World
हूती कौन हैं, सऊदी अरब को क्यों बना रहे निशाना, मदद के लिए ब्रिटेन ने क्यों बढ़ाया हाथ?
Harish Qureshi
•
2026-09-22 11:34:25
यमन के हूती समूह के सऊदी अरब पर मिसाइल-ड्रोन हमलों के बीच ब्रिटेन ने सऊदी विमानों को रक्षात्मक एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सहायता देने की मंजूरी दी है।
रियाद/सना/लंदन | 22 सितंबर 2026
By Mohd Haris
सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच ब्रिटेन की सैन्य मदद
यमन के हूती आंदोलन और सऊदी अरब के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। हाल के हफ्तों में हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के शहरों, सैन्य ठिकानों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने वाले मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। ब्रिटेन ने अब सऊदी अरब की मदद के लिए सीमित सैन्य सहायता को मंजूरी दी है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने 21 सितंबर को बताया कि सऊदी अरब ने सैन्य सहायता का अनुरोध किया था। इसके बाद ब्रिटेन ने रॉयल एयर फोर्स के जरिए सऊदी विमानों को रक्षात्मक एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग उपलब्ध कराने का फैसला किया। यह सहायता सऊदी विमानों की हवाई अभियानों के दौरान उड़ान अवधि बढ़ाने में मदद करेगी।
यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। ब्रिटेन ने सऊदी अरब के लिए सीधे हूती ठिकानों पर हमला करने की घोषणा नहीं की है। मौजूदा घोषणा रक्षात्मक एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सहायता से जुड़ी है। इसे लंदन की तरफ से सीमित सैन्य समर्थन के तौर पर पेश किया गया है।
हूती कौन हैं?
हूती यमन का एक राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य आंदोलन है। इसका आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह है। इसका उद्भव उत्तरी यमन में जैदी शिया समुदाय के धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन के रूप में हुआ।
1990 के दशक में यह आंदोलन धार्मिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दों के साथ सामने आया। 2004 से हूतियों और यमनी सरकार के बीच सशस्त्र संघर्ष तेज हुआ। बाद के वर्षों में संगठन ने उत्तरी यमन में अपना प्रभाव बढ़ाया।
2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर नियंत्रण हासिल कर लिया। इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति अब्द-रब्बू मंसूर हादी को देश छोड़कर सऊदी अरब जाना पड़ा। 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक गठबंधन ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। इस संघर्ष ने यमन को लंबे गृहयुद्ध और गंभीर मानवीय संकट में धकेल दिया।
ईरान से हूतियों के संबंध कितने गहरे हैं?
हूतियों को ईरान के साथ रणनीतिक और सैन्य संबंधों वाला संगठन माना जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों ने कई मौकों पर ईरान पर हूतियों को हथियार, तकनीक या अन्य सैन्य सहायता देने का आरोप लगाया है।
हूती खुद को ईरान का महज प्रॉक्सी मानने की धारणा को खारिज करते रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार संगठन ईरान से वैचारिक और सैन्य समर्थन प्राप्त करता है, लेकिन उसकी अपनी राजनीतिक और सैन्य प्राथमिकताएं भी हैं।
22 सितंबर को G7 देशों के विदेश मंत्रियों ने भी ईरान से हूतियों को हथियार और समर्थन देना बंद करने की अपील की। G7 ने हूती हमलों को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चिंता बताया।
इसलिए हूती संघर्ष को केवल सऊदी अरब और यमन के बीच स्थानीय विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। इसमें यमन की घरेलू सत्ता की लड़ाई, सऊदी सुरक्षा हित, ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव और लाल सागर की समुद्री सुरक्षा सभी जुड़े हुए हैं।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच विवाद क्यों है?
सऊदी अरब और हूतियों का संघर्ष यमन के सत्ता संकट से निकला। सना पर हूतियों के कब्जे और राष्ट्रपति हादी की सरकार के कमजोर होने के बाद रियाद ने सैन्य हस्तक्षेप किया।
सऊदी अरब की प्रमुख चिंता अपनी दक्षिणी सीमा की सुरक्षा रही है। यमन की उत्तरी सीमा सीधे सऊदी क्षेत्र से लगती है। हूती मिसाइल और ड्रोन क्षमता बढ़ने के साथ यह खतरा सऊदी सुरक्षा नीति का प्रमुख मुद्दा बन गया।
2015 के बाद वर्षों तक सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाता रहा। 2022 में एक युद्धविराम के बाद संघर्ष में अपेक्षाकृत कमी आई, लेकिन स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं निकला। 2026 में तनाव फिर बड़े स्तर पर बढ़ गया।
जुलाई 2026 से फिर क्यों बढ़ा तनाव?
ब्रिटेन के विदेश, राष्ट्रमंडल एवं विकास कार्यालय के अनुसार 13 जुलाई 2026 से हूतियों ने सऊदी अरब के कई शहरों, हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं।
ब्रिटिश सरकार ने अबहा, जिजान, नजरान, ताइफ, जेद्दा और यानबू जैसे स्थानों का उल्लेख किया है। FCDO ने सऊदी अरब-यमन सीमा के पास यात्रा को लेकर भी चेतावनी जारी की है।
10 सितंबर को ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कहा कि हूतियों के हमलों में नागरिक और ऊर्जा बुनियादी ढांचा भी निशाने पर आया है। लंदन ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब से गुजरने वाले व्यापारिक मार्गों पर इसके असर को लेकर चिंता जताई।
रियाद पर हालिया हमले में क्या हुआ?
19 सितंबर को हूतियों ने रियाद में संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने वाले मिसाइल और ड्रोन हमलों की जिम्मेदारी लेने का दावा किया।
रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अधिकारियों ने कहा कि रियाद की तरफ आने वाली एक मिसाइल को इंटरसेप्ट किया गया। हमले के दौरान राजधानी के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास आग और धुएं के दृश्य सामने आए। हूतियों ने यानबू में सऊदी अरामको की एक सुविधा पर हमले का भी दावा किया। इन दावों के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
इससे पहले ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था कि हूती हमलों में 13 नागरिक घायल हुए हैं और घरों तथा आवासीय इलाकों को नुकसान पहुंचा है।
ब्रिटेन सऊदी अरब की मदद क्यों कर रहा है?
लंदन ने सऊदी अरब की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को अपने फैसले का प्रमुख आधार बताया है।
ब्रिटिश सरकार पहले से ही हूती हमलों को लाल सागर और बाब अल-मंदेब में स्वतंत्र नौवहन के लिए खतरा बताती रही है। ब्रिटेन ने यमन मैरीटाइम सिक्योरिटी पार्टनरशिप के जरिए समुद्री सुरक्षा सहयोग भी बढ़ाया है। ब्रिटिश संसद में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार इस साझेदारी में सऊदी अरब समेत कई देश शामिल हैं और ब्रिटेन ने इसके लिए 4 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई है।
नए फैसले में सऊदी विमानों को एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग देने की बात है। इसका सैन्य महत्व यह है कि लड़ाकू विमान हवा में ईंधन भरकर ज्यादा समय तक ऑपरेशन क्षेत्र में रह सकते हैं।
लेकिन इसे सीधे ब्रिटिश लड़ाकू विमानों द्वारा हूती ठिकानों पर हमले के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में ब्रिटेन ने फिलहाल रक्षात्मक रिफ्यूलिंग सहायता की बात कही है।
अमेरिका की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
सऊदी अरब ने अमेरिका समेत कई सहयोगियों से मदद मांगी है। रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब के एयर-डिफेंस इंटरसेप्टर स्टॉक पर दबाव बढ़ा है और रियाद ने ब्रिटेन, फ्रांस, पाकिस्तान तथा मिस्र समेत अन्य देशों से सहायता की मांग की है।
अमेरिका ने हूतियों के खिलाफ सीधे नए हमले शुरू करने के मामले में अधिक सतर्क रुख अपनाया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ प्रस्तावित हवाई हमलों को अंतिम समय में रोक दिया।
यही वजह है कि ब्रिटेन का सीमित सैन्य समर्थन मौजूदा संकट में महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि ब्रिटिश सहायता की वास्तविक सैन्य सीमा और अवधि को लेकर उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी सीमित है।
बाब अल-मंदेब क्यों महत्वपूर्ण है?
बाब अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित एक अहम समुद्री जलमार्ग है। इसके जरिए जहाज लाल सागर, स्वेज नहर और आगे यूरोप तथा एशिया के बीच व्यापारिक मार्गों से जुड़ते हैं।
हूतियों की सैन्य गतिविधियां इस समुद्री रास्ते के लिए चिंता बढ़ाती हैं। ब्रिटेन ने लगातार कहा है कि हूती हमले अंतरराष्ट्रीय नौवहन और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं।
इसका सीधा असर ऊर्जा बाजार और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है। जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़े तो यात्रा का समय, ईंधन खर्च और बीमा लागत बढ़ सकती है।
मानवीय संकट का दूसरा पहलू
सऊदी सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर चर्चा के बीच यमन के नागरिकों की स्थिति भी इस संकट का अहम हिस्सा है।
रिपोर्ट के अनुसार सितंबर में नए संघर्ष के कारण करीब 1.25 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चे हैं। मानवीय संगठनों ने भोजन, स्वास्थ्य सेवा, साफ पानी और आश्रय की जरूरत पर चिंता जताई है।
इसलिए सैन्य कार्रवाई बढ़ने का असर केवल सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। यमन में पहले से मौजूद मानवीय संकट पर भी इसका दबाव बढ़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में तीन मोर्चे अहम रहेंगे।
पहला, सऊदी अरब हूती हमलों के जवाब में अपनी सैन्य कार्रवाई कितनी बढ़ाता है।
दूसरा, ब्रिटेन की रक्षात्मक सहायता कितनी अवधि तक जारी रहती है और क्या दूसरे पश्चिमी या क्षेत्रीय देश भी इसी तरह की मदद देते हैं।
तीसरा, लाल सागर और बाब अल-मंदेब में समुद्री यातायात कितना प्रभावित होता है।
ब्रिटेन ने लगातार हूतियों से हमले और सैन्य escalation रोकने की अपील की है। साथ ही उसने सऊदी अरब और यमन की सुरक्षा तथा संप्रभुता की रक्षा के अधिकार का समर्थन किया है।
निष्कर्ष
हूती आंदोलन की मौजूदा ताकत को समझने के लिए यमन के लंबे राजनीतिक संकट, 2014 में सना पर कब्जे और 2015 से चले सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप को साथ देखना जरूरी है।
2026 में संघर्ष के फिर तेज होने से यह मामला दो देशों के बीच पुराने विवाद से आगे बढ़ गया है। सऊदी शहरों और ऊर्जा ढांचे पर हमले, लाल सागर की समुद्री सुरक्षा और बाब अल-मंदेब की रणनीतिक स्थिति ने इसे व्यापक क्षेत्रीय संकट बना दिया है।
ब्रिटेन का नया कदम सीमित सैन्य सहायता है, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व बड़ा है। लंदन ने सऊदी सुरक्षा के समर्थन की अपनी नीति को दोहराया है, जबकि अमेरिका सीधे सैन्य हस्तक्षेप को लेकर अधिक सतर्क दिखाई दे रहा है।
आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सैन्य कार्रवाई बढ़ती है या कूटनीतिक रास्ता फिर खुलता है। फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम यही है कि यमन का संघर्ष सऊदी सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर एक साथ दबाव बढ़ाता रहे।
Harish Qureshi
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।