साइबर अपराधी अब फर्जी कड़ियों तक सीमित नहीं हैं। वे भरोसा, डर और जल्दबाजी का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं। डिजिटल गिरफ्तारी, वरिष्ठ अधिकारी बनकर ठगी और निवेश धोखाधड़ी इसके नए उदाहरण हैं।
भारत | 29 सितंबर 2026
By Mohd Haris
शहर में साइबर ठगी का नया पैटर्न, लोग कैसे भरोसे, डर और लालच के जाल में फंस रहे हैं?
शहरों में साइबर ठगी का तरीका लगातार बदल रहा है। पहले ठगों का तरीका अक्सर फर्जी संदेश, नकली कड़ी, पासवर्ड, ओटीपी या बैंक खाते से जुड़ी जानकारी हासिल करने तक सीमित दिखाई देता था। अब ठगी का तरीका ज्यादा संगठित और मनोवैज्ञानिक हो गया है।
ठग पहले भरोसा पैदा करते हैं। इसके बाद डर, लालच, नौकरी, निवेश, कानूनी कार्रवाई या किसी परिचित की पहचान का इस्तेमाल करके सामने वाले पर दबाव बनाया जाता है। आखिर में पीड़ित से पैसा भेजने, बैंक संबंधी जानकारी देने या अपने मोबाइल और सामाजिक माध्यमों तक पहुंच देने के लिए कहा जाता है।
यही वजह है कि साइबर ठगी को केवल तकनीकी अपराध मानना पर्याप्त नहीं है। इसमें इंसानी व्यवहार और मनोविज्ञान का भी इस्तेमाल किया जाता है।
ठगी की शुरुआत पैसे से नहीं, भरोसे से होती है
साइबर ठगी के कई मामलों में अपराधी शुरुआत में पैसे की मांग नहीं करता। पहले वह अपनी पहचान को विश्वसनीय बनाने की कोशिश करता है।
ठग खुद को बैंक कर्मचारी, पुलिस अधिकारी, सरकारी विभाग का प्रतिनिधि, कंपनी का वरिष्ठ अधिकारी, ग्राहक सेवा कर्मचारी या किसी परिचित व्यक्ति के रूप में पेश कर सकता है।
बातचीत के दौरान वह पीड़ित के बारे में उपलब्ध सामान्य जानकारी का इस्तेमाल कर सकता है। इससे सामने वाले को लगता है कि फोन करने वाला व्यक्ति वास्तव में किसी संस्था से जुड़ा हुआ है।
इसके बाद बातचीत धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुंचाई जाती है जहां पीड़ित खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है।
डर पैदा करना ठगी का बड़ा हथियार
साइबर अपराध में डर पैदा करने की रणनीति तेजी से सामने आई है।
पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम से कोई गैरकानूनी लेनदेन हुआ है। कभी बैंक खाता बंद करने की बात कही जाती है। कभी गिरफ्तारी का डर दिखाया जाता है। कई मामलों में कहा जाता है कि अगर तत्काल पैसा नहीं भेजा गया तो कानूनी कार्रवाई शुरू हो जाएगी।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति घबराकर सामान्य सावधानी भूल सकता है।
सरकारी साइबर अपराध समन्वय तंत्र की ओर से डिजिटल गिरफ्तारी के नाम पर होने वाली ठगी को लेकर लगातार चेतावनी दी गई है। स्पष्ट किया गया है कि भारतीय कानून में डिजिटल गिरफ्तारी नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
डिजिटल गिरफ्तारी के नाम पर ठगी
डिजिटल गिरफ्तारी ठगी में अपराधी पुलिस या किसी केंद्रीय जांच संस्था के अधिकारी के रूप में सामने आने की कोशिश करता है।
कई मामलों में वीडियो बातचीत शुरू की जाती है। सामने मौजूद व्यक्ति को वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि, फर्जी कागजात या सरकारी कार्रवाई जैसी भाषा के जरिए प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।
इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि वह किसी गंभीर मामले में जांच के घेरे में है।
उसे लगातार वीडियो बातचीत में बने रहने के लिए कहा जा सकता है। इसके बाद बैंक खाते की जांच, सुरक्षा राशि, सत्यापन या जांच के नाम पर पैसे की मांग की जाती है।
असलियत यह है कि कोई भी वैध सरकारी अधिकारी वीडियो कॉल पर किसी नागरिक से इस तरह धन जमा कराने की प्रक्रिया नहीं चलाता।
अब वरिष्ठ अधिकारी के नाम पर भी ठगी
साइबर अपराध का एक नया तरीका वरिष्ठ अधिकारियों की पहचान का दुरुपयोग है।
सरकारी साइबर अपराध समन्वय तंत्र ने ऐसे मामले को लेकर चेतावनी दी है जिसमें अपराधी किसी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी या वरिष्ठ अधिकारी के नाम से कर्मचारी को संदेश भेजता है।
कर्मचारी को बताया जाता है कि कोई जरूरी सरकारी या नियामकीय काम पूरा करना है। इसके लिए तत्काल भुगतान या धन हस्तांतरण करने का निर्देश दिया जाता है।
कुछ मामलों में फर्जी फाइल भेजे जाने और उसके माध्यम से कंप्यूटर या संदेश सेवा तक अनधिकृत पहुंच बनाने की कोशिश भी की जाती है।
इसके बाद उसी पहचान का इस्तेमाल दूसरे कर्मचारियों से धन मंगाने के लिए किया जा सकता है।
इस तरीके में अपराधी तकनीक के साथ संस्थागत भरोसे का इस्तेमाल करता है।
निवेश के नाम पर बढ़ता लालच
निवेश से जुड़ी ठगी में अपराधी पहले भरोसा बनाने की कोशिश करता है।
पीड़ित को किसी निवेश समूह, संदेश समूह या कथित विशेषज्ञ से जोड़ा जा सकता है। शुरुआत में उसे छोटे निवेश पर लाभ दिखाया जाता है।
मोबाइल पर दिखाई जाने वाली राशि बढ़ती हुई नजर आती है। इससे पीड़ित को लगता है कि उसका निवेश सफल हो रहा है।
इसके बाद उससे ज्यादा पैसा लगाने के लिए कहा जाता है।
जब पीड़ित पैसा वापस निकालना चाहता है तो कर, शुल्क, प्रसंस्करण राशि या सत्यापन के नाम पर अतिरिक्त धन मांगा जाता है।
कई मामलों में खाते पर दिखाई देने वाला लाभ वास्तविक धन नहीं होता। वह केवल फर्जी डिजिटल प्रदर्शन हो सकता है।
नौकरी के नाम पर भी साइबर ठगी
नौकरी और घर बैठे कमाई के नाम पर होने वाली ठगी भी लगातार सामने आती रही है।
अपराधी लोगों को संदेश भेजकर आसान काम और अधिक कमाई का प्रस्ताव देते हैं। शुरुआत में छोटे काम दिए जा सकते हैं।
इसके बाद पंजीकरण शुल्क, सुरक्षा राशि या किसी अन्य नाम पर भुगतान करने को कहा जाता है।
कुछ मामलों में पीड़ित को एक के बाद एक भुगतान करने के लिए तैयार किया जाता है।
नौकरी देने से पहले लगातार पैसे की मांग होना गंभीर चेतावनी का संकेत है।
सामाजिक माध्यमों से पहचान का दुरुपयोग
सामाजिक माध्यमों पर मौजूद जानकारी साइबर अपराधियों के लिए उपयोगी हो सकती है।
नाम, फोटो, नौकरी, रिश्ते, शहर, परिवार और रोजमर्रा की गतिविधियों से जुड़ी सार्वजनिक जानकारी का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने में किया जा सकता है।
सरकारी साइबर अपराध तंत्र ने संदेश सेवा खातों को किराए पर देने वाले फर्जी नेटवर्क को लेकर भी चेतावनी जारी की है।
किसी व्यक्ति को अपना संदेश सेवा खाता, बैंक खाता, सिम कार्ड या डिजिटल पहचान किसी दूसरे व्यक्ति के इस्तेमाल के लिए नहीं देना चाहिए।
रिश्तों के जरिए निवेश ठगी
ऑनलाइन रिश्तों के नाम पर होने वाली ठगी में भी वित्तीय धोखाधड़ी का एक पैटर्न सामने आया है।
अपराधी पहले नकली पहचान के साथ संपर्क बनाता है। बातचीत लगातार आगे बढ़ती है और भरोसा कायम किया जाता है।
कुछ समय बाद निवेश, डिजिटल मुद्रा या कम समय में ज्यादा लाभ की बात शुरू होती है।
पीड़ित भावनात्मक भरोसे के कारण आर्थिक फैसला कर सकता है।
ऐसे मामलों में व्यक्तिगत संबंध और वित्तीय लेनदेन को अलग रखना महत्वपूर्ण है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने खतरा बढ़ाया
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक ने पहचान की नकल करना आसान बनाया है।
किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीर या वीडियो से मिलती-जुलती नकली सामग्री तैयार की जा सकती है।
इसका इस्तेमाल किसी परिचित व्यक्ति की आवाज में पैसे मांगने या किसी वरिष्ठ अधिकारी की पहचान का दुरुपयोग करने के लिए किया जा सकता है।
इसलिए केवल आवाज सुनकर या वीडियो में चेहरा देखकर पहचान की पुष्टि करना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए।
अगर कोई परिचित अचानक पैसे मांगता है तो उसके पुराने और भरोसेमंद नंबर पर अलग से फोन करके पुष्टि करना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।
साइबर ठगी में जल्दबाजी क्यों कराई जाती है?
साइबर ठग जानते हैं कि व्यक्ति को सोचने का समय मिलने पर धोखे का पता चल सकता है।
इसीलिए बातचीत में जल्दी पैदा की जाती है।
कहा जाता है कि अभी पैसा भेजना जरूरी है। अभी सत्यापन करना जरूरी है। अभी खाता बंद होने वाला है। अभी गिरफ्तारी हो सकती है। अभी निवेश नहीं किया तो मौका चला जाएगा।
इस तरह पीड़ित को स्वतंत्र रूप से जांच करने का समय नहीं दिया जाता।
यहीं सावधानी सबसे ज्यादा जरूरी है।
कोई भी व्यक्ति अगर आपको डराकर या जल्दबाजी कराकर पैसा भेजने के लिए मजबूर कर रहा है तो बातचीत रोकना पहला सुरक्षित कदम है।
साइबर ठगी का आर्थिक असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार नागरिक वित्तीय साइबर ठगी की शिकायतों में बड़ी मात्रा में धनराशि शामिल है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार 30 जून 2026 तक नागरिक वित्तीय साइबर ठगी रिपोर्टिंग और प्रबंधन व्यवस्था के माध्यम से 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम को बचाने में मदद मिली।
यह व्यवस्था ठगी की सूचना मिलने के बाद संबंधित वित्तीय संस्थाओं तक जानकारी पहुंचाने और धन की निकासी रोकने के प्रयास से जुड़ी है।
इस आंकड़े से एक बात स्पष्ट होती है। साइबर ठगी के बाद शिकायत करने में देरी नुकसान बढ़ा सकती है।
ठगी होने के बाद सबसे पहले क्या करें?
अगर आपके खाते से पैसा निकल गया है तो घबराकर चुप न बैठें।
सबसे पहले 1930 पर साइबर वित्तीय ठगी की सूचना दें।
इसके साथ राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
अपने बैंक को तत्काल सूचना दें।
लेनदेन संख्या, बैंक संदेश, मोबाइल नंबर, बातचीत, ईमेल, भुगतान विवरण, संदिग्ध वेबसाइट और स्क्रीन के चित्र सुरक्षित रखें।
किसी भी प्रमाण को मिटाएं नहीं।
ठग से हुई बातचीत भी जांच में उपयोगी हो सकती है।
कौन से संकेत खतरे की घंटी हैं?
अगर कोई व्यक्ति खुद को सरकारी अधिकारी बताकर तुरंत पैसा मांगता है तो सावधान रहें।
अगर कोई बैंक कर्मचारी बनकर ओटीपी, पासवर्ड या व्यक्तिगत बैंकिंग जानकारी मांगता है तो जानकारी साझा न करें।
अगर कोई नौकरी देने से पहले पैसे मांगता है तो स्वतंत्र जांच करें।
अगर कोई निवेश में निश्चित और असामान्य लाभ का दावा करता है तो सावधानी बरतें।
अगर कोई परिचित नए नंबर से अचानक पैसे मांगता है तो पुराने नंबर से संपर्क करके पुष्टि करें।
अगर कोई आपको अनजान अनुप्रयोग लगाने या मोबाइल की स्क्रीन किसी दूसरे व्यक्ति को दिखाने के लिए कहता है तो ऐसा न करें।
अपने मोबाइल और खातों को कैसे सुरक्षित रखें?
बैंक संबंधी संदेशों को ध्यान से पढ़ें।
हर महत्वपूर्ण खाते पर दो चरणों वाली सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय रखें।
पासवर्ड अलग-अलग रखें।
अनजान कड़ी पर क्लिक न करें।
अनजान अनुप्रयोग डाउनलोड न करें।
सार्वजनिक रूप से निजी जानकारी साझा करने से बचें।
बैंक खाता, सिम कार्ड, संदेश सेवा खाता या डिजिटल पहचान किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल के लिए न दें।
अपने परिवार के बुजुर्ग सदस्यों को भी ऐसे तरीकों के बारे में जानकारी दें।
साइबर सुरक्षा केवल तकनीक का मामला नहीं
साइबर अपराध से बचने के लिए मजबूत पासवर्ड और सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है, लेकिन केवल तकनीकी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है।
व्यक्ति को यह समझना भी जरूरी है कि सामने वाला उसे किस मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रभावित कर रहा है।
डर, लालच, भरोसा और जल्दबाजी, चारों साइबर ठगी के महत्वपूर्ण हथियार बन सकते हैं।
अगर कोई बातचीत आपको सोचने का समय नहीं दे रही है तो वहीं रुकना जरूरी है।
शहरों में बदल रहा है साइबर अपराध का चेहरा
साइबर ठगी अब केवल किसी फर्जी संदेश या संदिग्ध कड़ी तक सीमित नहीं रही।
अब पहचान की नकल, वीडियो बातचीत, नकली सरकारी कार्रवाई, वरिष्ठ अधिकारी का नाम, नौकरी, निवेश, सामाजिक संबंध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का इस्तेमाल अलग-अलग तरीकों से किया जा रहा है।
इस बदलते माहौल में डिजिटल सावधानी रोजमर्रा की जरूरत बन गई है।
सबसे महत्वपूर्ण नियम सरल है।
पैसा भेजने से पहले रुकिए।
पहचान की स्वतंत्र पुष्टि कीजिए।
दबाव में फैसला मत लीजिए।
और अगर ठगी हो चुकी है तो तुरंत 1930 पर सूचना दीजिए।
साइबर अपराध में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। जितनी जल्दी सूचना दी जाएगी, उतनी जल्दी संबंधित तंत्र को लेनदेन रोकने और रकम की निगरानी करने का मौका मिलेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।