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मालेगांव ब्लास्ट : क्या मोहन भागवत को जानबूझकर फंसाने की थी साजिश?

None 2025-08-01 15:17:39
मालेगांव ब्लास्ट : क्या मोहन भागवत को जानबूझकर फंसाने की थी साजिश?

मोहन भागवत पर झूठे केस का दबाव? मालेगांव केस में ATS के कामकाज पर उठे सवाल

मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का मिला था आदेश: मालेगांव केस पर पूर्व ATS अधिकारी का सनसनीखेज दावा

मालेगांव ब्लास्ट केस में बड़ा खुलासा, ATS अफसर बोले- मुझे मोहन भागवत को पकड़ने का आदेश दिया गया था।

Mumbai,(Shah Times) । महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को हुए बम धमाके ने भारत की राजनीति, आतंकवाद की परिभाषा और जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े किए थे। 17 वर्षों तक चले मुकदमे के बाद, 31 जुलाई 2025 को विशेष एनआईए अदालत ने फैसला सुनाया, जिसमें बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत सातों अभियुक्तों को बरी कर दिया गया।

इस फैसले के साथ ही एक और बड़ा धमाका हुआ — एटीएस के पूर्व अधिकारी महबूब मुजावर ने खुलासा किया कि उन पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को “फंसाने” का दबाव था। यह दावा इस बहुचर्चित केस की राजनीतिक और संस्थागत परतों को उघाड़ता है।

फैसला: 17 साल बाद न्याय या अधूरा सच?

एनआईए की विशेष अदालत के जज एके लाहोटी ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने के लिए निर्णायक साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर दोष साबित नहीं किया जा सकता।

जिन सात अभियुक्तों को बरी किया गया, उनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, समीर कुलकर्णी, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी शामिल हैं। अदालत ने पाया कि विस्फोटक, मोटरसाइकिल और अभियुक्तों के बीच संबंधों को लेकर कोई ठोस, कानूनी रूप से मान्य प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

ATS के पूर्व अधिकारी का खुलासा: ‘भगवा आतंक’ सिर्फ एक थ्योरी थी

रिटायर्ड इंस्पेक्टर महबूब मुजावर ने खुलकर कहा कि इस केस को 'भगवा आतंकवाद' का रूप देने के लिए उन्हें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के निर्देश मिले थे।

“मुझे झूठे केस में फंसाया गया, क्योंकि मैंने उन आदेशों का पालन नहीं किया। वे भयावह थे और मेरी आत्मा उन्हें स्वीकार नहीं कर सकती थी,” – महबूब मुजावर

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन दो संदिग्धों की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी — संदीप डांगे और रामजी कलसंगरा — उन्हें चार्जशीट में ‘जिंदा’ दिखाया गया।

 जांच एजेंसियों की भूमिका सवालों के घेरे में

यह कोई पहला मामला नहीं जब आतंकवाद से जुड़े केस में सबूतों की कमी के चलते सभी अभियुक्त बरी हुए हों। 11 जुलाई 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट केस में भी सभी आरोपी रिहा हो चुके हैं।

एनआईए और एटीएस की जांचों में एकरूपता न होना, गवाहों का मुकर जाना, सबूतों का फर्जी साबित होना और बिना कानूनी प्रक्रिया के कॉल डाटा रिकॉर्ड्स निकालना — यह सब न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 'भगवा आतंकवाद' की परिकल्पना या राजनीतिक हथियार?

पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने वर्ष 2013 में ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का उपयोग किया था। इसके बाद यह राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया।

अब जब कोर्ट ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है, और एटीएस के एक पूर्व अधिकारी ने साफ शब्दों में कहा है कि “कोई भगवा आतंकवाद था ही नहीं”, तो यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या यह थ्योरी सिर्फ एक राजनीतिक उपकरण थी?

एनआईए और एटीएस: परस्पर विरोधी रणनीतियां

जहां एटीएस ने दो चार्जशीट दाखिल की थीं, वहीं 2016 में एनआईए ने पूरक आरोपपत्र दायर किया और कुछ आरोपों को वापस लेने की सिफारिश की। विशेष अदालत ने 2017 में मकोका (MCOCA) हटाने की अनुमति तो दी लेकिन यूएपीए के तहत मुकदमा जारी रखा गया।

पूर्व सरकारी वकील रोहिणी सालियन ने दावा किया था कि एनआईए पर दबाव था कि वह आरोपियों पर “नरमी” बरते। साल 2025 के फैसले के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, “अगर सबूत ही अदालत में पेश नहीं किए गए, तो दोष कैसे सिद्ध होगा?”

सबूत और न्याय के बीच की खाई

विस्फोट में प्रयुक्त मोटरसाइकिल को साध्वी प्रज्ञा से जोड़ने में विफलता

आरडीएक्स का स्रोत साबित न कर पाना

गवाहों का मुकर जाना (324 में से 34 गवाह)

फोरेंसिक सबूतों की विश्वसनीयता पर प्रश्न

कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन में कॉल रिकॉर्ड्स और पंचनामा

ये सभी तथ्य दर्शाते हैं कि एक गंभीर आतंकवादी हमले के मामले में भारत की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसियाँ एक ठोस केस प्रस्तुत नहीं कर सकीं।

 मीडिया, राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक धारणा

इस केस ने मीडिया ट्रायल, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत साख को बुरी तरह प्रभावित किया। ‘भगवा आतंक’ शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना, तो वहीं साध्वी प्रज्ञा के लोकसभा सदस्य बनने के बाद केस की प्रकृति और भी पेचीदा हो गई।

अब जब अदालत ने फैसला सुना दिया है, तो यह सिर्फ एक न्यायिक आदेश नहीं है — यह देश की जांच एजेंसियों, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक नैरेटिव की भी समीक्षा का क्षण है।

 क्या सबूतों की कमजोरी ने सच्चाई को धुंधला किया?

मालेगांव केस में न्यायालय ने अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया है। लेकिन इस फैसले के बाद जो गंभीर आरोप एटीएस पर लगे हैं, वह देश की न्याय प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

महबूब मुजावर के खुलासे सिर्फ एक केस से जुड़ी कहानी नहीं हैं — यह एक व्यवस्था की समीक्षा है, जहां किसी भी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के चलते जांच को मोड़ा गया।

अब जब फैसला आ चुका है, तो यह सरकार, जांच एजेंसियों और न्याय प्रणाली की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे न केवल निष्पक्षता से काम करें, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि राजनीतिक एजेंडा, निर्दोषों की ज़िंदगी बर्बाद न करे।

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मोहन भागवत पर झूठे केस का दबाव? मालेगांव केस में ATS के कामकाज पर उठे सवाल

मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का मिला था आदेश: मालेगांव केस पर पूर्व ATS अधिकारी का सनसनीखेज दावा

मालेगांव ब्लास्ट केस में बड़ा खुलासा, ATS अफसर बोले- मुझे मोहन भागवत को पकड़ने का आदेश दिया गया था।

Mumbai,(Shah Times) । महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को हुए बम धमाके ने भारत की राजनीति, आतंकवाद की परिभाषा और जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े किए थे। 17 वर्षों तक चले मुकदमे के बाद, 31 जुलाई 2025 को विशेष एनआईए अदालत ने फैसला सुनाया, जिसमें बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत सातों अभियुक्तों को बरी कर दिया गया।

इस फैसले के साथ ही एक और बड़ा धमाका हुआ — एटीएस के पूर्व अधिकारी महबूब मुजावर ने खुलासा किया कि उन पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को “फंसाने” का दबाव था। यह दावा इस बहुचर्चित केस की राजनीतिक और संस्थागत परतों को उघाड़ता है।

फैसला: 17 साल बाद न्याय या अधूरा सच?

एनआईए की विशेष अदालत के जज एके लाहोटी ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने के लिए निर्णायक साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर दोष साबित नहीं किया जा सकता।

जिन सात अभियुक्तों को बरी किया गया, उनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, समीर कुलकर्णी, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी शामिल हैं। अदालत ने पाया कि विस्फोटक, मोटरसाइकिल और अभियुक्तों के बीच संबंधों को लेकर कोई ठोस, कानूनी रूप से मान्य प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

ATS के पूर्व अधिकारी का खुलासा: ‘भगवा आतंक’ सिर्फ एक थ्योरी थी

रिटायर्ड इंस्पेक्टर महबूब मुजावर ने खुलकर कहा कि इस केस को 'भगवा आतंकवाद' का रूप देने के लिए उन्हें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के निर्देश मिले थे।

“मुझे झूठे केस में फंसाया गया, क्योंकि मैंने उन आदेशों का पालन नहीं किया। वे भयावह थे और मेरी आत्मा उन्हें स्वीकार नहीं कर सकती थी,” – महबूब मुजावर

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन दो संदिग्धों की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी — संदीप डांगे और रामजी कलसंगरा — उन्हें चार्जशीट में ‘जिंदा’ दिखाया गया।

 जांच एजेंसियों की भूमिका सवालों के घेरे में

यह कोई पहला मामला नहीं जब आतंकवाद से जुड़े केस में सबूतों की कमी के चलते सभी अभियुक्त बरी हुए हों। 11 जुलाई 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट केस में भी सभी आरोपी रिहा हो चुके हैं।

एनआईए और एटीएस की जांचों में एकरूपता न होना, गवाहों का मुकर जाना, सबूतों का फर्जी साबित होना और बिना कानूनी प्रक्रिया के कॉल डाटा रिकॉर्ड्स निकालना — यह सब न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 'भगवा आतंकवाद' की परिकल्पना या राजनीतिक हथियार?

पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने वर्ष 2013 में ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का उपयोग किया था। इसके बाद यह राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया।

अब जब कोर्ट ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है, और एटीएस के एक पूर्व अधिकारी ने साफ शब्दों में कहा है कि “कोई भगवा आतंकवाद था ही नहीं”, तो यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या यह थ्योरी सिर्फ एक राजनीतिक उपकरण थी?

एनआईए और एटीएस: परस्पर विरोधी रणनीतियां

जहां एटीएस ने दो चार्जशीट दाखिल की थीं, वहीं 2016 में एनआईए ने पूरक आरोपपत्र दायर किया और कुछ आरोपों को वापस लेने की सिफारिश की। विशेष अदालत ने 2017 में मकोका (MCOCA) हटाने की अनुमति तो दी लेकिन यूएपीए के तहत मुकदमा जारी रखा गया।

पूर्व सरकारी वकील रोहिणी सालियन ने दावा किया था कि एनआईए पर दबाव था कि वह आरोपियों पर “नरमी” बरते। साल 2025 के फैसले के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, “अगर सबूत ही अदालत में पेश नहीं किए गए, तो दोष कैसे सिद्ध होगा?”

सबूत और न्याय के बीच की खाई

विस्फोट में प्रयुक्त मोटरसाइकिल को साध्वी प्रज्ञा से जोड़ने में विफलता

आरडीएक्स का स्रोत साबित न कर पाना

गवाहों का मुकर जाना (324 में से 34 गवाह)

फोरेंसिक सबूतों की विश्वसनीयता पर प्रश्न

कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन में कॉल रिकॉर्ड्स और पंचनामा

ये सभी तथ्य दर्शाते हैं कि एक गंभीर आतंकवादी हमले के मामले में भारत की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसियाँ एक ठोस केस प्रस्तुत नहीं कर सकीं।

 मीडिया, राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक धारणा

इस केस ने मीडिया ट्रायल, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत साख को बुरी तरह प्रभावित किया। ‘भगवा आतंक’ शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना, तो वहीं साध्वी प्रज्ञा के लोकसभा सदस्य बनने के बाद केस की प्रकृति और भी पेचीदा हो गई।

अब जब अदालत ने फैसला सुना दिया है, तो यह सिर्फ एक न्यायिक आदेश नहीं है — यह देश की जांच एजेंसियों, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक नैरेटिव की भी समीक्षा का क्षण है।

 क्या सबूतों की कमजोरी ने सच्चाई को धुंधला किया?

मालेगांव केस में न्यायालय ने अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया है। लेकिन इस फैसले के बाद जो गंभीर आरोप एटीएस पर लगे हैं, वह देश की न्याय प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

महबूब मुजावर के खुलासे सिर्फ एक केस से जुड़ी कहानी नहीं हैं — यह एक व्यवस्था की समीक्षा है, जहां किसी भी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के चलते जांच को मोड़ा गया।

अब जब फैसला आ चुका है, तो यह सरकार, जांच एजेंसियों और न्याय प्रणाली की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे न केवल निष्पक्षता से काम करें, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि राजनीतिक एजेंडा, निर्दोषों की ज़िंदगी बर्बाद न करे।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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