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Uttar Pradesh

संभल हिंसा केस में NSA हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल, कथित पुलिस कस्टडी कबूलनामे पर उठी आपत्ति

Mohammad Naved • 2026-09-29 11:22:18
संभल हिंसा केस में NSA हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल, कथित पुलिस कस्टडी कबूलनामे पर उठी आपत्ति

  • संभल हिंसा: मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछे कड़े सवाल
  • पुलिस कस्टडी के कथित कबूलनामे पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, संभल NSA केस में क्या हुआ?
  • संभल हिंसा केस में NSA कार्रवाई की कानूनी बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट की पड़ताल
  • 📍

    संभल, उत्तर प्रदेश

    🗓️

    29 सितंबर 2026

    ✍️ MOHD NAVED


    Introduction

    संभल हिंसा मामले में National Security Act यानी NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत अब सुप्रीम कोर्ट की कानूनी जांच के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 में सुनवाई के दौरान खास तौर पर इस सवाल पर सरकार से जवाब मांगा कि पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए confession को preventive detention के लिए जरूरी subjective satisfaction का आधार बनाया जा सकता है या नहीं।

    यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि NSA सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग preventive detention की व्यवस्था है। इसमें अदालत का फोकस केवल आरोपों की गंभीरता पर नहीं, बल्कि detention order जारी करने की प्रक्रिया, उपलब्ध सामग्री और संवैधानिक safeguards के पालन पर भी रहता है।


    Essential Facts

    मुल्ला अफरोज को संभल की नवंबर 2024 की हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपी बनाया गया था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया और बाद में 13 अक्टूबर 2025 को District Magistrate, Sambhal ने NSA की धारा 3(2) के तहत detention order जारी किया।

    उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में कहा गया था कि अफरोज की गतिविधियों और उपलब्ध material से public order प्रभावित होने का आधार बनता था। सरकार ने यह भी कहा था कि detention order कई दस्तावेजों और पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया।


    Main Development

    सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद बहस का केंद्र detention order की पूरी factual background से ज्यादा उस material की evidentiary relevance बन गई, जिसके आधार पर preventive detention का फैसला लिया गया।

    8 सितंबर 2026 की सुनवाई में Justice Dipankar Datta और Justice Sheel Nagu की Bench ने सवाल किया कि पुलिस custody में कथित confession को NSA के तहत detention के लिए आवश्यक subjective satisfaction का आधार किस सीमा तक बनाया जा सकता है। सुनवाई के बाद Bench ने order reserve कर लिया।

    यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण legal issue है।


    Statements and Attribution

    उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष रहा है कि मुल्ला अफरोज के खिलाफ उपलब्ध material public order के लिए गंभीर खतरे की ओर इशारा करता था। सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में कहा था कि detention order जारी करते समय पुलिस और प्रशासन की रिपोर्ट, केस रिकॉर्ड और अन्य material पर विचार किया गया था।

    दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से detention की प्रक्रिया और कथित police confession की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सितंबर 2026 की सुनवाई में भी इसी तरह के सवालों पर न्यायिक परीक्षण हुआ।


    Background

    संभल में 24 नवंबर 2024 को Shahi Jama Masjid के court-ordered survey के दौरान हिंसा हुई थी। न्यायिक रिकॉर्ड में इस घटना के दौरान public और police personnel के घायल होने तथा लोगों की मौत का उल्लेख है।

    मुल्ला अफरोज के खिलाफ कई criminal cases दर्ज किए गए। सरकारी रिकॉर्ड में 2024 के कई Case Crime Numbers का उल्लेख है। इनमें हिंसा, हत्या और Arms Act से जुड़े आरोप शामिल हैं। ये आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं और आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं हैं।


    NSA विवाद की असल वजह क्या है?

    यहां सबसे अहम फर्क criminal prosecution और preventive detention का है।

    सामान्य criminal case में prosecution को अदालत के सामने आरोप साबित करने होते हैं। इसके विपरीत preventive detention का उद्देश्य किसी व्यक्ति को भविष्य में public order या अन्य निर्धारित हितों के खिलाफ संभावित गतिविधि से रोकना होता है।

    इसी वजह से Constitution का Article 22 preventive detention के मामलों में procedural safeguards देता है। Detention के grounds की जानकारी और representation का अवसर इसी constitutional framework का हिस्सा है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में मुल्ला अफरोज की habeas corpus petition खारिज करते हुए कहा था कि detention order में relevant material और authority की subjective satisfaction दर्ज थी। हाईकोर्ट ने detention order को उस स्तर पर हस्तक्षेप योग्य नहीं माना।


    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

    8 जून 2026 के फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि detention authority ने उपलब्ध material पर विचार किया था और detention के grounds में public order से जुड़े facts दर्ज थे। अदालत ने यह भी माना कि detention order में authority की satisfaction के लिए material मौजूद था।

    इसका मतलब यह है कि मुल्ला अफरोज की detention को लेकर High Court और Supreme Court proceedings को एक ही judicial stage के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    High Court ने जून में detention को चुनौती देने वाली petition खारिज की थी। इसके बाद Supreme Court में अलग legal challenge पर सवाल उठे।


    कथित confession पर सवाल क्यों अहम है?

    Supreme Court की सितंबर 2026 की सुनवाई का मुख्य कानूनी सवाल यही था कि पुलिस custody में कथित confession को preventive detention के लिए material की तरह इस्तेमाल करने की सीमा क्या है।

    यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि preventive detention में authority की subjective satisfaction जरूर होती है, लेकिन वह पूरी तरह material से अलग नहीं हो सकती।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में भी Supreme Court के पुराने principles का उल्लेख है कि subjective satisfaction relevant material पर आधारित होनी चाहिए और decision-making process में application of mind दिखाई देना चाहिए।


    ₹10 लाख के जुर्माने का दावा

    इस मामले में सबसे ज्यादा सावधानी इसी हिस्से में जरूरी है।

    दिए गए headline में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया। लेकिन उपलब्ध judicial records और 8 सितंबर 2026 की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई से मुझे इस ₹10 लाख की लागत का पुष्ट आदेश नहीं मिला।

    इसलिए इसे Shah Times की verified report में Supreme Court का confirmed finding लिखना उचित नहीं होगा।

    उपलब्ध रिकॉर्ड से अभी इतना स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट ने NSA detention के आधार और कथित custodial confession की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

    संभल हिंसा में मुल्ला अफरोज की भूमिका पर क्या स्थिति है?

    मुल्ला अफरोज के खिलाफ पुलिस और प्रशासन ने गंभीर आरोप लगाए हैं। सरकारी पक्ष ने उन्हें हिंसा और public order प्रभावित करने वाली गतिविधियों से जोड़ा था।

    लेकिन किसी आरोपी के खिलाफ FIR, police allegation या chargesheet को final conviction नहीं माना जा सकता। अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी competent criminal court के adjudication से तय होती है।

    यह distinction इस मामले में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि Supreme Court की वर्तमान scrutiny NSA detention की legality और decision-making process से जुड़ी है, न कि इस stage पर पूरे criminal prosecution में दोषसिद्धि तय करने से।


    Important Dates

    19 नवंबर 2024 को संभल की Shahi Jama Masjid के survey से संबंधित court proceedings शुरू हुईं।

    24 नवंबर 2024 को survey के दौरान हिंसा हुई और कई लोगों की मौत हुई।

    17 जनवरी 2025 को पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया गया।

    13 अक्टूबर 2025 को District Magistrate, Sambhal ने NSA के तहत detention order जारी किया।

    28 नवंबर 2025 को State Government ने detention को 12 महीने की अवधि के लिए confirm किया।

    8 जून 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने detention challenge वाली habeas corpus petition खारिज की।

    8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कथित custodial confession और NSA detention के संबंध पर सवाल उठाए और order reserve किया।


    What Happens Next

    अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के reserved order का महत्व सबसे ज्यादा है।

    अदालत यह स्पष्ट कर सकती है कि उपलब्ध material preventive detention की subjective satisfaction के लिए पर्याप्त कानूनी आधार बनता है या नहीं।

    यदि अदालत detention order को procedural या constitutional grounds पर रद्द करती है, तो उसका असर मुल्ला अफरोज की preventive detention पर पड़ेगा। लेकिन इससे अपने आप उनके खिलाफ चल रहे सभी criminal cases समाप्त नहीं होंगे। वे अलग judicial proceedings हैं।

    इसी तरह, यदि detention order को अदालत बरकरार रखती है, तो criminal prosecution अपनी अलग प्रक्रिया के तहत जारी रह सकता है।


    Conclusion

    संभल हिंसा मामले में मौजूदा विवाद को केवल ₹10 लाख के कथित जुर्माने तक सीमित करना कानूनी तस्वीर को अधूरा कर देगा।

    इस मामले का वास्तविक legal question NSA के इस्तेमाल, subjective satisfaction और police custody में कथित confession की भूमिका से जुड़ा है।

    उपलब्ध रिकॉर्ड यह दिखाता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में detention को वैध माना था, जबकि सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उसी detention की कानूनी बुनियाद से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

    इसलिए अंतिम रिपोर्टिंग में सुप्रीम कोर्ट के reserved order और उसके आधिकारिक पाठ को प्राथमिक आधार बनाना जरूरी होगा। फिलहाल ₹10 लाख की लागत को verified judicial fact के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

    वीडियो देखें

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    Mohammad Naved

    Mohammad Naved

    Shah Times Reporter

    शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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