SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों के बाद ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग उठी है। CEC को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी संसदीय प्रक्रिया जरूरी है।
Location | Date
नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
By Mohd Naved
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग के बीच बड़ा संवैधानिक सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। यह विवाद विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर सामने आई रिपोर्टों के बाद बढ़ा है। 23 सितंबर को सामने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी।
इसके बाद विपक्षी दलों और कुछ अन्य राजनीतिक संगठनों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े या पद से हटाने की मांग उठाई। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों के जवाब में कहा कि SIR समेत आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और अलग-अलग स्तर पर उठाए गए सवाल संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा थे।
ऐसे में इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को आखिर हटाया कैसे जा सकता है।
क्या ज्ञानेश कुमार को सीधे सरकार हटा सकती है?
इसका जवाब है, नहीं।
भारत का संविधान चुनाव आयोग को एक संवैधानिक संस्था का दर्जा देता है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, दिशा और नियंत्रण निर्वाचन आयोग के पास है। इसी अनुच्छेद के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की सुरक्षा सामान्य सरकारी पदों से अलग है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
यानी राष्ट्रपति के पास अपने स्तर पर CEC को हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। इसके लिए संसद की निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
कानून में CEC के हटाने का प्रावधान
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से जुड़ा मौजूदा कानून 2023 का Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act है।
इस कानून की धारा 11 में इस्तीफ़े और हटाने से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। CEC को हटाने के मामले में कानून संविधान के अनुच्छेद 324(5) से जुड़ी उस सुरक्षा को दोहराता है, जिसके तहत CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान प्रक्रिया से हटाया जाता है।
इसका मतलब यह है कि केवल राजनीतिक असहमति, किसी फैसले पर विवाद या इस्तीफ़े की सार्वजनिक मांग अपने आप CEC को पद से नहीं हटा देती।
हटाने की प्रक्रिया की पहली सीढ़ी क्या है?
प्रक्रिया संसद से शुरू होती है।
Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए संसद के किसी एक सदन में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है।
लोकसभा में ऐसे नोटिस पर कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है। केवल जरूरी संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर जुटा लेना अंतिम कार्रवाई नहीं है। प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को नोटिस स्वीकार करना होता है।
स्पीकर या सभापति की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति उपलब्ध सामग्री और परिस्थितियों पर विचार कर सकते हैं। कानून के तहत वे प्रस्ताव को स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार भी कर सकते हैं।
यही चरण CEC के खिलाफ प्रस्ताव के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
मार्च 2026 में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में ऐसी प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश हो चुकी है। लोकसभा सचिवालय के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक 12 मार्च 2026 को 130 लोकसभा सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस लोकसभा अध्यक्ष के सामने पेश किया गया था। बाद में अध्यक्ष ने इसे स्वीकार नहीं किया।
राज्यसभा में भी इसी अवधि में नोटिस दिया गया था। अप्रैल 2026 में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा संबंधित नोटिसों को स्वीकार नहीं किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाए तो क्या होता है?
अगर नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है, तो मामला जांच के अगले चरण में जाता है।
Judges (Inquiry) Act के तहत एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को शामिल किया जाता है। समिति आरोपों की जांच करती है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देती है।
यह चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CEC को हटाना केवल राजनीतिक प्रस्ताव पारित करने का मामला नहीं है। संविधान में हटाने का आधार साबित कदाचार या अक्षमता से जुड़ा है।
संसद में कितनी बड़ी बहुमत चाहिए?
यदि जांच समिति आरोपों को साबित मानती है, तो प्रस्ताव संसद के सामने आगे बढ़ सकता है।
इसके बाद दोनों सदनों को अलग-अलग प्रस्ताव पारित करना होता है।
यह साधारण बहुमत से नहीं होता।
संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार प्रस्ताव के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं। पहली, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत। दूसरी, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई बहुमत।
यानी दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत की जरूरत होती है।
इसके बाद राष्ट्रपति की भूमिका आती है
अगर दोनों सदन आवश्यक विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो राष्ट्रपति के सामने संसद का संबोधन प्रस्तुत किया जाता है।
इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करके CEC को पद से हटा सकते हैं।
इसलिए किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया कई संवैधानिक और संसदीय चरणों से होकर गुजरती है। केवल इस्तीफ़े की मांग, प्रदर्शन या राजनीतिक प्रस्ताव से पद समाप्त नहीं होता।
विवाद की मौजूदा पृष्ठभूमि क्या है?
मौजूदा विवाद का केंद्र SIR यानी Special Intensive Revision है। यह मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसके तहत निर्वाचन सूची में दर्ज मतदाताओं की जानकारी और पात्रता की जांच की जाती है।
23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों से जुड़े मामलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने ऐसे फैसलों पर सवाल उठाए जिन्हें उन्होंने अपने ज्ञान या मंजूरी के बिना जारी किए जाने का आरोप लगाया। यह रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई।
निर्वाचन आयोग का पक्ष क्या है?
निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट में बताए गए मतभेदों की व्याख्या अलग तरीके से की है।
आयोग के अधिकारियों ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की ओर से सवाल या सुझाव उठाया जाना संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR समेत उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए।
इसलिए मौजूदा स्थिति में दो अलग दावे सामने हैं। एक ओर मीडिया रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है। दूसरी ओर आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
इन दोनों बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है। आंतरिक आपत्ति दर्ज होना अपने आप किसी संवैधानिक या कानूनी उल्लंघन का अंतिम प्रमाण नहीं है। इसी तरह आयोग की ओर से फैसलों को सर्वसम्मत बताना भी उन दर्ज आपत्तियों के अस्तित्व के सवाल को अपने आप समाप्त नहीं करता।
इसी वजह से इस मामले में दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड और आगे होने वाली संसदीय या न्यायिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
इस्तीफ़ा और हटाया जाना एक ही बात नहीं
ज्ञानेश कुमार से इस्तीफ़ा मांगना और उन्हें संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हटाना दो अलग चीजें हैं।
इस्तीफ़ा स्वैच्छिक कदम होता है। दूसरी ओर हटाने की प्रक्रिया संसद और संविधान में तय संस्थागत व्यवस्था के जरिए चलती है।
यदि CEC स्वयं इस्तीफ़ा देते हैं, तो हटाने की संसदीय प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर वह इस्तीफ़ा नहीं देते, तो केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर उन्हें पद से हटाया नहीं जा सकता।
यही कारण है कि CEC का पद संवैधानिक सुरक्षा के लिहाज से सामान्य सरकारी पदों से अलग है।
अब आगे क्या होगा?
सितंबर 2026 में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक दबाव फिर बढ़ा है। विपक्षी दलों ने हटाने या इस्तीफ़े की मांग दोहराई है। कांग्रेस ने भी संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी की बात कही है।
इसके साथ ही कुछ संगठनों ने अलग से इस्तीफ़े की मांग और आंदोलन की चेतावनी दी है।
लेकिन आगे की संवैधानिक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि संसद में कोई नया औपचारिक नोटिस दाखिल होता है या नहीं, उसे संबंधित पीठासीन अधिकारी स्वीकार करते हैं या नहीं और उसके बाद जांच की प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग फिलहाल एक राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद का हिस्सा है। उन्हें पद से हटाने के लिए संविधान ने अलग और कठोर प्रक्रिया तय की है।
अनुच्छेद 324(5) CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी हटाने की सुरक्षा देता है। संसद में आवश्यक संख्या के सांसदों का नोटिस, स्पीकर या सभापति की स्वीकृति, जांच समिति की प्रक्रिया, दोनों सदनों में विशेष बहुमत और अंत में राष्ट्रपति की कार्रवाई, ये इसके प्रमुख चरण हैं।
मार्च 2026 में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू करने वाला नोटिस लोकसभा में स्वीकार नहीं किया गया था। सितंबर में SIR को लेकर सामने आई नई रिपोर्टों के बाद यह मुद्दा फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
फिलहाल सबसे अहम तथ्य यही है कि इस्तीफ़े की मांग और संवैधानिक रूप से पद से हटाया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। अंतिम स्थिति आगे होने वाली आधिकारिक संसदीय कार्रवाई और उपलब्ध दस्तावेजों से तय होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।