मिडिल ईस्ट में बढ़ती जंग और तनाव के बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य फिर वैश्विक सियासत के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अहम समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए सात देशों से नौसैनिक जहाज़ भेजने की गुज़ारिश की है।यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का कारोबार गुजरता है। ईरान की ओर से इस रास्ते को बंद करने की धमकी ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है।
इस पूरी बहस के केंद्र में सिर्फ समुद्री सुरक्षा नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा निर्भरता और सैन्य रणनीति का बड़ा सवाल भी मौजूद है।
दुनिया के नक्शे पर कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिनकी अहमियत सिर्फ भूगोल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था उनसे जुड़ जाती है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य भी ऐसा ही एक समुद्री मार्ग है।
यह संकरा रास्ता फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। लेकिन इसकी असली अहमियत तेल और गैस के कारोबार से जुड़ी है।
दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल टैंकरों के जरिये इसी मार्ग से एशिया, यूरोप और अन्य हिस्सों तक पहुंचता है।
यही वजह है कि जब इस रास्ते के बंद होने की आशंका पैदा होती है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में हलचल मच जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया बयान में कहा कि इस जलमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए कई देशों से युद्धपोत भेजने की अपील की गई है।
उनका तर्क साफ है। जो देश इस रास्ते से तेल हासिल करते हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी साझा करनी चाहिए।
इस सोच के पीछे एक रणनीतिक संदेश भी छिपा है। अमेरिका लंबे समय से खुद को वैश्विक समुद्री सुरक्षा का प्रमुख संरक्षक मानता रहा है। लेकिन अब वॉशिंगटन यह संकेत दे रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल अमेरिका की नहीं बल्कि उन सभी देशों की भी है जो इस मार्ग से लाभ उठाते हैं।
ट्रंप का बयान इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि ट्रंप की इस अपील को यूरोप से तुरंत समर्थन नहीं मिला। कई यूरोपीय देशों ने साफ किया कि वे बिना स्पष्ट रणनीति के सीधे सैन्य भूमिका में नहीं उतरना चाहते।
यहीं से एक नया सवाल पैदा होता है।
क्या पश्चिमी गठबंधन के भीतर रणनीतिक मतभेद बढ़ रहे हैं?
ट्रंप पहले भी नाटो सहयोगियों पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वे सुरक्षा का बोझ बराबरी से नहीं उठाते। होर्मुज़ का संकट अब इसी बहस को एक नए मोड़ पर ले आया है।
अगर सहयोगी देश सैन्य समर्थन से पीछे हटते हैं तो यह पश्चिमी गठबंधन की एकता पर सवाल खड़ा कर सकता है।
ईरान की स्थिति भी समझना जरूरी है।
सैन्य ताकत के मामले में ईरान अमेरिका से मुकाबले में कमजोर माना जाता है। लेकिन उसने कई बार यह दिखाया है कि वह सीधे युद्ध के बजाय अप्रत्यक्ष रणनीति अपनाने में माहिर है।
समुद्री रास्तों पर दबाव बनाना, तेल ढांचे को निशाना बनाना और क्षेत्रीय तनाव बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है।
ऐसा करके तेहरान दो बड़े मकसद हासिल करना चाहता है।
पहला, वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता पैदा करना।
दूसरा, अमेरिका और उसके सहयोगियों पर राजनीतिक दबाव बढ़ाना।
अगर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो उसका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और पश्चिमी सरकारों के लिए घरेलू राजनीतिक दबाव भी बढ़ जाता है।
होर्मुज़ संकट का सबसे तेज असर ऊर्जा बाजार पर दिखाई देता है।
जैसे ही इस मार्ग पर खतरे की खबर आती है, तेल की कीमतों में उछाल शुरू हो जाता है।
कारण साफ है। दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का इतना बड़ा हिस्सा अगर अचानक बाधित हो जाए तो बाजार में घबराहट फैलना स्वाभाविक है।
तेल की कीमतें सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहतीं।
इनका असर ट्रांसपोर्ट, बिजली उत्पादन, उद्योग और खाद्य कीमतों तक फैलता है।
यानी एक समुद्री रास्ते की असुरक्षा दुनिया भर के आम लोगों की जेब तक असर डाल सकती है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य का सबसे बड़ा प्रभाव एशियाई देशों पर पड़ता है।
कई एशियाई अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी देशों से आने वाले तेल पर काफी निर्भर हैं।
जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और भारत जैसे देशों के लिए यह रास्ता ऊर्जा आपूर्ति की मुख्य जीवनरेखा है।
अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो इन देशों को वैकल्पिक स्रोत ढूंढने पड़ सकते हैं, जो महंगे और सीमित दोनों हो सकते हैं।
यही वजह है कि इस संकट को सिर्फ क्षेत्रीय समस्या नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति अमेरिका के लिए भी चुनौती बन सकती है।
अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो अमेरिका को लगातार सैन्य संसाधन इस क्षेत्र में बनाए रखने पड़ेंगे।
इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब सीमित सैन्य हस्तक्षेप धीरे धीरे लंबी जंग में बदल गया।
युद्ध की शुरुआत अक्सर तेज और निर्णायक दिखाई देती है। लेकिन उसका अंत अक्सर अनिश्चित होता है।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि होर्मुज़ संकट को केवल सैन्य समाधान से हल करना मुश्किल हो सकता है।
कई खाड़ी देशों ने पहले ही होर्मुज़ को बाईपास करने के लिए पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किए हैं।
लेकिन इन रास्तों की क्षमता सीमित है।
अगर होर्मुज़ पूरी तरह बंद हो जाए तो ये पाइपलाइन वैश्विक तेल आपूर्ति की भरपाई नहीं कर पाएंगी।
यानी दुनिया अभी भी इस संकरे समुद्री रास्ते पर काफी हद तक निर्भर है।
यही निर्भरता इसे रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण बनाती है।
इस पूरे संकट में एक बड़ा सवाल यह भी है कि समाधान किस रास्ते से निकलेगा।
सैन्य शक्ति एक रास्ता हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान अक्सर कूटनीतिक बातचीत से ही निकलते हैं।
मिडिल ईस्ट का इतिहास बताता है कि यहां के संघर्ष सिर्फ युद्ध से खत्म नहीं होते।
इनके पीछे राजनीतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय हितों का जटिल जाल होता है।
होर्मुज़ का संकट भी उसी जटिलता का हिस्सा है।
आने वाले हफ्तों में तीन संभावित परिदृश्य सामने आ सकते हैं।
पहला, अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनता है और समुद्री मार्ग सुरक्षित किया जाता है।
दूसरा, सीमित सैन्य झड़पें जारी रहती हैं और तेल बाजार अस्थिर बना रहता है।
तीसरा, कूटनीतिक दबाव के बाद तनाव धीरे धीरे कम हो जाता है।
इन तीनों में से कौन सा रास्ता वास्तविकता बनेगा, यह आने वाले राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगा।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं है।
यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुका है।
ट्रंप की सात देशों से मदद की अपील इस बात का संकेत है कि यह संकट अब सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच का मुद्दा नहीं रहा।
अब यह पूरी दुनिया के सामने खड़ा सवाल बन चुका है।
और असली प्रश्न यही है।
क्या दुनिया इस संकट को सामूहिक सहयोग से संभालेगी, या यह एक और लंबा भू राजनीतिक संघर्ष बन जाएगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।