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भारत उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: सत्ता संतुलन का बड़ा इम्तिहान

None 2025-09-09 08:09:19
भारत उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: सत्ता संतुलन का बड़ा इम्तिहान

विपक्ष का नैतिक संदेश और लोकतंत्र की आवाज़

 संसद भवन में आज मतदान की बड़ी प्रक्रिया

भारत के 17वें उपराष्ट्रपति चुनाव में NDA के सीपी राधाकृष्णन और INDIA ब्लॉक के जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी आमने-सामने। सत्ता समीकरण दिलचस्प।

New Delhi, (Shah Times)।भारत की संसदीय राजनीति का आज एक अहम दिन है। संसद भवन की नयी इमारत गवाह बनेगी उस मुकाबले की, जहाँ सत्ता और विपक्ष आमने-सामने खड़े हैं। 17वें उपराष्ट्रपति पद का चुनाव—जो सिर्फ एक संवैधानिक कुर्सी नहीं बल्कि तसवीर है उस तर्ज़ की जहाँ हुकूमत का बैलेंस और जम्हूरियत का इम्तिहान दोनों नज़र आते हैं।

जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफ़ा, सेहत के हवाले से किया गया एतराफ़, एक सियासी हलचल की शुरुआत बन गया। अब एनडीए खेमे से सीपी राधाकृष्णन और इंडिया ब्लॉक की तरफ़ से जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी मैदान में हैं। यह जंग महज़ दो नामों के बीच नहीं बल्कि दो नज़रीयों, दो हुकूमती नक्शों और दो उम्मीदों के बीच है।

एनडीए की रणनीति और अंकगणित

एनडीए इस वक़्त संसद के भीतर सबसे मज़बूत ब्लॉक है। लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर उनके पास 425 सांसदों का मज़बूत आधार है। साथ ही YSRCP का समर्थन भी उनके पलड़े को और भारी बना रहा है। भाजपा के 342 सांसद, सहयोगी दलों की ताक़त और कुछ न्यूट्रल पार्टियों की खामोशी—ये सभी मिलकर सीपी राधाकृष्णन की जीत को लगभग तयशुदा बनाते हैं।

गणित साफ़ कहता है—निर्वाचन मंडल की कुल संख्या 781 से घटकर 767 रह गई है, क्योंकि BJD, BRS और अकाली दल मतदान से दूर हैं। बहुमत का आंकड़ा 384 है, और एनडीए के पास ये सीमा आसानी से पार करने की क्षमता है।

इंडिया गठबंधन का सियासी दांव

विपक्षी INDIA गठबंधन का उम्मीदवार, जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी, एक क़ानूनी पृष्ठभूमि और साफ़ छवि वाले शख़्स हैं। उनका चयन विपक्ष के लिए संदेश भी है कि वे सिर्फ़ सियासी हस्तियों पर निर्भर नहीं बल्कि संस्थागत मजबूती और संवैधानिक नैतिकता को भी सामने ला सकते हैं।

मगर सवाल यही है कि क्या यह उम्मीदवार संख्या बल की कमी को पूरा कर पाएगा? विपक्ष की रणनीति ज़्यादा वोट बटोरने की नहीं बल्कि एक मोरल हाईग्राउंड लेने की है। उम्मीद ये जताई जा रही है कि दक्षिण भारत के कुछ सांसद, अंतरआत्मा की आवाज़ पर, विपक्ष के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालेंगे।

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सियासी तर्क और तकरार

एनडीए का तर्क: स्थिरता, स्पष्ट बहुमत और निरंतरता।

INDIA ब्लॉक का दावा: लोकतंत्र में विपक्ष की मज़बूत भूमिका और सत्ता के सामने नैतिक सवाल।

भाजपा और उसके सहयोगी ज़ोर दे रहे हैं कि यह चुनाव महज़ औपचारिकता है। वहीं विपक्ष कह रहा है कि चुनाव भले ही एकतरफ़ा लगे, लेकिन ये लोकतंत्र की नब्ज़ को छूने का मौक़ा है।

क्षेत्रीय दलों का रोल

बीजू जनता दल और भारत राष्ट्र समिति का वोटिंग से दूर रहना, सियासी हल्कों में अलग-अलग तरह से पढ़ा जा रहा है। एक तरफ़ ये एनडीए के लिए राहत है, तो दूसरी तरफ़ विपक्ष इसे लोकतंत्र से दूरी और निष्क्रियता की मिसाल बता रहा है।

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने विपक्षी उम्मीदवार को समर्थन दिया है, जबकि जगनमोहन रेड्डी की पार्टी YSRCP ने एनडीए के पक्ष में खड़े होकर दक्षिण भारत में राजनीति का नया बैलेंस बना दिया है।

प्रक्रिया और पारदर्शिता

मतदान सुबह 10 से शाम 5 बजे तक, गुप्त मतपत्र से होगा। सांसद अपनी प्राथमिकता अंकित करेंगे। यदि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम लागू होगा। गिनती शाम 6 बजे से होगी और देर रात तक देश को नया उपराष्ट्रपति मिल जाएगा।

यहाँ सवाल केवल नतीजे का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का भी है जिस पर भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद खड़ी है। गुप्त मतदान, निष्पक्ष प्रणाली और संसद का वातावरण—ये सब मिलकर एक मिसाल बनाते हैं।

विपक्षी चुनौती और लोकतांत्रिक संदेश

भले ही नतीजा पहले से लिखा हुआ लगे, विपक्ष के लिए यह चुनाव लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक है। जनता को यह संदेश देना कि सत्ता चाहे कितनी भी मज़बूत हो, विपक्ष अपनी भूमिका निभाता रहेगा, एक अहम क़दम है।

यहाँ सवाल सिर्फ़ जीत-हार का नहीं बल्कि लोकतंत्र की उस रूह का है जो हर चुनाव, हर बहस और हर विरोध में सांस लेती है।

प्रतिपक्षी तर्क (Counterpoints)

क्या उपराष्ट्रपति चुनाव में वास्तविक लोकतांत्रिक स्पर्धा होती है या ये केवल सत्ता-संतुलन का आईना है?

क्या विपक्ष का उम्मीदवार केवल प्रतीकात्मक है, या इससे सत्ता की एकतरफ़ा हक़ूमत पर सवाल खड़े होते हैं?

क्या क्षेत्रीय दलों का वोटिंग से दूर रहना उनकी स्वतंत्र नीति है या दबाव की सियासत का हिस्सा?

निष्कर्ष

भारत का 17वां उपराष्ट्रपति चुनाव, सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए अलग-अलग मायने रखता है। सत्ता पक्ष के लिए यह एक आसान जीत है, विपक्ष के लिए यह लोकतांत्रिक अस्तित्व का इज़हार। लेकिन सबसे अहम है कि जनता देख रही है—कौन कैसे खड़ा है, कौन किसके साथ खड़ा है और कौन खामोश है।

शाम ढलते-ढलते जब नतीजे आएंगे, नाम चाहे कोई भी हो, असल मायने यह होगा कि भारतीय लोकतंत्र ने एक बार फिर अपने संविधानिक रास्ते पर एक क़दम आगे बढ़ाया है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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