उत्तराखंड में रूद्रप्रयाग, चमोली और टिहरी में बादल फटने से पहाड़ों पर तबाही। कई लोग लापता, सड़कें टूटीं और जनजीवन अस्त-व्यस्त। राहत-बचाव जारी।
✍️ चिरंजीव सेमवाल, शाह टाइम्स
रूद्रप्रयाग छेनागाड़ बाजार तबाह, 10 से अधिक लोग लापता
उत्तराखंड की धरती एक बार फिर आसमानी आफ़त का शिकार बनी। बीती रात से हो रही मूसलाधार बारिश ने पहाड़ों से लेकर मैदानी ज़िलों तक तबाही मचा दी। रूद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी और हरिद्वार से लगातार हादसों और नुक़सान की ख़बरें सामने आ रही हैं। सबसे भयावह दृश्य रूद्रप्रयाग ज़िले के छेनागाड़ बाज़ार का है, जहाँ पूरा इलाक़ा मलबे में तब्दील हो गया। प्रशासन ने 10 से अधिक लोगों के लापता होने की पुष्टि की है।
पहाड़ों में तबाही की जड़
उत्तराखंड की भौगोलिक बनावट हमेशा से संवेदनशील रही है। ऊँचे पहाड़, ढलानों पर बसी बस्तियाँ और तेज़ बारिश का अचानक हमला, यह सब मिलकर तबाही का कारण बनते हैं। रूद्रप्रयाग के छेनागाड़ से लेकर चमोली के मोपाटा और टिहरी के गेंवाली तक हर जगह एक ही तस्वीर उभरी – टूटी सड़कें, मलबे में दबे घर, और सहमी हुई आबादी।
रूद्रप्रयाग: छेनागाड़ बाज़ार पूरी तरह तबाह, जखोली ब्लॉक के गाँवों में बादल फटने से तबाही।
चमोली: देवाल ब्लॉक के मोपाटा गाँव में भूस्खलन से मकान ढहे, दो लोग लापता, मवेशी दबे।
टिहरी: गेंवाली में रातभर बारिश के बाद बादल फटा, कई गाँव प्रभावित।
हरिद्वार: जलभराव से शहर की सड़कें नदियों में तब्दील, घरों तक पहुँचा पानी।
उत्तरकाशी: गंगोत्री और यमुनोत्री हाइवे मलबे और बोल्डर से बंद।
प्रशासन और राहत कार्य
जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदन सिंह रजवार ने पुष्टि की कि कई मोटर मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए हैं और टीमों को युद्धस्तर पर राहत कार्य में लगाया गया है। हेली रेस्क्यू और NDRF को भी अलर्ट कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ट्वीट कर कहा कि "सरकार प्रभावित परिवारों के साथ खड़ी है, राहत और बचाव में कोई कमी नहीं रहेगी।"
आपदा का हर बार सिर्फ़ मौसम पर ठीकरा फोड़ना आसान है, मगर असल सवाल यह है कि पहाड़ों पर हो रहे अनियंत्रित निर्माण, पर्यटन दबाव और खनन जैसी गतिविधियाँ इस तबाही को और क्यों बढ़ा देती हैं।
विकास बनाम विनाश: हाईवे चौड़ीकरण, बांध निर्माण और अतिक्रमण ने नदियों और पहाड़ों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।
प्रशासनिक तैयारी: हर साल मानसून से पहले आपदा प्रबंधन की बातें होती हैं, पर ज़मीनी स्तर पर चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था कमज़ोर रहती है।
स्थानीय समुदाय की मजबूरी: रोज़गार के सीमित अवसरों के कारण लोग खतरनाक ढलानों और नदी किनारों पर घर बनाने को मजबूर हैं।
उत्तराखंड की इस त्रासदी ने फिर यह सच्चाई सामने रख दी है कि पहाड़ केवल प्राकृतिक आपदाओं का नहीं बल्कि मानवीय लापरवाही का भी शिकार हैं। जब तक विकास मॉडल को पर्यावरण-संवेदी नहीं बनाया जाएगा, तब तक हर साल ऐसी तबाही सामने आती रहेगी।
राहत-बचाव कार्य ज़रूरी हैं, मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी है कि नीति-निर्माण में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए। वरना, उत्तराखंड बार-बार अपने ही लोगों की चीखों में डूबता रहेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।