ओवैसी ने यूपी चुनाव 2027 को आसान मुकाबला नहीं बताया। एआईएमआईएम गठबंधन की संभावनाएं तलाश रही है और अकेले चुनाव लड़ने पर 150 से 200 सीटों की तैयारी कर रही है।
📍 लखनऊ
🗓️ 22 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
यूपी चुनाव 2027 को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में एआईएमआईएम ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान मुकाबला नहीं होगा। उनके बयान के साथ ही राज्य में गठबंधन, मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संभावित सीट बंटवारे को लेकर बहस तेज हो गई है।
ओवैसी ने विपक्षी राजनीति को लेकर भी अपनी नाराज़गी जाहिर की है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विपक्षी नेता एआईएमआईएम को साथ लेने के सवाल पर गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं। दूसरी ओर, एआईएमआईएम लगातार यह संदेश दे रही है कि वह उत्तर प्रदेश में अपने संगठन का विस्तार करके चुनावी मैदान में मजबूत दावेदारी पेश करना चाहती है।
ओवैसी का बयान क्यों अहम है
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। एआईएमआईएम ने भी कई इलाकों में सार्वजनिक सभाओं के जरिए संगठन को सक्रिय करना शुरू किया है।
ओवैसी ने जून में बहराइच के मटेरा से पार्टी की चुनावी गतिविधियों को औपचारिक तौर पर आगे बढ़ाया था। इसके बाद नजीबाबाद, मुरादाबाद, सहारनपुर और कानपुर में उनकी सभाएं हुईं। आने वाले दिनों में श्रावस्ती और आजमगढ़ में भी कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
अकेले चुनाव लड़ने पर कितनी सीटें
एआईएमआईएम की ओर से उत्तर प्रदेश में 150 से 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दिया गया है। हालांकि यह संख्या अंतिम उम्मीदवार सूची या सीट बंटवारे का ऐलान नहीं है।
पार्टी की रणनीति गठबंधन की स्थिति पर भी निर्भर करेगी। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक एआईएमआईएम दूसरी राजनीतिक ताकतों के साथ संभावित तालमेल पर बातचीत कर रही है। ओवैसी ने गठबंधन के विकल्प खुले रखने की बात कही है और पार्टी स्तर पर इस दिशा में बातचीत चल रही है।
मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर ओवैसी का जोर
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपनी चुनावी रणनीति का प्रमुख मुद्दा बनाया है। उनका कहना है कि मुस्लिम मतदाताओं की संख्या और चुनावी भूमिका के बावजूद समुदाय के पास पर्याप्त स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल चुनाव में मतदान करने से किसी समुदाय की राजनीतिक हैसियत तय नहीं होती। उनके मुताबिक दूसरे सामाजिक समूह राजनीतिक दलों के साथ अपनी मांगों को लेकर सौदेबाजी करते हैं, जबकि मुस्लिम मतदाताओं को अक्सर एक निश्चित वोट आधार के तौर पर देखा जाता है। ये ओवैसी के राजनीतिक दावे हैं, जिन्हें एआईएमआईएम अपनी रणनीति के आधार के रूप में पेश कर रही है।
सपा के लिए क्या है चुनौती
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की विपक्षी राजनीति में प्रमुख ताकत है और मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से उसके चुनावी सामाजिक आधार का हिस्सा रहा है। ऐसे में एआईएमआईएम का विस्तार सपा के सामने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय संगठन से जुड़े सवाल खड़े करता है।
हालांकि इसे सीधे तौर पर किसी सीट के चुनावी नतीजे में बदलना अभी जल्दबाजी होगी। एआईएमआईएम ने 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी कोई सीट जीत नहीं सकी थी। इसलिए 2027 में अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी और वास्तविक चुनावी प्रभाव के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
भाजपा और योगी सरकार पर ओवैसी का रुख
ओवैसी ने भाजपा और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर भी कई मुद्दों को लेकर निशाना साधा है। हालिया बयानों में उन्होंने कानून व्यवस्था, बिजली और जमीन से जुड़े विवादों सहित कई मुद्दे उठाए हैं।
साथ ही ओवैसी ने यह संकेत दिया है कि यदि भाजपा को सत्ता में वापसी से रोकने के लिए समान विचारधारा वाले दलों के बीच गठबंधन की संभावना बनती है तो एआईएमआईएम उस विकल्प पर विचार करेगी। उन्होंने यह भी कहा है कि किसी एक विपक्षी दल के दम पर भाजपा का मुकाबला करना पर्याप्त नहीं होगा।
गठबंधन की राजनीति बनेगी अहम मुद्दा
2027 के चुनाव से पहले सबसे अहम सवाल यह होगा कि एआईएमआईएम अकेले मैदान में उतरती है या किसी गठबंधन का हिस्सा बनती है। पार्टी ने पहले भी बहुजन समाज पार्टी समेत दूसरी राजनीतिक ताकतों के साथ संभावित तालमेल के संकेत दिए हैं।
जून में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक एआईएमआईएम करीब 200 सीटों पर संगठनात्मक तैयारी कर रही थी और गठबंधन की स्थिति में सीटों की संख्या बदल सकती है। पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध के कुछ हिस्सों को भी संगठन विस्तार के लिहाज से अहम क्षेत्र माना है।
2022 का चुनावी रिकॉर्ड क्या बताता है
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने लगभग 95 से 97 सीटों पर चुनाव लड़ा था। पार्टी को किसी विधानसभा सीट पर जीत नहीं मिली थी और उसका राज्यव्यापी वोट शेयर लगभग आधा प्रतिशत रहा था।
यह रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 के लिए घोषित संगठनात्मक विस्तार की तुलना पिछले चुनावी प्रदर्शन से की जा सकती है। बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना अपने आप में सीट जीतने की गारंटी नहीं है। चुनावी असर उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, संगठन, गठबंधन और क्षेत्रवार वोट वितरण जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा।
बिहार चुनाव के बाद बढ़ी एआईएमआईएम की सक्रियता
एआईएमआईएम ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीती थीं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पार्टी के लिए यह प्रदर्शन एक अलग संदर्भ देता है, हालांकि दोनों राज्यों की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए बिहार के नतीजों को सीधे उत्तर प्रदेश के संभावित चुनावी परिणाम से जोड़ना उचित नहीं होगा।
अक्टूबर की शुरुआत पर नजर
उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर एआईएमआईएम की गतिविधियां आने वाले दिनों में और स्पष्ट हो सकती हैं। एनडीटीवी की 21 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार ओवैसी ने गठबंधन पर फैसला 2 अक्टूबर तक करने की बात कही है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले दिनों में सीट बंटवारे और संभावित राजनीतिक साझेदारी को लेकर बातचीत अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
जमीनी राजनीति में असली परीक्षा
एआईएमआईएम के लिए सबसे बड़ा सवाल संगठन को चुनावी वोट में बदलने का होगा। पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपना संगठन चार जोन में बांटने और क्षेत्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां तय करने की दिशा में काम किया है।
दूसरी तरफ, सपा, भाजपा, बसपा, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल भी अपने सामाजिक समीकरण और संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में केवल बयानबाजी से ज्यादा महत्वपूर्ण उम्मीदवार चयन, बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय मुद्दे और गठबंधन की अंतिम तस्वीर होगी।
क्या ओवैसी की बात को भविष्यवाणी माना जाए
ओवैसी ने 2027 के चुनाव को किसी भी दल के लिए आसान नहीं बताया है। इसे चुनावी भविष्यवाणी की बजाय उनके राजनीतिक आकलन और रणनीतिक बयान के रूप में देखना अधिक उचित है। अभी विधानसभा चुनाव में समय बाकी है और सीटों पर अंतिम उम्मीदवार, गठबंधन तथा चुनावी समीकरण तय नहीं हुए हैं।
आगे क्या होगा
एआईएमआईएम की आगामी सभाएं और संगठनात्मक गतिविधियां यह तय करेंगी कि पार्टी किन क्षेत्रों को प्राथमिकता देती है। इसके साथ ही गठबंधन पर उसका अंतिम फैसला चुनावी रणनीति की दिशा स्पष्ट करेगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल पहले से मौजूद है, लेकिन 2027 में इसका चुनावी असर किस रूप में सामने आएगा, यह अभी तय नहीं है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि एआईएमआईएम अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है और ओवैसी के लगातार यूपी दौरे ने राज्य के चुनावी विमर्श में पार्टी की भूमिका को फिर चर्चा में ला दिया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।