* AI के दौर में भारतीय IT सेक्टर का नया संकट, नौकरियों से बिजनेस मॉडल तक बदलाव
* भारतीय IT सेक्टर में मंदी या बदलाव? AI, हायरिंग और ग्लोबल डिमांड की पूरी तस्वीर
* IT सेक्टर में क्यों बढ़ी चिंता? AI प्रेशर, क्लाइंट खर्च और नौकरियों पर असर
भारतीय IT सेक्टर AI ट्रांसफॉर्मेशन के दौर से गुजर रहा है। कंपनियों को AI आधारित बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिल रहे हैं, लेकिन ग्लोबल क्लाइंट खर्च, प्राइसिंग और पारंपरिक नौकरियों पर दबाव बना हुआ है।
नई दिल्ली | 3 अक्टूबर 2026
By Mohd Haris
भारतीय आईटी सेक्टर इस समय एक अहम ट्रांजिशन से गुजर रहा है। इसे केवल मंदी या केवल ग्रोथ की कहानी मानना अधूरा होगा। एक तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई कंपनियों के बिजनेस मॉडल, डिलीवरी सिस्टम और टैलेंट जरूरतों को बदल रही है। दूसरी तरफ ग्लोबल क्लाइंट्स खर्च को लेकर ज्यादा सतर्क हैं।
2026 के पहले वित्तीय क्वार्टर के आंकड़े इस दोहरी तस्वीर को सामने रखते हैं। टीसीएस ने क्यू1 एफवाई27 में 7.624 बिलियन अमेरिकी डॉलर का रेवेन्यू दर्ज किया। कंपनी की एनुअलाइज्ड एआई रेवेन्यू रन-रेट 2.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर रही, जो पिछली तिमाही के मुकाबले 13.6 प्रतिशत ज्यादा थी। इसी अवधि में कंपनी का कुल वर्कफोर्स 593,798 रहा।
इंफोसिस ने क्यू1 एफवाई27 में 48,211 करोड़ रुपये का रेवेन्यू और 7,769 करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट दर्ज किया। 30 जून 2026 को उसके कर्मचारियों की संख्या 328,062 थी।
इससे साफ है कि कारोबार पूरी तरह ठप नहीं है। असली बदलाव यह है कि आईटी कंपनियों से अब ज्यादा टेक्नोलॉजी, एआई और ऑटोमेशन आधारित वैल्यू देने की अपेक्षा हो रही है।
भारतीय आईटी इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक एप्लिकेशन डेवलपमेंट, मेंटेनेंस, इन्फ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट और बिजनेस प्रोसेस सर्विसेज जैसे कामों पर आधारित रहा।
इस मॉडल में बड़ी संख्या में इंजीनियर और दूसरे प्रोफेशनल्स क्लाइंट के लिए तय घंटों और तय स्कोप के आधार पर काम करते थे।
जेनरेटिव एआई और एजेंटिक एआई के विस्तार से इस मॉडल पर दबाव आया है। अब क्लाइंट केवल मैनपावर नहीं, बल्कि प्रोडक्टिविटी और मेजरेबल बिजनेस आउटकम पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
इसका सीधा असर प्राइसिंग और डिलीवरी मॉडल पर पड़ रहा है। कंपनियां ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स की तरफ बढ़ रही हैं जहां भुगतान केवल आवर्स या हेडकाउंट से नहीं, बल्कि आउटकम और बिजनेस वैल्यू से जुड़ा हो।
यानी आईटी सेक्टर में एआई केवल एक नया सॉफ्टवेयर टूल नहीं है। यह रेवेन्यू मॉडल और वर्कफोर्स स्ट्रक्चर को भी प्रभावित कर रही है।
एआई को भारतीय आईटी कंपनियों के लिए केवल खतरे के रूप में देखना सही नहीं होगा।
टीसीएस ने क्यू1 एफवाई27 में 2.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की एनुअलाइज्ड एआई रेवेन्यू रन-रेट रिपोर्ट की। कंपनी ने एआई-लेड ट्रांसफॉर्मेशन से जुड़े कई बड़े डील्स भी घोषित किए। इनमें 800 मिलियन अमेरिकी डॉलर का एक ग्लोबल एआई-लेड बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन डील शामिल है।
इंफोसिस ने भी अपने क्यू1 एफवाई27 में एआई रेवेन्यू को कुल रेवेन्यू का 8.2 प्रतिशत बताया और 3.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के लार्ज डील विंस दर्ज किए। कंपनी ने एफवाई27 के लिए 1.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत कॉन्स्टेंट-करेंसी रेवेन्यू ग्रोथ गाइडेंस दी थी।
इसका मतलब यह है कि एआई एक तरफ पुराने कामों की जरूरत घटा रही है, तो दूसरी तरफ एआई इम्प्लीमेंटेशन, डेटा मॉडर्नाइजेशन, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी और एंटरप्राइज ट्रांसफॉर्मेशन जैसे नए काम पैदा कर रही है।
आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है।
यहां भी तस्वीर सीधी नहीं है। सभी आईटी जॉब्स खत्म नहीं हो रही हैं। बदलाव जॉब प्रोफाइल में ज्यादा दिखाई दे रहा है।
रूटीन कोडिंग, बेसिक टेस्टिंग, रिपीटेटिव सपोर्ट और कुछ प्रोसेस-ओरिएंटेड कामों में ऑटोमेशन का दबाव बढ़ रहा है। इसके उलट एआई इंजीनियरिंग, डेटा, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड, प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग और डोमेन-स्पेसिफिक टेक्नोलॉजी स्किल्स की मांग बढ़ रही है।
यानी समस्या केवल जॉब्स की संख्या की नहीं है। स्किल मिसमैच भी बड़ा मुद्दा बन रहा है।
एक कर्मचारी जिसके पास पुरानी टेक्नोलॉजी स्टैक का अनुभव है, उसके सामने रिस्किलिंग की जरूरत बढ़ रही है। कंपनियां भी फ्रेश हायरिंग के साथ इंटरनल ट्रेनिंग और स्किल ट्रांसफॉर्मेशन पर जोर दे रही हैं।
ऐसा कहना उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सही नहीं होगा।
टीसीएस ने जून 2026 को समाप्त क्यू1 एफवाई27 में 9,279 एम्प्लॉयी की नेट एडिशन की और कुल वर्कफोर्स 593,798 तक पहुंची। कंपनी ने एआई और डिजिटल स्किल्स वाले टैलेंट पर भर्ती जारी रखने की बात कही।
इंफोसिस में 30 जून 2026 को 328,062 एम्प्लॉयी थे। कंपनी के क्यू1 अर्निंग्स कॉल के मुताबिक क्वार्टर के दौरान हेडकाउंट में 500 की कमी आई, हालांकि इसमें एक्विजिशन्स से जुड़े 2,000 से ज्यादा कर्मचारियों का प्रभाव भी शामिल था।
इसलिए आईटी एम्प्लॉयमेंट को समझने के लिए केवल लेऑफ्स या हायरिंग अनाउंसमेंट देखना पर्याप्त नहीं है। एट्रिशन, कैंपस हायरिंग, लेटरल हायरिंग, रिस्किलिंग और एआई प्रोडक्टिविटी
सभी को साथ देखना होगा।
भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा कारोबार विदेशी क्लाइंट्स से आता है। इसलिए अमेरिका और यूरोप की कंपनियों का टेक्नोलॉजी स्पेंडिंग सीधे भारतीय आईटी सेक्टर पर असर डालता है।
टीसीएस के क्यू1 एफवाई27 रेवेन्यू मिक्स में नॉर्थ अमेरिका की हिस्सेदारी 48.3 प्रतिशत और यूके की 17.2 प्रतिशत थी। इसी क्वार्टर में नॉर्थ अमेरिका की कॉन्स्टेंट-करेंसी ग्रोथ सालाना आधार पर 2.0 प्रतिशत रही, जबकि यूके में यह 0.6 प्रतिशत नीचे रही।
इससे पता चलता है कि भारतीय आईटी कंपनियों के लिए ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशंस कितनी महत्वपूर्ण हैं।
जब कंपनियां डिस्क्रिशनरी टेक्नोलॉजी स्पेंडिंग रोकती हैं या बड़े ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाती हैं, तो इंडियन आईटी फर्म्स के ऑर्डर पाइपलाइन और रेवेन्यू ग्रोथ पर असर पड़ता है।
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी जीसीसी का विस्तार भी आईटी इकोसिस्टम को बदल रहा है।
मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में अपने कैप्टिव टेक्नोलॉजी सेंटर्स खोल रही हैं। इसका मतलब है कि कई कंपनियां टेक्नोलॉजी, डेटा, एआई और इंजीनियरिंग टैलेंट को सीधे अपने संगठन के भीतर बिल्ड कर रही हैं।
इससे ट्रेडिशनल आईटी सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
लेकिन जीसीसी एक्सपैंशन भारतीय टेक्नोलॉजी वर्कफोर्स के लिए नए अवसर भी पैदा करता है। खासकर हाई-एंड इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और प्रोडक्ट डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में।
इसलिए आईटी सर्विसेज कंपनियों और जीसीसी के बीच एक तरफ कंपटीशन है, तो दूसरी तरफ दोनों भारतीय टेक्नोलॉजी टैलेंट मार्केट की मांग बढ़ा रहे हैं।
भारतीय आईटी सर्विसेज का पारंपरिक मॉडल काफी हद तक एम्प्लॉयी आवर्स और प्रोजेक्ट मैनपावर पर आधारित रहा है।
एआई प्रोडक्टिविटी इस समीकरण को बदल रही है।
यदि एक इंजीनियर एआई टूल्स की मदद से पहले की तुलना में ज्यादा आउटपुट तैयार करता है, तो क्लाइंट उसी काम के लिए पहले जितने मैनपावर आवर्स का भुगतान करने पर सवाल उठा
सकता है।
यहीं से प्राइसिंग प्रेशर शुरू होता है।
आईटी कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि प्रोडक्टिविटी बढ़ने से ग्राहक को फायदा मिले, लेकिन कंपनी के रेवेन्यू और मार्जिन भी सुरक्षित रहें।
इसलिए आउटकम-बेस्ड प्राइसिंग, मैनेज्ड सर्विसेज और एआई-लेड ट्रांसफॉर्मेशन जैसे नए कमर्शियल मॉडल महत्वपूर्ण हो रहे हैं।
टीसीएस और इंफोसिस के क्यू1 एफवाई27 रिजल्ट्स में एक महत्वपूर्ण बात दिखाई देती है। दोनों कंपनियों का कारोबार चल रहा है, लेकिन ग्रोथ का चरित्र बदल रहा है।
टीसीएस का क्यू1 एफवाई27 रेवेन्यू 7.624 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। एनुअलाइज्ड एआई रेवेन्यू 2.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंची। कंपनी का क्यू1 टोटल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू 9.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।
इंफोसिस ने क्यू1 एफवाई27 में 48,211 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया। कंपनी ने 3.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के लार्ज डील्स हासिल किए और एआई रेवेन्यू कुल रेवेन्यू का 8.2 प्रतिशत बताया।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि एआई ट्रांसफॉर्मेशन अब केवल प्रयोग या पायलट स्टेज की कहानी नहीं है। बड़े एंटरप्राइज कॉन्ट्रैक्ट्स में इसका व्यावसायिक इस्तेमाल बढ़ रहा है।
3 अक्टूबर 2026 तक सितंबर तिमाही के पूरे फाइनेंशियल रिजल्ट्स उपलब्ध नहीं हैं।
टीसीएस ने सितंबर 2026 क्वार्टर के रिजल्ट्स के लिए 8 अक्टूबर की तारीख तय की है। इंफोसिस के अनुसार क्यू2 एफवाई27 रिजल्ट्स 23 अक्टूबर 2026 को जारी होने हैं।
इसलिए सितंबर क्वार्टर को लेकर रेवेन्यू ग्रोथ, मार्जिन, हायरिंग या एआई बिजनेस पर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।
बाजार में एक्सपेक्टेशंस और एनालिस्ट एस्टिमेट्स अलग बात हैं। वेरिफाइड फाइनेंशियल रिजल्ट्स आने के बाद ही वास्तविक परफॉर्मेंस की तस्वीर साफ होगी।
पहला बदलाव एआई एडॉप्शन है। कंपनियां ट्रेडिशनल ऑटोमेशन से आगे बढ़कर एंटरप्राइज एआई और एजेंटिक एआई की तरफ जा रही हैं।
दूसरा बदलाव वर्कफोर्स का है। पुराने रिपीटेटिव रोल्स पर प्रेशर बढ़ रहा है, जबकि एआई, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी, डेटा और एडवांस्ड इंजीनियरिंग स्किल्स की जरूरत बढ़ रही है।
तीसरा बदलाव प्राइसिंग का है। क्लाइंट्स मैनपावर आवर्स की बजाय मेजरेबल प्रोडक्टिविटी और बिजनेस आउटकम्स पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
चौथा बदलाव जीसीसी एक्सपैंशन है। मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में अपनी टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग कैपेबिलिटीज सीधे बिल्ड कर रही हैं।
पांचवां बदलाव ग्लोबल डिमांड का है। अमेरिकी और यूरोपीय क्लाइंट्स का टेक्नोलॉजी स्पेंडिंग भारतीय आईटी कंपनियों की ग्रोथ के लिए अब भी निर्णायक है।
उपलब्ध आंकड़े इसे एक सामान्य सेक्टर-वाइड कोलैप्स के रूप में स्थापित नहीं करते।
इसके बजाय डेटा एक स्ट्रक्चरल ट्रांजिशन की तरफ इशारा करता है।
आईटी कंपनियों को एआई से नए रेवेन्यू अपॉर्च्युनिटीज मिल रहे हैं। साथ ही पुराने सर्विस मॉडल्स की इकोनॉमिक्स बदल रही है। कुछ रोल्स पर प्रेशर है, जबकि स्पेशलाइज्ड टेक्नोलॉजी स्किल्स की मांग बढ़ रही है।
इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि एआई आईटी जॉब्स खत्म करेगी या नहीं।
असल सवाल यह होगा कि एआई प्रोडक्टिविटी से पैदा होने वाले इकोनॉमिक गेन्स को कंपनियों, कर्मचारियों और क्लाइंट्स के बीच किस तरह डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है।
आईटी प्रोफेशनल के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश स्किल रिलिवेंस है।
सिर्फ किसी एक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का अनुभव लंबे समय तक पर्याप्त नहीं रहेगा। क्लाउड, एआई टूल्स, डेटा इंजीनियरिंग, साइबर सिक्योरिटी, सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर और डोमेन नॉलेज की समझ ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है।
एक्सपीरियंस्ड प्रोफेशनल्स के लिए भी रिस्किलिंग जरूरी हो रही है।
फ्रेशर्स के लिए कंपटीशन अलग तरह का है। एंट्री-लेवल रोल्स में एआई टूल्स प्रोडक्टिविटी बढ़ा रहे हैं, इसलिए कंपनियां ऐसे कैंडिडेट्स की तलाश करेंगी जो टेक्नोलॉजी के साथ एआई-असिस्टेड वर्कफ्लोज को भी समझते हों।
अक्टूबर 2026 में आने वाले सितंबर क्वार्टर रिजल्ट्स आईटी सेक्टर की अगली तस्वीर समझने में महत्वपूर्ण होंगे।
सबसे ज्यादा ध्यान रेवेन्यू ग्रोथ, लार्ज डील विंस, एट्रिशन, एम्प्लॉयी एडिशन, मार्जिन, एआई रेवेन्यू और एफवाई27 गाइडेंस पर रहेगा।
साथ ही यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एआई प्रोजेक्ट्स पायलट से प्रोडक्शन में कितनी तेजी से पहुंच रहे हैं और क्लाइंट्स उन प्रोजेक्ट्स के लिए कितना खर्च कर रहे हैं।
अगर एआई-लेड कॉन्ट्रैक्ट्स बढ़ते हैं लेकिन ट्रेडिशनल आईटी स्पेंडिंग कमजोर रहती है, तो सेक्टर का ग्रोथ मिक्स बदलता रहेगा।
अगर ग्लोबल एंटरप्राइज स्पेंडिंग सुधरती है, तो बड़े आईटी सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए डिमांड एनवायरनमेंट भी बदल सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।