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कम उम्र में बढ़ रहा प्री-डायबिटीज का खतरा, किन आदतों को बदलना जरूरी?

Neelam Saini • 2026-09-01 22:44:09
कम उम्र में बढ़ रहा प्री-डायबिटीज का खतरा, किन आदतों को बदलना जरूरी?
कम उम्र में प्री-डायबिटीज का जोखिम चिंता का विषय है। खानपान सुधारने, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रित रखने और समय पर जांच कराने से टाइप-२ मधुमेह का खतरा कम किया जा सकता है।

कम उम्र में प्री-डायबिटीज क्यों बन रही चिंता?

नई दिल्ली। प्री-डायबिटीज को लंबे समय तक उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है, लेकिन अब कम उम्र में भी रक्त शर्करा सामान्य से ऊपर पहुंचने के मामले स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं। अप्रैल २०२६ में जारी अपोलो हॉस्पिटल्स की स्वास्थ्य रिपोर्ट में २०२५ के स्वास्थ्य परीक्षणों के आधार पर बताया गया कि उसके आंकड़ों में ३० वर्ष से कम उम्र के लोगों में लगभग हर पांचवां व्यक्ति प्री-डायबिटीज की श्रेणी में था। 

यह आंकड़ा पूरे भारत की युवा आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्योंकि यह अपोलो के स्वास्थ्य परीक्षणों से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है। फिर भी यह इस बात की ओर इशारा करता है कि कम उम्र में ही चयापचय संबंधी जोखिमों की पहचान और रोकथाम पर ध्यान देना जरूरी है।प्री-डायबिटीज का अर्थ है कि रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य से अधिक है, लेकिन अभी मधुमेह की निदान सीमा तक नहीं पहुंचा है। इसे भविष्य में टाइप-२ मधुमेह के बढ़े हुए जोखिम का संकेत माना जाता है। 

भारत में मधुमेह का बढ़ता बोझ

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के अनुसार, भारत में मधुमेह, प्री-डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, मोटापा और असामान्य रक्त वसा जैसे गैर-संचारी रोगों से जुड़े जोखिमों को समझने के लिए व्यापक अध्ययन किए गए हैं। आईसीएमआर का इंडियाब अध्ययन ३० राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक फैला और इसमें एक लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया। भारत में मधुमेह का जोखिम केवल उम्र बढ़ने से निर्धारित नहीं होता। शरीर का वजन, पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी, शारीरिक निष्क्रियता और पारिवारिक इतिहास जैसे कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

प्री-डायबिटीज में शरीर क्या संकेत देता है?

प्री-डायबिटीज कई बार बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रह सकती है। यही इसकी बड़ी चुनौती है। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन जांच में रक्त शर्करा सामान्य सीमा से अधिक मिल सकती है। इसी कारण केवल लक्षणों के आधार पर यह तय करना उचित नहीं कि किसी व्यक्ति को प्री-डायबिटीज है या नहीं। जोखिम वाले लोगों को चिकित्सक की सलाह के अनुसार रक्त शर्करा की जांच करानी चाहिए। 

पहली आदत—बैठे रहने का समय घटाएं

आज की नौकरी और पढ़ाई की दिनचर्या में लंबे समय तक कुर्सी पर बैठना आम हो गया है। शारीरिक गतिविधि कम होने से वजन बढ़ने और चयापचय संबंधी जोखिमों पर असर पड़ सकता है। अपोलो की २०२६ रिपोर्ट में उसके कॉरपोरेट स्वास्थ्य परीक्षणों में शामिल लोगों के बीच शारीरिक गतिविधि की कमी और अधिक वजन की समस्या भी सामने आई। रिपोर्ट में औसतन ३८ वर्ष की आयु वाले कॉरपोरेट समूह के आंकड़ों में बड़ी संख्या में लोग अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में थे। इसलिए दिनचर्या में पैदल चलना, सीढ़ियों का इस्तेमाल, नियमित व्यायाम और लंबे समय तक लगातार बैठे रहने के बीच छोटे-छोटे सक्रिय अंतराल शामिल करना उपयोगी हो सकता है।

रोज कम से कम ३० मिनट सक्रिय रहने की कोशिश

प्री-डायबिटीज के जोखिम को कम करने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि महत्वपूर्ण मानी जाती है। रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के अनुसार, मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि का लक्ष्य सप्ताह में कम से कम १५० मिनट रखा जा सकता है। इसे लगभग ३० मिनट प्रतिदिन, सप्ताह में पांच दिन के रूप में भी किया जा सकता है। हालांकि व्यायाम की शुरुआत व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और मौजूदा शारीरिक क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे करनी चाहिए। किसी बीमारी या लंबे समय से निष्क्रिय रहने की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

दूसरी आदत—मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी पर नियंत्रण

प्री-डायबिटीज के जोखिम को देखते हुए खानपान की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। मीठे पेय, अत्यधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ और जरूरत से ज्यादा कैलोरी का सेवन वजन तथा रक्त शर्करा नियंत्रण के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।इसका मतलब यह नहीं कि भोजन से हर प्रकार की कार्बोहाइड्रेट पूरी तरह समाप्त कर दी जाए। बेहतर तरीका संतुलित भोजन, उचित मात्रा और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना है। सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फल, पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर युक्त भोजन को व्यक्ति की जरूरत के अनुसार आहार में शामिल किया जा सकता है।

तीसरी आदत—वजन को नजरअंदाज न करें

अधिक वजन और मोटापा टाइप-२ मधुमेह के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल हैं। अगर किसी व्यक्ति का वजन अधिक है और उसे प्री-डायबिटीज है, तो वजन में मामूली कमी भी स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकती है।रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के अनुसार, अधिक वजन वाले प्री-डायबिटीज से पीड़ित लोगों में शरीर के वजन का लगभग ५ से ७ प्रतिशत कम करना और नियमित शारीरिक गतिविधि टाइप-२ मधुमेह के जोखिम को काफी कम कर सकती है। यह लक्ष्य तेजी से वजन घटाने के बजाय संतुलित और टिकाऊ जीवनशैली बदलाव के जरिए हासिल करना बेहतर है।

चौथी आदत—नींद और तनाव को भी गंभीरता से लें

स्वस्थ जीवनशैली केवल खानपान और व्यायाम तक सीमित नहीं है। पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन भी रोजमर्रा की सेहत का हिस्सा हैं।लगातार तनाव, अनियमित दिनचर्या और खराब नींद व्यक्ति की खानपान संबंधी आदतों तथा शारीरिक सक्रियता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए देर रात तक जागने और पूरे दिन निष्क्रिय रहने की आदत को सामान्य दिनचर्या नहीं बनने देना चाहिए।

पांचवीं आदत—सिर्फ लक्षण आने का इंतजार न करें

प्री-डायबिटीज कई बार बिना स्पष्ट लक्षणों के होती है। ऐसे में केवल प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना या थकान जैसे लक्षणों का इंतजार करना उचित नहीं है। जिन लोगों में पारिवारिक इतिहास, अधिक वजन, उच्च रक्तचाप या अन्य जोखिम कारक मौजूद हों, उन्हें चिकित्सक से चर्चा कर यह तय करना चाहिए कि रक्त शर्करा की जांच कब और कितनी बार जरूरी है। 

रक्त जांच से कैसे पता चलता है?

प्री-डायबिटीज की पहचान के लिए चिकित्सक रक्त शर्करा की जांच करा सकते हैं। हीमोग्लोबिन ए१सी ऐसी जांच है जो पिछले लगभग तीन महीनों के औसत रक्त शर्करा स्तर का अनुमान देती है। रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के अनुसार, ए१सी में ५.७ से ६.४ प्रतिशत का स्तर प्री-डायबिटीज की सीमा में माना जाता है, जबकि ६.५ प्रतिशत या उससे अधिक मधुमेह की सीमा में आता है। निदान के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है और किसी एक रिपोर्ट की स्वयं व्याख्या करके निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। 

अच्छी खबर यह है कि जोखिम कम किया जा सकता है

प्री-डायबिटीज का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति को निश्चित रूप से भविष्य में मधुमेह हो जाएगा। जीवनशैली में समय रहते बदलाव करने से टाइप-२ मधुमेह को रोका या उसके विकास को टाला जा सकता है। रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के अनुसार, वजन में लगभग ५ से ७ प्रतिशत की कमी और सप्ताह में कम से कम १५० मिनट की शारीरिक गतिविधि पर आधारित जीवनशैली कार्यक्रमों ने उच्च जोखिम वाले लोगों में टाइप-२ मधुमेह की घटना को लगभग ५८ प्रतिशत तक कम किया था। 

अपोलो की २०२६ रिपोर्ट में भी उसके ३० वर्ष से कम उम्र वाले उन प्री-डायबिटीज प्रतिभागियों में, जिन्होंने हस्तक्षेप के बाद कदम उठाए, सामान्य रक्त शर्करा की ओर लौटने की संभावना देखी गई। हालांकि यह भी उसी स्वास्थ्य जांच समूह का डेटा है और इसे पूरे देश के युवाओं पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। 

युवाओं को किन आदतों में बदलाव करना चाहिए?

विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए जीवनशैली सिद्धांतों के अनुरूप युवाओं के लिए कुछ बुनियादी बातों पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है—

* लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचें।
* सप्ताह में कम से कम १५० मिनट मध्यम शारीरिक गतिविधि का लक्ष्य रखें।
* मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी का सेवन सीमित करें।
* अत्यधिक प्रसंस्कृत और कैलोरी से भरपूर खाद्य पदार्थों की जगह संतुलित भोजन को प्राथमिकता दें।
* वजन बढ़ने की स्थिति में समय रहते कदम उठाएं।
* पर्याप्त नींद और नियमित दिनचर्या बनाए रखें।
* पारिवारिक इतिहास या अन्य जोखिम कारक होने पर चिकित्सकीय सलाह से रक्त शर्करा की जांच कराएं।
* किसी रिपोर्ट में प्री-डायबिटीज आने पर उसे नजरअंदाज न करें।

निष्कर्ष

कम उम्र में प्री-डायबिटीज का सामने आना इस बात की याद दिलाता है कि मधुमेह की रोकथाम केवल उम्र बढ़ने के बाद शुरू करने वाला काम नहीं है। संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन पर नियंत्रण, पर्याप्त नींद और समय पर स्वास्थ्य जांच जैसी आदतें जोखिम कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सबसे अहम बात यह है कि प्री-डायबिटीज को अंतिम बीमारी की तरह नहीं, बल्कि समय रहते मिलने वाली चेतावनी के रूप में देखा जाए। यदि रक्त शर्करा जांच में प्री-डायबिटीज सामने आती है, तो व्यक्ति को चिकित्सक या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ के साथ मिलकर अपनी जीवनशैली और आगे की जांच की योजना बनानी चाहिए।

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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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