों का खतरा।

इसलिए भारत “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चल रहा है।

फ्रांस बनाम अमेरिका-चीन-रूस: क्या संभव है?

फ्रांस की रणनीति महत्वाकांक्षी है, लेकिन चुनौतियां भी बड़ी हैं:

क्या यूरोप एकजुट रहेगा?

क्या एशियाई देश इसमें शामिल होंगे?

क्या यह गठबंधन केवल बयानबाजी तक सीमित रहेगा?

इतिहास बताता है कि ऐसे गठबंधन बनाना आसान है, चलाना मुश्किल।

काउंटर-आर्ग्युमेंट: क्या सैन्य कार्रवाई ही समाधान था?

अरब देशों का तर्क था कि:

अगर रास्ता बंद है, तो उसे बल से खोलना चाहिए

अंतरराष्ट्रीय कानून इसकी अनुमति देता है

लेकिन इसके खतरे भी हैं:

युद्ध का विस्तार

ईरान की जवाबी कार्रवाई

वैश्विक अस्थिरता

तो क्या वीटो सही था?

शायद हां… शायद नहीं।

 एक नई दुनिया की शुरुआत

यह संकट हमें एक बात साफ दिखाता है—

दुनिया अब बदल चुकी है।

अमेरिका अब अकेला सुपरपावर नहीं

रूस वापसी कर चुका है

चीन ताकतवर हो चुका है

यूरोप नई भूमिका तलाश रहा है

भारत संतुलन बना रहा है

और सबसे महत्वपूर्ण—
संघर्ष अब केवल युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति, अर्थव्यवस्था और गठबंधनों में लड़े जा रहे हैं।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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