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Politics

यूपी चुनाव 2027 से पहले EVM पर अखिलेश-मायावती आमने-सामने एक सुर में, बैलेट पेपर की मांग से गरमाई सियासत

Mohammad Naved • 2026-09-29 12:39:37
यूपी चुनाव 2027 से पहले EVM पर अखिलेश-मायावती आमने-सामने एक सुर में, बैलेट पेपर की मांग से गरमाई सियासत

यूपी चुनाव 2027 से पहले EVM पर अखिलेश यादव और मायावती के बयानों ने चुनावी बहस तेज कर दी है। दोनों नेताओं ने बैलेट पेपर से मतदान की मांग उठाई है।

📍

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

🗓️

28 सितंबर 2026

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Mohd Naved


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले चुनावी नैरेटिव में EVM और बैलेट पेपर का मुद्दा फिर प्रमुख हो गया है। 28 सितंबर 2026 को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अलग-अलग बयानों में EVM के बजाय बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग रखी। दोनों नेताओं के बयानों में चुनावी प्रक्रिया में भरोसे और पारदर्शिता का सवाल प्रमुख रहा।

यहां एक अहम तथ्य यह है कि बैलेट पेपर की मांग राजनीतिक नेताओं का मत है। इसे EVM में गड़बड़ी साबित होने के तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। भारत निर्वाचन आयोग मौजूदा EVM-VVPAT व्यवस्था के लिए कई तकनीकी और प्रशासनिक सुरक्षा प्रक्रियाओं का उल्लेख करता है।


जरूरी तथ्य

अखिलेश यादव ने 28 सितंबर को EVM के इस्तेमाल पर अपना विरोध दोहराया। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए बैलेट पेपर व्यवस्था पर विचार होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव में उनकी पार्टी सभी सीटें जीत ले, तब भी EVM को लेकर उनका विरोध जारी रहेगा।

मायावती ने भी इसी दिन EVM को लेकर सवाल उठाए और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। उनके बयान में EVM के साथ VVPAT और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े दूसरे मुद्दे भी शामिल रहे।

मायावती ने नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की जीत को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। यह आरोप मायावती का राजनीतिक दावा है। इसे स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के तौर पर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।


मुख्य घटनाक्रम

EVM को लेकर अखिलेश यादव और मायावती के बयानों का समय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे सियासी विमर्श में जगह बना रहे हैं।

अखिलेश यादव का तर्क मुख्य रूप से चुनावी भरोसे और बैलेट पेपर व्यवस्था की वापसी से जुड़ा है। मायावती ने भी EVM के बजाय बैलेट पेपर को लेकर अपनी पुरानी मांग दोहराई है।

इससे यह जरूर स्पष्ट है कि EVM का मुद्दा दोनों दलों के राजनीतिक विमर्श में मौजूद है। लेकिन अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसे किसी औपचारिक चुनावी गठजोड़ या संयुक्त आंदोलन की घोषणा कहना जल्दबाजी होगी।


अखिलेश यादव का पक्ष

अखिलेश यादव ने EVM के बजाय बैलेट पेपर को लेकर अपनी आपत्ति दोहराई। उन्होंने अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों का उदाहरण देते हुए चुनाव में तकनीक के इस्तेमाल पर सवाल उठाया।

उनका तर्क चुनावी प्रणाली में सार्वजनिक भरोसे से जुड़ा है। अखिलेश के बयान का राजनीतिक संदेश यह है कि EVM को लेकर उनकी पार्टी की आपत्ति चुनावी नतीजे से अलग है।

हालांकि किसी नेता के बयान और चुनावी व्यवस्था की तकनीकी स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है। EVM की विश्वसनीयता पर राजनीतिक सवाल उठना अपने आप में किसी मशीन में छेड़छाड़ का प्रमाण नहीं है।


मायावती का पक्ष

मायावती ने भी EVM व्यवस्था को लेकर अपनी असहमति जाहिर की। उन्होंने बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग की और VVPAT व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए।

मायावती ने चंद्रशेखर आजाद की नगीना से जीत को लेकर भाजपा पर आरोप लगाया। यह एक राजनीतिक आरोप है और इसके समर्थन में कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण इस रिपोर्ट में स्थापित नहीं किया जा रहा है। इसलिए इसे आरोप के रूप में ही समझना जरूरी है।


EVM और VVPAT व्यवस्था क्या कहती है

भारत निर्वाचन आयोग के आधिकारिक विवरण के अनुसार EVM व्यवस्था में कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और VVPAT शामिल होते हैं। मतदाता द्वारा वोट डालने के बाद VVPAT में संबंधित उम्मीदवार का क्रमांक, नाम और चुनाव चिह्न वाली पर्ची लगभग 7 सेकंड तक दिखाई देती है। इसके बाद पर्ची सीलबंद बॉक्स में चली जाती है।

निर्वाचन आयोग के अनुसार EVM और VVPAT को चुनाव से पहले कई स्तरों पर जांचा जाता है। मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में First Level Checking और दूसरे प्रक्रियात्मक चरण किए जाते हैं। EVM और VVPAT की Randomization प्रक्रिया भी अपनाई जाती है।

आयोग के मुताबिक EVM को स्ट्रॉन्ग रूम में रखने, सील करने, सुरक्षा व्यवस्था और उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की निगरानी से जुड़े प्रोटोकॉल निर्धारित हैं। पोलिंग के दौरान Mock Poll भी कराया जाता है।


VVPAT को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य

VVPAT का उद्देश्य मतदाता को यह देखने का अवसर देना है कि उसका वोट किस उम्मीदवार के पक्ष में दर्ज हुआ। आधिकारिक जानकारी के अनुसार पर्ची कुछ समय के लिए पारदर्शी विंडो के भीतर दिखाई देती है और फिर सीलबंद ड्रॉप बॉक्स में चली जाती है।

निर्वाचन आयोग के FAQ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र या लोकसभा चुनाव के संबंधित विधानसभा खंड में 5 यादृच्छिक मतदान केंद्रों की VVPAT पर्चियों का सत्यापन किया जाता है।

इसलिए EVM पर राजनीतिक बहस और मौजूदा चुनावी प्रक्रिया में मौजूद तकनीकी सत्यापन तंत्र, दोनों को एक साथ समझना जरूरी है।


बैलेट पेपर बनाम EVM, असली बहस क्या है

बैलेट पेपर व्यवस्था में मतदाता कागज पर निर्धारित तरीके से अपनी पसंद दर्ज करता है। इसके बाद मतपत्र मतपेटी में डाला जाता है और मतगणना के दौरान वैध मतपत्रों की गणना होती है।

निर्वाचन आयोग के अनुसार बैलेट पेपर व्यवस्था में गलत निशान, स्याही फैलने या निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मतदान न होने की वजह से अमान्य मतों की समस्या हो सकती है। आयोग मैनुअल काउंटिंग में समय और मानवीय त्रुटि से जुड़े जोखिमों का भी उल्लेख करता है।

EVM व्यवस्था का मुख्य तर्क तेज मतगणना और अमान्य वोट की संभावना को कम करना है। इसके साथ VVPAT को मतदाता सत्यापन की एक कड़ी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

इसलिए मौजूदा विवाद केवल मशीन बनाम कागज का सवाल नहीं है। इसका बड़ा पहलू चुनावी प्रक्रिया में सार्वजनिक विश्वास, सत्यापन, निगरानी और संस्थागत पारदर्शिता है।


राजनीतिक संदर्भ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव बड़ा राजनीतिक मुकाबला होगा। ऐसे माहौल में चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा कोई भी मुद्दा सीधे राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनता है।

अखिलेश यादव और मायावती का EVM पर एक जैसी मांग उठाना एक राजनीतिक समानता जरूर दिखाता है। लेकिन इससे दोनों दलों के बीच औपचारिक चुनावी गठबंधन, सीट समझौते या साझा चुनावी रणनीति की पुष्टि नहीं होती।

इसी तरह EVM पर दोनों नेताओं की आपत्ति को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या भारतीय जनता पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति पर सीधा प्रभाव डालने वाला तथ्य मानना अभी विश्लेषण का विषय है, स्थापित तथ्य नहीं।


CM योगी के लिए मुद्दा क्या है

EVM को लेकर विपक्षी नेताओं के बयान का राजनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह मुद्दा मतदाताओं के बीच किस स्तर तक स्वीकार्यता हासिल करता है। अभी यह कहना संभव नहीं है कि इससे किसी दल को चुनावी लाभ या नुकसान होगा।

सरकार और निर्वाचन व्यवस्था के सामने चुनौती यह होगी कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर स्पष्ट और तथ्य आधारित जानकारी मतदाताओं तक पहुंचे।

दूसरी तरफ विपक्षी दलों के सामने भी अपने आरोपों और मांगों को प्रमाण, दस्तावेज और स्पष्ट प्रस्ताव के साथ रखने की चुनौती है। केवल राजनीतिक आरोप चुनावी प्रक्रिया से जुड़े तकनीकी सवालों का अंतिम जवाब नहीं देते।


महत्वपूर्ण तारीख

28 सितंबर 2026 को अखिलेश यादव और मायावती के EVM संबंधी बयान सामने आए। इसी तारीख को मायावती ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग दोहराई।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी भविष्य की चुनावी प्रक्रिया है। चुनाव कार्यक्रम और मतदान की अंतिम तारीख से जुड़े आधिकारिक निर्णय संबंधित संवैधानिक चुनावी प्राधिकरण द्वारा घोषित किए जाएंगे।


आगे क्या होगा

आने वाले महीनों में EVM, VVPAT, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विमर्श में बने रह सकते हैं।

अगर विपक्षी दल इस मुद्दे पर साझा रुख बनाते हैं, तो उनके प्रस्ताव का स्वरूप अधिक स्पष्ट होगा। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की तरफ से EVM और VVPAT की प्रक्रिया, सुरक्षा प्रोटोकॉल और सत्यापन व्यवस्था से जुड़ी जानकारी राजनीतिक बहस का अहम हिस्सा रहेगी।

मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण यह है कि राजनीतिक आरोप, तकनीकी तथ्य और आधिकारिक चुनावी प्रक्रिया को अलग-अलग समझा जाए।



उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज हुई है। अखिलेश यादव और मायावती ने बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग रखी है। यह दोनों नेताओं का राजनीतिक रुख है।

दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग मौजूदा EVM-VVPAT प्रणाली में कई स्तर की जांच, Randomization, Mock Poll, स्ट्रॉन्ग रूम सुरक्षा और VVPAT सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं का उल्लेख करता है।

इसलिए यूपी चुनाव 2027 की इस बहस का वास्तविक केंद्र केवल EVM या बैलेट पेपर नहीं रहेगा। असली सवाल चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, सत्यापन और मतदाताओं के भरोसे का होगा। आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम यह तय करेंगे कि यह मुद्दा केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या चुनावी एजेंडा का स्थायी हिस्सा बनता है।

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Mohammad Naved

Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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