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नेमप्लेट विवाद पर यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

None 2024-07-26 12:24:41
नेमप्लेट विवाद पर यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब
सुप्रीम कोर्ट को नेम प्लेट विवाद पर जवाब देते हुए यूपी सरकार ने कहा, यह आदेश इसीलिए लागू किया गया था जिससे गलती से भी कांवड़िए किसी दुकान से कुछ ऐसा न खा लें जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो।

लखनऊ, (Shah Times) । सुप्रीम कोर्ट को नेम प्लेट विवाद पर जवाब देते हुए यूपी सरकार ने कहा, यह आदेश इसीलिए लागू किया गया था जिससे गलती से भी कांवड़िए किसी दुकान से कुछ ऐसा न खा लें जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो।

देश में कांवड़ यात्रा जारी है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांवड़ रूट पर मौजूद दुकानों, होटल में मालिक के नाम की नेम प्लेट लगाने को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। यह मामला मुजफ्फरनगर से शुरू हुआ था जिसके बाद योगी सरकार के आदेश देने के बाद यह पूरे प्रदेश में लागू हो गया था। इस आदेश के खिलाफ एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स नामक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर 22 जुलाई को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से शुक्रवार (26 जुलाई) तक जवाब मांगा था और राज्यों के जवाब देने तक इस आदेश पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद इस मामले में अगली सुनवाई आज 26 जुलाई को होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने नेम प्लेट विवाद पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था और इस पर शुक्रवार यानी 26 जुलाई तक जवाब देने को कहा था। जिस पर जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा, यह फैसला सौहार्द और शांति बनाए रखने के लिए लिया गया था। सरकार ने कोर्ट को बताया, कांवड़ रूट पर खाने-पीने की दुकानों पर नेम प्लेट लगाने का यह निर्देश यह सुनिश्चित करने के लिए जारी किया गया था कि गलती से भी कांवड़ियों की धार्मिक भावनाएं आहत न हो और शांति बनी रहे।

मुजफ्फरनगर का जिक्र करते हुए, सरकार ने कोर्ट को दिए जवाब में कहा, मुजफ्फरनगर जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में पहली भी इस तरह की घटनाएं सामने आई है जहां खाने को लेकर भ्रम पैदा हुआ जिससे गलतफहमियों के कारण तनाव और गड़बड़ी हुई, ऐसे हालात फिर से पैदा न हो इसीलिए नेमप्लेट आदेश दिया गया था।

याचिका खारिज करने की अपील की गई

यूपी सरकार ने नेम प्लेट आदेश के खिलाफ दायर याचिका का विरोध किया और अदालत से याचिकाओं को खारिज करने की अपील की। सरकार ने कहा, याचिका में लगाए गए आरोप सही नहीं है और तथ्य भी स्वीकार योग्य नहीं है। इन याचिकाओं को अदालत को खारिज करना चाहिए, क्योंकि यह राज्य की जिम्मेदारी का मामला है और कानून व्यवस्था को कायम रखने के लिए सरकार ने आदेश जारी किया था।

शीर्ष अधिकारियों की बैठक के बाद लिया था फैसला

यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा की संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन कावड़ यात्रा के दौरान खान- पान की उचित व्यवस्था और दुकानदारों के नाम को प्रदर्शित करने से नहीं होता। साथ ही यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया कि, अदालत इस मामले में उचित आदेश जारी करें। यूपी सरकार ने कहा कि नेम प्लेट आदेश कावड़ यात्रा के दौरान सही व्यवस्थाओं के मद्देनजर जारी किया गया था। साथ ही उन्होंने कहा, यह आदेश अचानक नहीं लिया गया था बल्कि इसके पहले शीर्ष अधिकारियों की बैठक हुई और निर्धारित कानून के तहत इसे लागू करने का निर्णय लिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने नेम प्लेट आदेश पर लगाई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने नेम प्लेट आदेश पर सुनवाई करते हुए अपने अंतरिम आदेश में अगली सुनवाई तक नेम प्लेट पर रोक लगा दी थी। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि दुकानदारों को पहचान बताने की जरूरत नहीं होगी। सिर्फ खाने के प्रकार बताने होंगे। कांवड़ियों को वेज खाना मिले और साफ सफाई रहे। हालांकि, खाना शाकाहारी है या मांसाहारी ये बताना जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई आज यानी 26 जुलाई को होगी।

समाचार विस्तार से

सुप्रीम कोर्ट से उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि श्रावण महीने में 'यात्रा' करने वाले कांवड़ियों की सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और सूचित विकल्प सुनिश्चित करने के लिए सभी खाद्य विक्रेता मालिकों और कर्मचारियों की पहचान प्रदर्शित करने के निर्देश दिए गए थे।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स और अन्य द्वारा दायर याचिका पर शीर्ष अदालत की ओर से 22 जुलाई को जारी नोटिस पर राज्य सरकार ने यह जवाब दाखिल किया है।
शीर्ष अदालत ने याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई की थी और उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकारों के कांवड़ यात्रियों के मार्ग में पड़ने वाले होटल, दुकानों, भोजनालयों और ढाबों के मालिकों के नाम प्रदर्शित करने के विवादास्पद निर्देशों को लागू करने पर रोक लगा दी थी।
याचिका में मुजफ्फरनगर के एसएसपी की ओर से विक्रेता मालिकों और कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने के लिए 17 जुलाई को जारी निर्देश को भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 19(1)(जी) और 21 का उल्लंघन बताया गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने जवाब में आगे कहा कि यह निर्देश (नाम प्रदर्शित करने का) सीमित भौगोलिक सीमा के लिए अस्थायी प्रकृति का था। यह आदेश गैर-भेदभावपूर्ण और उन 'कांवड़ियों' की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दिया गया, जो केवल 'सात्विक' खाद्य पदार्थ पसंद करते हैं और गलती से भी अपनी मान्यताओं के खिलाफ नहीं जाते।
राज्य सरकार ने कहा, “अनजाने में किसी ऐसे स्थान पर अपनी पसंद से अलग भोजन करने की दुर्घटना कांवड़ियों के लिए पूरी यात्रा के साथ ही क्षेत्र में शांति और सौहार्द को बिगाड़ सकती है, जिसे बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है।”
सरकार ने कहा कि यह उपाय एक सक्रिय कदम है, क्योंकि अतीत में बेचे जा रहे भोजन के प्रकार के बारे में गलतफहमियों के कारण तनाव, अशांति और सांप्रदायिक दंगे भड़के थे।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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