चमोली के मोपाटा गांव में अतिवृष्टि से भूस्खलन, दो लोग लापता और दो घायल। राहत-बचाव जारी, डीडीआरएफ और प्रशासन मौके पर तैनात।
Chamoli, (Shah Times) । चमोली जनपद का मोपाटा गांव इन दिनों दर्दनाक मंज़र का गवाह बन चुका है। गुरुवार रात्रि की भीषण अतिवृष्टि ने इस पहाड़ी इलाके की ज़िंदगी को हिला कर रख दिया। तेज़ बारिश और लगातार भूस्खलन ने एक परिवार को तबाह कर दिया। गांव के लोग कहते हैं: "पानी ने सब कुछ बहा लिया, अब बस ख़ुदा से दुआ है कि लापता लोग सही-सलामत मिल जाएं।"
इस आपदा ने न सिर्फ इंसानी ज़िंदगी बल्कि मवेशियों और ग्रामीण ढांचे को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। राहत व बचाव कार्य जारी है, लेकिन कठिनाइयाँ भी कम नहीं।
आपदा प्रबंधन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, मोपाटा में गुरुवार की रात ज़ोरदार बारिश से ज़मीन खिसकी और एक आवासीय भवन मलबे में दब गया। इस हादसे में तारा सिंह और उनकी पत्नी लापता हैं, जबकि विक्रम सिंह व उनकी पत्नी घायल हुए। प्राथमिक इलाज के बाद उन्हें नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया।



स्थानीय लोग बताते हैं कि बारिश की आवाज़ के साथ ही घर ढहने की गड़गड़ाहट सुनाई दी। पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई। ग्रामीण रातभर टॉर्च और कंदील की मदद से मलबा हटाने में लगे रहे। उनके साथ प्रशासन की टीम ने भी राहत अभियान शुरू किया।
डीडीआरएफ की टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल टीम तैनात की है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर प्राथमिक और आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
बरसात से बंद पड़ी सड़कों को खोलने का प्रयास युद्ध स्तर पर जारी है। एसडीएम पंकज कुमार भट्ट ने कहा, “हमारी पहली प्राथमिकता लापता लोगों की खोज और घायलों का इलाज है।”
उत्तराखंड की त्रासदी नई नहीं। पिछले एक दशक में केदारनाथ से लेकर चमोली तक बार-बार पहाड़ों ने तबाही का रूप दिखाया है। सवाल यह उठता है कि जब हर साल मॉनसून में यही स्थिति बनती है, तो स्थायी समाधान क्यों नहीं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अंधाधुंध सड़क चौड़ीकरण, अवैज्ञानिक निर्माण और वनों की कटाई ने पहाड़ों की प्राकृतिक क्षमता को कमज़ोर कर दिया है। नदियों के बहाव मार्ग में छेड़छाड़ और अनियोजित विकास ने आपदा के ख़तरों को और बढ़ा दिया है।
यह भी सच है कि स्थानीय प्रशासन अक्सर आपदा आने के बाद ही सक्रिय होता है। तैयारियों का अभाव और तकनीकी संसाधनों की कमी राहत कार्यों में देरी का कारण बनती है।
दूसरी ओर, कुछ लोग कहते हैं कि पहाड़ों की प्रकृति ऐसी है कि चाहे जितनी तैयारी कर ली जाए, तबाही से बचना नामुमकिन है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके नुकसान को कम नहीं कर सकते?
चमोली का मोपाटा हादसा सिर्फ एक गांव की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और प्रशासनिक उदासीनता मिलकर पहाड़ों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
आज जब तारा सिंह और उनकी पत्नी लापता हैं, जब विक्रम सिंह और उनकी पत्नी इलाज के लिए अस्पताल में हैं, तब गांव के बच्चे और बुज़ुर्ग डरे-सहमे हालात का सामना कर रहे हैं। उनकी उम्मीद सिर्फ राहत टीमों और सरकार से है।
ज़रूरत है कि इस आपदा को केवल "एक हादसा" मानकर भूल न दिया जाए। यह समय है गंभीर पुनर्विचार का — क्या पहाड़ों को बचाने की हमारी नीतियां सही दिशा में हैं? या फिर आने वाले सालों में हमें और भी बड़े हादसों का सामना करना होगा?
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।