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मूंगफली के बाद गेहूं की खेती से बढ़ सकती है किसानों की आमदनी, जानिए फसल चक्र का तरीक

Neelam Saini • 2026-10-01 16:44:28
मूंगफली के बाद गेहूं की खेती से बढ़ सकती है किसानों की आमदनी, जानिए फसल चक्र का तरीक

नई दिल्ली। किसानों के लिए खेती की लागत को नियंत्रित करना और उपलब्ध जमीन से बेहतर उत्पादन हासिल करना अहम चुनौती है। ऐसे में फसल चक्र यानी एक ही खेत में अलग-अलग मौसमों में क्रम से फसलें उगाने की तकनीक उपयोगी हो सकती है। मूंगफली के बाद गेहूं की खेती भी कुछ कृषि परिस्थितियों में अपनाई जा सकती है। हालांकि, इससे आमदनी दोगुनी होने का दावा हर किसान और हर क्षेत्र के लिए सही नहीं माना जा सकता।

किसानों को इस फसल प्रणाली को अपनाने से पहले मूंगफली की कटाई का समय, गेहूं की बुवाई की उपयुक्त अवधि, मिट्टी में नमी, सिंचाई की उपलब्धता और दोनों फसलों की लागत का आकलन करना चाहिए।


क्या मूंगफली के बाद गेहूं उगाना संभव है?


मूंगफली दलहनी कुल की तिलहनी फसल है, जबकि गेहूं अनाज वाली फसल है। अलग-अलग प्रकृति की फसलों को क्रम से उगाने से खेत के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की संभावना बनती है।

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की फसल चयन संबंधी जानकारी में भी फसल चक्र के दौरान दलहनी और गैर-दलहनी फसलों को क्रम से लगाने के सिद्धांत का उल्लेख है। हालांकि, किसी खास खेत में मूंगफली के बाद गेहूं का चुनाव स्थानीय जलवायु और फसल कैलेंडर के अनुसार करना चाहिए।


1. सबसे पहले मूंगफली की कटाई का समय देखें


गेहूं की बुवाई के लिए खेत खाली होने का समय बहुत महत्वपूर्ण है। यदि मूंगफली की खुदाई देर से होती है, तो गेहूं की बुवाई में भी देरी हो सकती है। इससे फसल की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।

इसलिए किसान मूंगफली की ऐसी किस्म और बुवाई का समय चुनें, जिससे कटाई के बाद अगली फसल लगाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। यह योजना क्षेत्र की जलवायु और उपलब्ध किस्मों को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए।


2. खेत तैयार करने से पहले मिट्टी की जांच कराएं


मूंगफली की कटाई के बाद खेत में बची फसल के अवशेषों का उचित प्रबंधन करें। इसके बाद मिट्टी की स्थिति देखकर जुताई और खेत समतल करने का काम किया जा सकता है। गेहूं के अच्छे अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी और बीज के संपर्क के लिए उचित भुरभुरापन जरूरी है। जरूरत से ज्यादा जुताई करने से बचें और खेत की मौजूदा स्थिति के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें।


3. गेहूं की बुवाई सही समय पर करें


गेहूं की बुवाई की उपयुक्त अवधि क्षेत्र, तापमान, सिंचाई की सुविधा और किस्म पर निर्भर करती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की रबी कृषि सलाह में भी गेहूं की बुवाई का समय सिंचित, असिंचित और देर से बोई जाने वाली फसल की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग बताया गया है।

इसलिए केवल मूंगफली की कटाई पूरी होने के आधार पर गेहूं की बुवाई न करें। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से यह पुष्टि कर लें कि आपके क्षेत्र में उस समय गेहूं की बुवाई उपयुक्त है या नहीं।


4. बीज और खाद का चयन मिट्टी के अनुसार करें


गेहूं की ऐसी प्रमाणित किस्म चुनें जो आपके क्षेत्र की जलवायु और बुवाई की अवधि के अनुकूल हो। बीज की मात्रा, बीज उपचार और खाद की खुराक के लिए कृषि विभाग की अनुशंसाओं का पालन करें।मूंगफली दलहनी फसल होने के बावजूद यह मान लेना उचित नहीं है कि उसके बाद गेहूं को नाइट्रोजन या अन्य पोषक तत्वों की जरूरत नहीं होगी। खाद की वास्तविक आवश्यकता मिट्टी की जांच, पिछली फसल में दिए गए पोषक तत्वों और गेहूं की किस्म के आधार पर तय की जानी चाहिए।


5. सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान


गेहूं की फसल में समय पर सिंचाई महत्वपूर्ण होती है। मूंगफली की फसल के बाद खेत में बची नमी का आकलन करें और आगे की सिंचाई की योजना बनाएं।खरपतवारों को समय पर नियंत्रित करना भी जरूरी है, क्योंकि वे फसल के साथ पानी, पोषक तत्वों और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। सिंचाई का अंतराल मिट्टी के प्रकार, मौसम और उपलब्ध पानी के अनुसार तय किया जाना चाहिए।


6. क्या इससे किसानों की आमदनी दोगुनी हो सकती है?


मूंगफली के बाद गेहूं उगाने से एक ही खेत से दो अलग-अलग फसलों का उत्पादन लेने की संभावना बन सकती है। लेकिन दो फसलें लेने का अर्थ यह नहीं है कि शुद्ध आमदनी अपने आप दोगुनी हो जाएगी।

आमदनी का आकलन करते समय किसानों को निम्नलिखित बातों का हिसाब रखना चाहिए! मूंगफली और गेहूं से प्राप्त कुल उत्पादन।

दोनों फसलों के बीज, खाद, मजदूरी और मशीनों का खर्च।

सिंचाई, कटाई, खुदाई और परिवहन की लागत।

स्थानीय मंडी में फसलों के बिक्री भाव।

मौसम और उत्पादन में संभावित नुकसान।

दोनों फसलों की बिक्री से हुई कुल कमाई में सभी खर्च घटाने के बाद ही वास्तविक लाभ का पता चलेगा। किसी किसान की आमदनी दोगुनी होने का दावा करने के लिए संबंधित क्षेत्र के उत्पादन, लागत और बिक्री के तुलनात्मक आंकड़े जरूरी हैं।


7. बुवाई से पहले कृषि विशेषज्ञ से सलाह क्यों जरूरी है?


भारत के अलग-अलग हिस्सों में मूंगफली की खेती का मौसम और फसल चक्र अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, ICAR के अंतर्गत केंद्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान की जानकारी में गोवा की परिस्थितियों में मूंगफली की रबी खेती और बची हुई मिट्टी की नमी के इस्तेमाल का उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि फसल का समय स्थानीय कृषि परिस्थितियों से जुड़ा होता है।इसलिए किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से मिट्टी, किस्म, बुवाई की तारीख और सिंचाई संबंधी जानकारी लें। बिना स्थानीय परिस्थितियों का आकलन किए किसी दूसरे राज्य की कृषि सलाह को सीधे अपनाना उचित नहीं होगा।


निष्कर्ष


मूंगफली के बाद गेहूं की खेती कुछ क्षेत्रों में खेत का बेहतर उपयोग करने और अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त करने का विकल्प बन सकती है। लेकिन इसकी सफलता समय पर कटाई, उपयुक्त बुवाई, मिट्टी की नमी, सिंचाई और लागत प्रबंधन पर निर्भर करेगी। किसान पहले अपने क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों का आकलन करें और उसके बाद ही इस फसल चक्र को अपनाने का निर्णय लें।


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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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