भारत में कागज आने से पहले लोग लिखते किस पर थे?
नई दिल्ली। आज किताब, कॉपी और दस्तावेज के लिए कागज सामान्य माध्यम है, लेकिन भारत में लिखित ज्ञान की परंपरा कागज के व्यापक इस्तेमाल से काफी पुरानी है। मुद्रण तकनीक के आने से पहले विद्वान, लेखक और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोग अलग-अलग प्राकृतिक और टिकाऊ माध्यमों पर लेखन करते थे। इनमें ताड़पत्र और भोजपत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं।
ताड़पत्र क्या होता था?
ताड़पत्र मुख्य रूप से ताड़ या ताल के पत्तों से तैयार किया जाता था। National Mission for Manuscripts के संरक्षण संबंधी दस्तावेज के अनुसार, पत्तों को नियंत्रित तरीके से सुखाने और तैयार करने के बाद उनका आकार समान किया जाता था। कुछ परंपराओं में पत्तों को पानी में भिगोने या उबालने तथा हल्दी जैसे पदार्थों से उपचारित करने का भी उल्लेख मिलता है। तैयार पत्तों पर लेखन दो प्रमुख तरीकों से किया जाता था। कहीं स्याही से कलम या ब्रश द्वारा लिखा जाता था, जबकि कुछ परंपराओं में नुकीली लोहे की लेखनी से अक्षरों को पत्ते की सतह पर उकेरा जाता था। उकेरे गए अक्षरों को अधिक स्पष्ट करने के लिए उनमें कालिख या अन्य पदार्थ रगड़ने की तकनीक भी इस्तेमाल की जाती थी। ताड़पत्र पांडुलिपियों का इस्तेमाल भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुआ। National Mission for Manuscripts के अनुसार, तालपत्र पांडुलिपियां विशेष रूप से उन तटीय क्षेत्रों में अधिक मिलती हैं जहां पाल्माइरा यानी ताड़ के पेड़ पाए जाते थे।
भोजपत्र पर कैसे लिखा जाता था?
भोजपत्र का संबंध भोज वृक्ष यानी बर्च वृक्ष की अंदरूनी छाल से है। National Mission for Manuscripts के संरक्षण दस्तावेज में बताया गया है कि बर्च की अंदरूनी छाल को सावधानी से अलग करके सुखाया जाता था। आवश्यकता के अनुसार इसे संसाधित, चिकना और उचित आकार में तैयार किया जाता था। भोजपत्र की पांडुलिपियां विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। सरकारी संरक्षण दस्तावेज के अनुसार, भोजपत्र वृक्ष और उनसे तैयार पांडुलिपियां मुख्यतः हिमालयी क्षेत्र के समशीतोष्ण और अल्पाइन इलाकों में पाई जाती थीं, हालांकि ऐसी पांडुलिपियों के संग्रह भारत के दूसरे हिस्सों में भी मौजूद हैं।
सिर्फ ताड़पत्र और भोजपत्र ही नहीं थे लेखन के माध्यम
प्राचीन भारत में लिखने के लिए केवल पत्तियों और पेड़ की छाल का इस्तेमाल नहीं होता था। IGNCA के Manuscriptology Overview के अनुसार, पांडुलिपियां ताड़पत्र, भोजपत्र और बाद में हाथ से बनाए गए कागज पर लिखी गईं। अन्य ऐतिहासिक सामग्री में लकड़ी, कपड़ा, धातु, पत्थर और चमड़े का भी इस्तेमाल मिलता है। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि कागज के व्यापक प्रचलन से पहले भारत में लेखन के लिए कई तरह के माध्यम मौजूद थे।
भारत में कागज कब आया?
भारत में कागज के आने की तारीख को लेकर इतिहास में अलग-अलग संदर्भ मिलते हैं। IGNCA में उपलब्ध ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार, कागज का इस्तेमाल भारत में लगभग 1000 ईस्वी के बाद बढ़ा और भारत में मिले सबसे पुराने ज्ञात कागजी हस्तलिखित ग्रंथों में एक का संबंध 1200 ईस्वी के कुछ समय बाद से बताया गया है। हालांकि कागज के इस्तेमाल के बाद भी पुराने माध्यम अचानक समाप्त नहीं हुए। उसी अध्ययन के अनुसार, भोजपत्र का इस्तेमाल कई सदियों तक जारी रहा और भारत के कुछ हिस्सों में ताड़पत्र पर लेखन की परंपरा भी आगे चलती रही।
पांडुलिपियां सिर्फ धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं थीं
इन पांडुलिपियों में धार्मिक और दार्शनिक साहित्य के साथ-साथ साहित्य, चिकित्सा, ज्योतिष, गणित, व्याकरण, कला, संगीत और अन्य विषयों से संबंधित सामग्री भी मिलती है। IGNCA के संग्रह संबंधी विवरण में विभिन्न संस्थानों में सुरक्षित पांडुलिपियों के विषयों में वेद, दर्शन, इतिहास, पुराण, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, संगीत, व्याकरण और वास्तु जैसे विषयों का उल्लेख है।
पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना क्यों कठिन था?
ताड़पत्र और भोजपत्र प्राकृतिक सामग्री हैं। समय, नमी, तापमान, कीट और अनुचित रखरखाव इनके लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। IGNCA के अनुसार, भारत की अनेक पांडुलिपियां जैविक सामग्री पर लिखी गई हैं और उनके संरक्षण के लिए विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। इसी विरासत को सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार ने National Mission for Manuscripts की शुरुआत 2003 में की थी, जिसके तहत पांडुलिपियों की पहचान, संरक्षण और उनके प्रति जागरूकता बढ़ाने का काम किया गया। IGNCA को इसके लिए नोडल एजेंसी की भूमिका दी गई।
आज भी मौजूद है यह विरासत
भारत के अलग-अलग पुस्तकालयों, मठों, शोध संस्थानों, संग्रहालयों और निजी संग्रहों में ताड़पत्र, भोजपत्र और अन्य माध्यमों पर लिखी पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। IGNCA के अनुसार, देश में पांडुलिपियों का विशाल भंडार मौजूद है और इनमें से बड़ी संख्या को संरक्षण की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
कागज और आधुनिक छपाई तकनीक ने ज्ञान के प्रसार को आसान बनाया, लेकिन भारत में लिखित ज्ञान की परंपरा उनसे कहीं पहले विकसित हो चुकी थी। ताड़पत्र और भोजपत्र केवल लिखने की सतह नहीं थे, बल्कि उन्होंने साहित्य, धर्म, दर्शन, विज्ञान और चिकित्सा से जुड़े ज्ञान को पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।