उत्तराखंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने 2026 के दसवीं और बारहवीं परीक्षा परिणाम जारी कर दिए हैं। हाईस्कूल में 92.10 प्रतिशत और इंटरमीडिएट में 85.11 प्रतिशत विद्यार्थी सफल हुए हैं। रामनगर के अक्षत गोयल ने दसवीं में टॉप किया, जबकि बारहवीं में बागेश्वर की गीतिका पंत और ऊधमसिंह नगर की सुशीला मेहंदीरत्ता संयुक्त टॉपर रहीं। लेकिन इन नतीजों के पीछे एक बड़ा सवाल भी खड़ा है, क्या बढ़ते पास प्रतिशत का मतलब शिक्षा की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार है या सिस्टम अभी भी गहरे इम्तिहान से गुजर रहा है।
📍Dehradun 🗓️ 25 April 2026✍️Asif Khan
नतीजों की खुशी और घरों में जश्न का माहौल
शनिवार की सुबह उत्तराखंड के हजारों घरों में बेचैनी थी। मोबाइल स्क्रीन बार-बार रिफ्रेश हो रही थीं, वेबसाइट खुलने का इंतज़ार था और परिवारों की निगाहें बच्चों के चेहरों पर टिकी थीं। जैसे ही उत्तराखंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने नतीजे जारी किए, कई घरों में खुशियां पहुंचीं।
दसवीं में 92.10 प्रतिशत और बारहवीं में 85.11 प्रतिशत पास प्रतिशत पहली नजर में मजबूत तस्वीर पेश करता है। यह आंकड़ा बताता है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने परीक्षा में सफलता हासिल की है। रामनगर के एमपी इंटर कॉलेज के छात्र अक्षत गोयल ने 500 में 491 अंक हासिल कर हाईस्कूल में पहला स्थान प्राप्त किया। वहीं इंटरमीडिएट में बागेश्वर की गीतिका पंत और ऊधमसिंह नगर की सुशीला मेहंदीरत्ता ने 490 अंक हासिल कर संयुक्त रूप से टॉप किया।
इन नामों के पीछे सिर्फ अंक नहीं हैं। इनके पीछे छोटे शहरों की मेहनत, सीमित संसाधनों में पढ़ाई और परिवारों की उम्मीदें हैं।
बेटियों का प्रदर्शन फिर चर्चा में क्यों
बारहवीं के नतीजों में लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर रहा। लड़कियों का पास प्रतिशत 88.09 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह ट्रेंड नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई बोर्ड रिजल्ट्स में छात्राओं ने लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है।
इसका एक पहलू बेहद सकारात्मक है। इसका मतलब है कि परिवारों में बेटियों की शिक्षा को लेकर सोच बदल रही है। ग्रामीण इलाकों में भी अब माता-पिता लड़कियों की पढ़ाई को गंभीरता से लेने लगे हैं।
लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है। क्या बेहतर अंक हासिल करने वाली इन छात्राओं को आगे कॉलेज, स्कॉलरशिप और रोजगार के समान अवसर मिलेंगे। पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई छात्राओं की पढ़ाई बारहवीं के बाद रुक जाती है क्योंकि उच्च शिक्षा संस्थान दूर हैं, ट्रांसपोर्ट सीमित है और सामाजिक दबाव अलग चुनौती बनकर खड़ा होता है।
पास प्रतिशत बढ़ा, लेकिन क्या पढ़ाई बेहतर हुई
यही सबसे बड़ा सवाल है।
हर साल रिजल्ट के दिन सरकारें और शिक्षा विभाग अच्छे आंकड़े सामने रखते हैं। पास प्रतिशत बढ़ना निश्चित रूप से राहत की खबर है। लेकिन क्या यह शिक्षा सुधार का अंतिम पैमाना है।
अगर किसी राज्य में बड़ी संख्या में छात्र पास हो रहे हैं लेकिन उनमें बेसिक गणित, भाषा समझ और रोजगार आधारित कौशल की कमी है, तो सिर्फ प्रतिशत से तस्वीर पूरी नहीं होती।
देशभर में कई सर्वे लगातार बताते रहे हैं कि बड़ी संख्या में छात्र अपनी कक्षा के स्तर की पढ़ाई ठीक तरह से नहीं कर पा रहे। कई बच्चे बारहवीं पास करने के बाद भी प्रतियोगी परीक्षाओं में संघर्ष करते हैं।
यह समस्या सिर्फ उत्तराखंड की नहीं है। यह राष्ट्रीय शिक्षा ढांचे की चुनौती है।
पहाड़ी राज्य की अलग चुनौती
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति शिक्षा व्यवस्था को बाकी राज्यों से अलग बनाती है।
दूर-दराज के पहाड़ी गांवों में स्कूल पहुंचना आसान नहीं होता। कई छात्र रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं। मौसम भी पढ़ाई को प्रभावित करता है। भारी बारिश, बर्फबारी और सड़क बाधित होने जैसी समस्याएं लगातार सामने आती हैं।
डिजिटल एजुकेशन की बात खूब होती है, लेकिन कई इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी कमजोर है। ऑनलाइन क्लास का मॉडल वहां पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।
ऐसे में अच्छा रिजल्ट उन छात्रों और शिक्षकों की मेहनत का भी संकेत है जिन्होंने मुश्किल हालात में काम किया।
उत्तराखंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने वर्ष 2026 की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं के नतीजे आधिकारिक तौर पर जारी कर दिए हैं, जिसके बाद राज्यभर के लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों का इंतजार खत्म हो गया। इस वर्ष हाईस्कूल यानी 10वीं कक्षा में कुल 92.10 प्रतिशत विद्यार्थियों ने सफलता हासिल की, जबकि इंटरमीडिएट यानी 12वीं कक्षा का कुल पास प्रतिशत 85.11 प्रतिशत दर्ज किया गया। परिणाम जारी होने के साथ बोर्ड ने मेरिट लिस्ट भी सार्वजनिक की, जिसमें कई छात्रों ने शानदार प्रदर्शन कर अपने स्कूलों और जिलों का नाम रोशन किया। हाईस्कूल परीक्षा में रामनगर के एमपी इंटर कॉलेज के छात्र अक्षत गोयल ने 500 में से 491 अंक प्राप्त कर पूरे राज्य में पहला स्थान हासिल किया। वहीं इंटरमीडिएट परीक्षा में बागेश्वर की गीतिका पंत और ऊधमसिंह नगर की सुशीला मेहंदीरत्ता ने 490-490 अंक हासिल कर संयुक्त रूप से टॉप किया। इस बार भी छात्राओं का प्रदर्शन चर्चा में रहा, क्योंकि 12वीं परीक्षा में लड़कियों का पास प्रतिशत 88.09 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो लड़कों से बेहतर रहा। रिजल्ट जारी होते ही कई स्कूलों में जश्न का माहौल देखा गया, जबकि छात्र अपने भविष्य की अगली तैयारी में जुट गए हैं।
बोर्ड ने विद्यार्थियों की सुविधा के लिए रिजल्ट ऑनलाइन उपलब्ध कराया है। छात्र अपना परिणाम उत्तराखंड बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट ubse.uk.gov.in और uaresults.nic.in पर जाकर देख सकते हैं। रिजल्ट चेक करने के लिए छात्रों को सबसे पहले वेबसाइट के होमपेज पर जाना होगा, जहां बोर्ड एग्जाम रिजल्ट लिंक दिखाई देगा। इसके बाद उन्हें 10वीं या 12वीं में से अपने संबंधित परीक्षा परिणाम के लिंक पर क्लिक करना होगा। अगली स्क्रीन पर रोल नंबर और कैप्चा कोड भरने के बाद गेट रिजल्ट विकल्प पर क्लिक करते ही उनका स्कोरकार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा। छात्र चाहें तो भविष्य के लिए इसका प्रिंटआउट या डाउनलोड कॉपी भी सुरक्षित रख सकते हैं। रिजल्ट के बाद अब छात्रों की नजर कॉलेज एडमिशन, करियर विकल्प और आगे की पढ़ाई पर टिकी हुई है।
क्या बोर्ड परीक्षा अभी भी भविष्य तय करती है
भारतीय समाज में बोर्ड परीक्षा को अक्सर जिंदगी बदल देने वाली परीक्षा मान लिया जाता है।
रिजल्ट आने के बाद सोशल मीडिया पर टॉपर्स की कहानियां वायरल होती हैं। कम अंक लाने वाले छात्र मानसिक दबाव में चले जाते हैं। कई परिवार बच्चों की तुलना रिश्तेदारों या पड़ोसियों से करने लगते हैं।
यह सोच खतरनाक है।
दसवीं और बारहवीं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यही जीवन का अंतिम फैसला नहीं हैं। बड़ी कंपनियों के कई सफल प्रोफेशनल, उद्यमी और क्रिएटर्स ऐसे रहे हैं जिनके बोर्ड स्कोर असाधारण नहीं थे।
एक छात्र जिसने 75 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं, वह भी आगे शानदार करियर बना सकता है। असली सवाल स्किल, दिशा और निरंतर मेहनत का है।
कोचिंग मॉडल बनाम स्कूल शिक्षा
एक और बड़ी बहस यह है कि क्या स्कूल शिक्षा कमजोर हो रही है और कोचिंग इंडस्ट्री मजबूत।
कई छात्र बोर्ड परीक्षा की तैयारी स्कूल से ज्यादा निजी कोचिंग संस्थानों के भरोसे करते हैं। इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है। जिन परिवारों के पास पैसा है, उनके बच्चों को अतिरिक्त मदद मिलती है। गरीब परिवार पीछे छूट जाते हैं।
अगर सरकारी और निजी स्कूल मजबूत होंगे तो कोचिंग पर निर्भरता कम होगी।
सरकार के लिए असली टेस्ट अब शुरू
रिजल्ट जारी करना आसान हिस्सा है। असली काम उसके बाद शुरू होता है।
कितने छात्रों को उच्च शिक्षा मिलेगी। कितने प्रोफेशनल कोर्स में जाएंगे। कितनों को स्कॉलरशिप मिलेगी। कितने छात्र आर्थिक दबाव की वजह से पढ़ाई छोड़ देंगे।
सरकार को सिर्फ रिजल्ट सेलिब्रेशन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे करियर काउंसलिंग, डिजिटल एक्सेस, स्किल ट्रेनिंग और कॉलेज इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी फोकस करना होगा।
माता-पिता को क्या समझना चाहिए
रिजल्ट बच्चों की मेहनत का एक पड़ाव है, पूरी पहचान नहीं।
अगर आपके बच्चे ने शानदार अंक हासिल किए हैं, उसे संतुलित तरीके से आगे बढ़ाइए। अगर अंक उम्मीद से कम आए हैं, तो उसे नाकामी का टैग मत दीजिए।
एक बच्चे का आत्मविश्वास कई बार रिपोर्ट कार्ड से ज्यादा कीमती होता है।
आगे क्या देखना होगा
अब छात्रों की नजर एडमिशन प्रक्रिया, स्कॉलरशिप और करियर विकल्पों पर होगी। राज्य सरकार पर दबाव रहेगा कि वह उच्च शिक्षा में सीटों, संसाधनों और रोजगार केंद्रित शिक्षा मॉडल को मजबूत करे।
नई शिक्षा नीति के दौर में बोर्ड रिजल्ट को सिर्फ नंबर गेम की तरह नहीं देखा जा सकता। असली बहस यह है कि क्या हमारा शिक्षा सिस्टम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार कर रहा है।
अंतिम सवाल
उत्तराखंड के इस साल के नतीजे खुशी की वजह जरूर हैं। टॉपर्स बधाई के हकदार हैं। सफल छात्रों ने अपने परिवारों का नाम रोशन किया है।
लेकिन एक गंभीर समाज को सिर्फ टॉपर सूची पर नहीं रुकना चाहिए।
असल इम्तिहान यह है कि क्या हम हर छात्र को ऐसा सिस्टम दे पा रहे हैं जहां सफलता कुछ नामों तक सीमित न रहे, बल्कि लाखों युवाओं की हकीकत बन सके।
अगर यह नहीं हुआ, तो रिजल्ट की चमक कुछ दिनों में फीकी पड़ जाएगी और शिक्षा सुधार का बड़ा सवाल फिर हमारे सामने खड़ा होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।