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UP Chunav 2027: ‘जय श्री राम’ के मुकाबले ‘हर हर महादेव’? रेवंत रेड्डी के बयान से कांग्रेस की रणनीति पर बहस
Wasi Siddiqui
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2026-09-30 16:30:11
रेवंत रेड्डी ने ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ के संदर्भ में उत्तर-दक्षिण की राजनीति पर टिप्पणी की। कांग्रेस ने बयान का बचाव किया, BJP ने इसे धार्मिक विभाजन बताया।
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नई दिल्ली / उत्तर प्रदेश
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30 सितंबर 2026
✍️Wasi Siddiqi
यूपी चुनाव 2027 से पहले क्यों चर्चा में आया ‘हर हर महादेव’
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी सामने हैं, लेकिन सियासी नैरेटिव की तैयारी पहले से शुरू हो चुकी है। इसी बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी का राम और शिव को लेकर दिया गया बयान राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस का विषय बन गया है।
नई दिल्ली में 28 सितंबर को एक कार्यक्रम के दौरान रेवंत रेड्डी ने कांग्रेस की दक्षिण भारत में मौजूदगी और उत्तर भारत में उसकी कमजोर चुनावी स्थिति पर बात करते हुए भगवान राम और भगवान शिव का राजनीतिक संदर्भ में उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में लोग शिव के भक्त हैं, जबकि उत्तर भारत के लोग राम से जुड़े हैं। उन्होंने खुद को द्रविड़ और उत्तर भारत को आर्य परंपरा से जोड़ते हुए यह भी कहा कि BJP ने भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक के रूप में अपने साथ जोड़ लिया है।
सबसे ज्यादा विवाद उनके इस कथन पर हुआ कि शिव गरीबों के देवता हैं, जबकि राम अमीरों के देवता हैं और BJP अमीरों की पार्टी है। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि BJP नेता मंच से ‘हर हर महादेव’ क्यों नहीं कहते और ‘जय श्री राम’ का इस्तेमाल अधिक क्यों होता है।
यहीं से सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी BJP की सियासी भाषा का जवाब उसी सांस्कृतिक स्पेस में देने की कोशिश कर रही है।
रेवंत रेड्डी ने वास्तव में क्या कहा
रेवंत रेड्डी से कांग्रेस की उत्तर भारत में कमजोर चुनावी स्थिति के बारे में सवाल पूछा गया था। उनके जवाब का फोकस केवल धार्मिक आस्था नहीं था, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान पर भी था।
उन्होंने ‘जय श्री राम’ के मुकाबले ‘हर हर महादेव’ का उल्लेख किया और दावा किया कि BJP ने भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है। उन्होंने अपने तर्क को उत्तर-दक्षिण तथा आर्य-द्रविड़ पहचान के संदर्भ से भी जोड़ा।
यह बयान किसी औपचारिक कांग्रेस चुनावी दस्तावेज या उत्तर प्रदेश के लिए घोषित अभियान के रूप में सामने नहीं आया है। इसलिए इसे सीधे कांग्रेस की यूपी चुनाव रणनीति घोषित करना अभी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक संदेश के स्तर पर इसकी अहमियत अलग है।
क्या यह कांग्रेस का ‘हर हर महादेव कार्ड’ है?
यहां तथ्य और राजनीतिक विश्लेषण को अलग रखना जरूरी है।
अब तक उपलब्ध जानकारी में कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा नहीं की है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में ‘हर हर महादेव’ को ‘जय श्री राम’ के मुकाबले चुनावी अभियान का केंद्रीय नारा बनाया जाएगा।
इसलिए इसे फिलहाल कांग्रेस का घोषित ‘कार्ड’ कहना जल्दबाजी होगी।
लेकिन रेवंत रेड्डी का बयान यह जरूर दिखाता है कि कांग्रेस के भीतर BJP की धार्मिक राजनीति का जवाब देने को लेकर एक अलग राजनीतिक नैरेटिव मौजूद है। तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष बी. महेश कुमार गौड़ ने भी रेवंत रेड्डी का बचाव किया और कहा कि कांग्रेस दोनों देवताओं का सम्मान करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP भगवान राम को चुनावी राजनीति से जोड़ रही है।
गौड़ ने रेवंत रेड्डी की बात को धार्मिक तुलना के बजाय दोनों देवताओं की पारंपरिक दृश्य छवियों से जोड़कर समझाया। उनके अनुसार राम को आभूषणों और राजसी परिधान में तथा शिव को साधारण और तपस्वी रूप में चित्रित किया जाता है।
इस स्पष्टीकरण से कांग्रेस ने विवाद को धार्मिक आस्था से हटाकर राजनीतिक प्रतीकों और चुनावी इस्तेमाल की बहस में रखने की कोशिश की है।
BJP का पलटवार क्या है
BJP ने रेवंत रेड्डी की टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया।
केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने आरोप लगाया कि रेवंत रेड्डी भगवान राम और भगवान शिव के बीच राजनीतिक विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। BJP नेताओं ने यह भी कहा कि राम और शिव को उत्तर और दक्षिण या अमीर और गरीब के आधार पर बांटना धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
BJP का राजनीतिक तर्क यह है कि धार्मिक आस्था को इस तरह वर्गीकृत करना सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है। पार्टी नेताओं ने रेवंत रेड्डी से बयान पर माफी की मांग भी की है।
इस तरह विवाद दो अलग नैरेटिव में बंट गया है। कांग्रेस इसे धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल की आलोचना बता रही है, जबकि BJP इसे राम और शिव के बीच राजनीतिक विभाजन की कोशिश के रूप में देख रही है।
यूपी की राजनीति में इसका महत्व क्यों है
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। अयोध्या और राम मंदिर से जुड़ा विमर्श पिछले वर्षों में BJP की राजनीतिक भाषा का प्रमुख हिस्सा रहा है।
ऐसे माहौल में अगर विपक्ष उसी धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श के भीतर दूसरा प्रतीक सामने रखता है, तो राजनीतिक मुकाबला केवल विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था या सामाजिक कल्याण तक सीमित नहीं रहता।
यहां ‘हर हर महादेव’ का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि काशी और भगवान शिव उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजनीति में पहले से मजबूत प्रतीक हैं।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यूपी का मतदाता किसी एक धार्मिक नारे के आधार पर अपना फैसला करेगा। चुनावी व्यवहार कई मुद्दों, स्थानीय समीकरणों, उम्मीदवारों, संगठन, सरकार के प्रदर्शन और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
कांग्रेस के सामने असली चुनौती क्या है
कांग्रेस के लिए सवाल केवल BJP के धार्मिक नैरेटिव का जवाब देना नहीं है।
बड़ी चुनौती यह है कि वह उत्तर प्रदेश में अपने संगठन और राजनीतिक आधार को किस तरह मजबूत करती है।
धार्मिक प्रतीकों पर बयान राष्ट्रीय सुर्खियां बना सकते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव का मैदान बूथ स्तर के संगठन, उम्मीदवार चयन, गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और मतदाता संपर्क से भी तय होता है।
इसलिए रेवंत रेड्डी का बयान कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश जरूर बन सकता है, लेकिन इसे यूपी में प्रभावी चुनावी रणनीति साबित करने के लिए संगठनात्मक स्तर पर ठोस कदमों की जरूरत होगी।
‘राम बनाम शिव’ का फ्रेम कितना टिकाऊ है
रेवंत रेड्डी की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उत्तर-दक्षिण और आर्य-द्रविड़ पहचान का संदर्भ है।
यहीं इस बयान की सबसे विवादित परत सामने आती है।
भारत में भगवान राम और भगवान शिव दोनों की व्यापक धार्मिक उपासना होती है। इसलिए दोनों को केवल उत्तर और दक्षिण की अलग-अलग धार्मिक पहचान के रूप में पेश करना एक राजनीतिक व्याख्या है, कोई स्थापित राष्ट्रीय धार्मिक तथ्य नहीं।
इसी वजह से BJP ने इस हिस्से को भी निशाना बनाया है। दूसरी तरफ कांग्रेस इसे सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीकों की बहस के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
यानी विवाद केवल ‘जय श्री राम’ बनाम ‘हर हर महादेव’ तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति में धर्म, क्षेत्रीय पहचान और चुनावी संदेशों के इस्तेमाल का बड़ा सवाल जुड़ा है।
क्या कांग्रेस BJP की भाषा में जवाब दे रही है?
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इसे दो तरह से देखा जा सकता है।
पहला नजरिया यह है कि कांग्रेस BJP के मजबूत धार्मिक नैरेटिव को सीधे चुनौती देने के लिए समान सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करना चाहती है।
दूसरा नजरिया यह है कि कांग्रेस BJP के धार्मिक विमर्श को स्वीकार करने के बजाय यह बताना चाहती है कि धार्मिक प्रतीक किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं।
कांग्रेस की सार्वजनिक प्रतिक्रिया फिलहाल दूसरे तर्क के करीब दिखाई देती है। महेश कुमार गौड़ ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस दोनों देवताओं की पूजा करती है और उनकी टिप्पणी का निशाना धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति में भगवान राम के इस्तेमाल को बताया।
लेकिन रेवंत रेड्डी के मूल बयान में राजनीतिक भाषा इतनी सीधी थी कि BJP को पलटवार का अवसर मिला।
BJP के लिए भी यह मुद्दा क्यों अहम है
BJP की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि पार्टी इस मुद्दे को केवल एक स्थानीय बयान के रूप में नहीं देख रही।
राम से जुड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श BJP की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में कांग्रेस के किसी बड़े नेता द्वारा यह कहना कि BJP ने राम को राजनीतिक प्रतीक बना लिया है, सीधे उसी नैरेटिव को चुनौती देता है।
इसलिए BJP की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित रूप से राजनीतिक है। पार्टी इसे कांग्रेस की धार्मिक और क्षेत्रीय विभाजन की कोशिश के रूप में पेश कर रही है।
क्या यह 2027 में बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा?
अभी इस पर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
30 सितंबर 2026 तक उपलब्ध घटनाक्रम में यह मामला मुख्य रूप से बयान और उसके बाद की राजनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित है। उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 का व्यापक अभियान अभी इस एक मुद्दे पर निर्धारित नहीं हुआ है।
आने वाले महीनों में तीन बातें महत्वपूर्ण रहेंगी।
पहली, क्या कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता भी ‘हर हर महादेव’ या इसी तरह के धार्मिक-सांस्कृतिक नैरेटिव को दोहराते हैं।
दूसरी, क्या उत्तर प्रदेश कांग्रेस इसे अपने प्रदेश स्तरीय राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाती है।
तीसरी, क्या BJP इसे व्यापक कांग्रेस-विरोधी अभियान में शामिल करती है।
इन तीनों घटनाक्रमों से पता चलेगा कि यह विवाद एक दिन की राजनीतिक बयानबाजी रहता है या चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनता है।
अयोध्या से काशी तक राजनीतिक विमर्श
उत्तर प्रदेश में राम और शिव दोनों की धार्मिक-सांस्कृतिक उपस्थिति गहरी है।
अयोध्या राम से जुड़ी प्रमुख धार्मिक पहचान है, जबकि वाराणसी शिव की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसलिए ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ को चुनावी भाषा में आमने-सामने रखने का प्रयास उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजनीति में आसानी से जगह बना सकता है।
लेकिन धार्मिक प्रतीक और चुनावी प्राथमिकता एक ही चीज नहीं हैं।
किसी राजनीतिक दल के लिए चुनौती यह होगी कि वह धार्मिक पहचान के साथ रोजगार, महंगाई, कृषि, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों को भी स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा दे।
जनता के लिए असली सवाल
इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राम और शिव को लेकर राजनीतिक बयान को धार्मिक सत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
‘राम अमीरों के’ और ‘शिव गरीबों के’ जैसी पंक्तियां रेवंत रेड्डी की राजनीतिक व्याख्या हैं। इन्हें किसी स्थापित धार्मिक सिद्धांत या सार्वभौमिक सामाजिक तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
इसी तरह BJP का यह आरोप कि कांग्रेस धार्मिक विभाजन कर रही है, एक राजनीतिक आरोप है। इसका मूल्यांकन जनता और राजनीतिक विमर्श में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
आगे क्या?
यूपी चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक दल अपने-अपने नैरेटिव तैयार करेंगे। BJP के सामने अपने मौजूदा राजनीतिक आधार को बनाए रखने की चुनौती होगी। कांग्रेस के सामने उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और अपने संदेश को मतदाताओं तक पहुंचाने की चुनौती रहेगी।
रेवंत रेड्डी का बयान इस बड़ी लड़ाई की एक झलक जरूर देता है, लेकिन इसे अभी कांग्रेस की अंतिम यूपी चुनाव रणनीति मानना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ‘जय श्री राम’ के राजनीतिक इस्तेमाल पर कांग्रेस की आपत्ति अब ‘हर हर महादेव’ के संदर्भ के साथ सार्वजनिक बहस में आ गई है। इसके जवाब में BJP ने इसे धार्मिक विभाजन का मुद्दा बनाया है।
आने वाले महीनों में असली तस्वीर इस बात से बनेगी कि यह बयान राजनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित रहता है या उत्तर प्रदेश के चुनावी नैरेटिव में स्थायी जगह बनाता है।
रेवंत रेड्डी का बयान 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव की घोषित रणनीति नहीं है। लेकिन इसने कांग्रेस और BJP के बीच धार्मिक प्रतीकों की राजनीतिक व्याख्या को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।
कांग्रेस का पक्ष है कि धार्मिक प्रतीकों को किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं बनाया जाना चाहिए। BJP का आरोप है कि कांग्रेस राम और शिव को राजनीतिक रूप से अलग करके धार्मिक विभाजन की कोशिश कर रही है।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम तथ्य यही है कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक फ्रेम के साथ सामने हैं। यूपी चुनाव 2027 में इसका वास्तविक असर तभी समझ आएगा जब पार्टियां इसे अपने औपचारिक अभियान, भाषणों और जमीनी संगठन में लगातार इस्तेमाल करें।
Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।