2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश की कई सरकारी भर्तियां विवादों में रहीं। PCS परीक्षा का पेपर लीक हुआ, सहकारिता नियुक्तियों की जांच में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए और अन्य भर्तियां भी जांच के दायरे में आईं।
📍 लखनऊ, उत्तर प्रदेश
🗓️ 22 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
भर्ती विवाद फिर सियासी बहस के केंद्र में
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों और भर्ती परीक्षाओं को लेकर सियासी बयानबाज़ी फिर तेज है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017 से पहले की भर्ती प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए हैं, जबकि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव मौजूदा दौर की भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक के मामलों को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं।
इन आरोपों से अलग सरकारी रिकॉर्ड और अदालतों में सामने आए दस्तावेज़ बताते हैं कि 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में कई भर्ती प्रक्रियाएं विवादों में आई थीं। हालांकि हर मामले को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं होगा। कहीं प्रश्नपत्र लीक होने की पुष्टि के बाद दोबारा परीक्षा हुई, कहीं चयन प्रक्रिया पर शिकायतें हुईं और बाद में जांच एजेंसियों ने मामला दर्ज किया। कुछ मामलों में आरोप जांच के स्तर पर रहे और अंतिम दोषसिद्धि को अलग तथ्य के रूप में देखना जरूरी है।
PCS परीक्षा का पेपर लीक और दोबारा परीक्षा
इस दौर का सबसे चर्चित मामला प्रांतीय सिविल सेवा यानी PCS प्रारंभिक परीक्षा 2015 का था। 29 मार्च 2015 को आयोजित परीक्षा के पहले प्रश्नपत्र के लीक होने की खबर सामने आई। उत्तर प्रदेश पुलिस के तत्कालीन अधिकारियों ने बताया था कि प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले व्हाट्सऐप के जरिये प्रसारित हुआ था।
मामला सामने आने के बाद परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निर्देश पर परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया गया और प्रभावित प्रश्नपत्र की दोबारा परीक्षा कराई गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी दर्ज है कि आयोग ने सामान्य अध्ययन के पहले प्रश्नपत्र की पुनर्परीक्षा कराने का निर्णय लिया था।
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक पहले प्रश्नपत्र में लगभग 265039 अभ्यर्थी शामिल हुए थे। आयोग ने बाद में प्रभावित प्रश्नपत्र की पुनर्परीक्षा की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। अदालत ने उस समय पूरी परीक्षा को रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की और आयोग को निष्पक्ष तथा पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ने दिया।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं था। प्रश्नपत्र लीक की घटना के बाद प्रशासनिक स्तर पर परीक्षा रद्द करने और पुनर्परीक्षा कराने का फैसला दर्ज सरकारी और न्यायिक रिकॉर्ड में मौजूद है।
UPPSC की कई भर्तियों पर बाद में CBI जांच
PCS 2015 विवाद अकेला मामला नहीं था। 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा कराई गई परीक्षाओं और घोषित परिणामों की CBI जांच की सिफारिश की।
केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद इस अवधि की भर्तियां जांच के दायरे में आईं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक सरकार को अलग-अलग स्रोतों से बड़ी संख्या में शिकायतें मिली थीं। इनमें स्केलिंग, इंटरव्यू, उत्तर पुस्तिकाओं में कथित बदलाव, प्रश्नपत्र लीक, आरक्षण नियमों और कुछ क्षेत्रों या जातियों के उम्मीदवारों को कथित लाभ जैसे आरोप शामिल थे।
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। ये सभी आरोप अपने आप में सिद्ध अपराध नहीं थे। इन्हीं आरोपों की जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसी की जरूरत बताई गई थी। बाद में CBI ने UPPSC से जुड़े मामलों में FIR भी दर्ज की।
CBI की कार्रवाई और PCS 2015
2018 में CBI ने 2012 से 2017 के बीच हुई UPPSC भर्तियों में कथित अनियमितताओं को लेकर अज्ञात अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। CBI की प्रारंभिक जांच में PCS 2015 से जुड़े चयन और मॉडरेशन की प्रक्रिया पर भी सवाल दर्ज हुए।
CBI ने PCS 2015 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर भी जांच की। रिपोर्टों के अनुसार स्वतंत्र मूल्यांकन के जरिये अंकों में अंतर की जांच करने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इस व्यापक जांच में 2012 से 2017 की अवधि में घोषित 584 परिणामों का भी उल्लेख सामने आया।
UPPSC की जांच का दायरा केवल PCS तक सीमित नहीं था। अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं से संबंधित शिकायतें भी जांच के दायरे में आईं।
आरक्षण नीति को लेकर भी विवाद
UPPSC के दौर में परीक्षा प्रक्रिया और आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी विवाद हुआ। 2013 में आयोग ने PCS परीक्षा के अलग-अलग चरणों में आरक्षण लागू करने का फैसला लिया था। बाद में इस व्यवस्था को लेकर अभ्यर्थियों ने अदालत का रुख किया और आयोग ने अपनी तीन-स्तरीय आरक्षण नीति वापस ले ली।
PCS 2012 और PCS 2013 में सफल उम्मीदवारों के नाम और श्रेणी प्रकाशित करने की प्रक्रिया को लेकर भी विवाद सामने आया। बाद के वर्षों में केवल रोल नंबर प्रकाशित करने की व्यवस्था अपनाई गई। इन घटनाओं ने आयोग की पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया को लेकर सवालों को बढ़ाया।
सहकारिता विभाग की भर्तियां
अखिलेश सरकार के कार्यकाल से जुड़ा दूसरा बड़ा मामला सहकारिता विभाग और उससे जुड़ी संस्थाओं की भर्तियों का है।
1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2017 के बीच सहकारिता क्षेत्र की विभिन्न संस्थाओं में हजारों पदों पर भर्ती हुई। जांच के दौरान अलग-अलग रिपोर्टों में पदों की संख्या में अंतर भी सामने आया। कुछ रिपोर्टों में 2374 पदों पर भर्ती प्रक्रिया का उल्लेख है, जबकि बाद की जांच से जुड़े मामलों में 2324 भर्तियों को लेकर FIR दर्ज होने की जानकारी दी गई।
SIT की जांच में आरोप लगाया गया कि कुछ अभ्यर्थियों की OMR शीट में हेरफेर की गई और कुछ चयनित उम्मीदवारों की शीट में कथित तौर पर ओवरराइटिंग हुई। जांच के आधार पर सहकारिता से जुड़ी कई संस्थाओं के अधिकारियों और भर्ती प्रक्रिया में शामिल निजी एजेंसियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई।
जांच में UP State Warehousing Corporation, UP Cooperative Federation, UP Cooperative Union और अन्य संस्थाओं से संबंधित भर्तियां भी सामने आईं। आरोपों में धोखाधड़ी, जालसाजी, दस्तावेजों के गलत इस्तेमाल और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं शामिल की गईं।
यहां भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि FIR और जांच किसी व्यक्ति या पूरी भर्ती प्रक्रिया को अंतिम रूप से दोषी साबित नहीं करती। अंतिम जिम्मेदारी अदालत के फैसले और जांच की न्यायिक परिणति से तय होती है।
जल निगम भर्ती विवाद
अखिलेश सरकार के आखिरी दौर में उत्तर प्रदेश जल निगम की भर्तियां भी जांच के घेरे में आईं। 2016 से 2017 के बीच जल निगम में लगभग 1300 पदों पर नियुक्तियां हुई थीं। इनमें सहायक अभियंता, अवर अभियंता और लिपिक स्तर के पद शामिल थे।
बाद की सरकार ने सहायक अभियंता के 122 नियुक्तियों को समाप्त किया और शेष नियुक्तियों की भी जांच कराई। मामले में SIT ने तत्कालीन अधिकारियों से पूछताछ की और तत्कालीन मंत्री आजम खान को भी जांच के सिलसिले में नोटिस जारी किया गया था।
इस मामले को लेकर आरोप भ्रष्टाचार और नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितता से जुड़े थे। हालांकि आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध अपराध के बीच अंतर रखना जरूरी है।
उर्दू अनुवादक और कनिष्ठ सहायक भर्ती
अखिलेश सरकार के दौर की एक भर्ती प्रक्रिया बाद में सीधे निरस्त भी की गई। उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 2016 में उर्दू अनुवादक सह कनिष्ठ सहायक के 112 पदों के लिए भर्ती निकाली थी। परीक्षा 28 अगस्त 2016 को हुई थी।
बाद में शासन के सतर्कता विभाग ने नियुक्ति की आवश्यकता और औचित्य पर सवाल उठाए। इसके बाद इस भर्ती प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया। यह मामला इसलिए अलग है क्योंकि यहां पूरी भर्ती प्रक्रिया को बाद में समाप्त करने का निर्णय लिया गया।
चकबंदी लेखपाल भर्ती में भी विवाद
2015 में चकबंदी लेखपाल के 2831 पदों पर चयन प्रक्रिया हुई। बाद में चयन सूची में आरक्षण और श्रेणीवार पदों के आवंटन को लेकर गंभीर सवाल उठे।
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार आयोग को अलग-अलग श्रेणियों के लिए निर्धारित पदों के अनुरूप चयन करना था, लेकिन भेजी गई सूची में श्रेणीवार संख्या में बड़ा अंतर सामने आया। इस मामले में तत्कालीन UPSSSC के अधिकारियों और सदस्यों के खिलाफ बाद में FIR की कार्रवाई हुई।
यह मामला यह बताता है कि विवाद केवल प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं थे। चयन सूची तैयार करने, आरक्षण लागू करने और परिणाम घोषित करने की प्रक्रिया भी कई बार विवाद का विषय बनी।
2016 की अन्य परीक्षाओं पर भी शिकायतें
2016 में UPSSSC की लोअर सबऑर्डिनेट परीक्षा को लेकर भी प्रश्नपत्र लीक होने का आरोप लगा था। परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी शामिल हुए थे और कुछ केंद्रों पर हंगामा हुआ। हालांकि प्रशासन की ओर से उस समय लीक की पुष्टि से इनकार किया गया था। इसलिए इसे पुष्ट पेपर लीक के बजाय आरोप और विवाद के रूप में दर्ज करना अधिक सटीक है।
इसी तरह असिस्टेंट अकाउंटेंट परीक्षा के दौरान कुछ अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि निर्धारित समय से पहले OMR शीट वापस ले ली गई। अभ्यर्थियों ने पुनर्परीक्षा या नकारात्मक अंकन हटाने की मांग की थी।
2016 में UPPSC की समीक्षा अधिकारी परीक्षा के सामान्य हिंदी प्रश्नपत्र को लेकर भी पेपर लीक का आरोप सामने आया। बाद में लखनऊ की अदालत ने शिकायत के आधार पर FIR दर्ज कर जांच का आदेश दिया।
क्या सभी मामलों को भर्ती घोटाला कहना सही है?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। 2012 से 2017 के बीच हुई हर भर्ती को घोटाला कहना उपलब्ध रिकॉर्ड से साबित नहीं होता।
कुछ मामलों में पेपर लीक की घटना सामने आई और परीक्षा दोबारा हुई। कुछ मामलों में अदालतों में याचिकाएं दाखिल हुईं। कुछ मामलों में जांच एजेंसियों ने FIR दर्ज की। कुछ प्रक्रियाओं को बाद में रद्द किया गया। वहीं कई मामलों में आरोपों की जांच हुई, लेकिन आरोप और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग चीजें हैं।
UPPSC के मामले में 2017 में CBI जांच की सिफारिश का आधार बड़ी संख्या में शिकायतें थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी शिकायतों और याचिकाओं का विस्तृत उल्लेख है। बाद में CBI ने FIR दर्ज की।
इसलिए तथ्यात्मक रूप से यह कहना अधिक सटीक है कि उस अवधि की कई भर्ती प्रक्रियाएं शिकायतों, विवादों और जांच के घेरे में आईं। प्रत्येक मामले की कानूनी स्थिति अलग रही।
राजनीतिक बयानबाज़ी और रिकॉर्ड में फर्क
मौजूदा राजनीतिक बहस में 2017 से पहले की भर्तियों को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव मौजूदा सरकार के समय हुए पेपर लीक और भर्ती विवादों का हवाला देते हैं।
दोनों पक्षों के राजनीतिक दावों का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाना चाहिए। किसी एक दौर की समस्याएं दूसरे दौर की घटनाओं को स्वतः सही या गलत साबित नहीं करतीं।
भर्ती व्यवस्था का असल सवाल
सरकारी नौकरी की परीक्षा लाखों युवाओं के लिए करियर का निर्णायक पड़ाव होती है। प्रश्नपत्र लीक, OMR में हेरफेर, परिणामों में देरी, चयन सूची में विसंगति या परीक्षा रद्द होने का सीधा असर अभ्यर्थियों पर पड़ता है।
इसलिए भर्ती व्यवस्था में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण हैं। परीक्षा की गोपनीयता, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और शिकायतों के निपटारे की स्वतंत्र व्यवस्था।
2012 से 2017 के मामलों का रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि विवाद केवल एक परीक्षा या एक आयोग तक सीमित नहीं थे। UPPSC, UPSSSC, सहकारिता संस्थाओं और जल निगम जैसे अलग-अलग संस्थानों से संबंधित प्रक्रियाएं अलग-अलग समय पर सवालों के घेरे में आईं।
आगे क्या देखना होगा
उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाओं को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है। लेकिन किसी भी सरकार के कार्यकाल का आकलन केवल आरोपों या राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि परीक्षा परिणाम, जांच रिपोर्ट, FIR, अदालतों के आदेश और अंतिम न्यायिक निष्कर्षों के आधार पर होना चाहिए।
अखिलेश सरकार के 2012 से 2017 के दौर में PCS पेपर लीक, UPPSC की व्यापक जांच, सहकारिता भर्तियों में कथित अनियमितताएं, जल निगम भर्ती विवाद और कुछ UPSSSC प्रक्रियाओं पर उठे सवाल रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। इनमें से कुछ मामलों में जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की और कुछ में भर्ती प्रक्रिया तक रद्द हुई।
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की भर्ती राजनीति को समझने के लिए केवल मौजूदा बयानबाज़ी देखना पर्याप्त नहीं है। पुराने रिकॉर्ड, न्यायिक दस्तावेज़ और जांच एजेंसियों की कार्रवाई को साथ रखकर तस्वीर देखना अधिक जरूरी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।