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दिल्ली में कृत्रिम बारिश क्यों नाकाम, क्या ये वाकई प्रदूषण का हल है?

None • 2025-10-29 15:54:42
दिल्ली में कृत्रिम बारिश क्यों नाकाम, क्या ये वाकई प्रदूषण का हल है?

कृत्रिम बारिश फेल, क्लाउड सीडिंग पर उठे सवाल

क्लाउड सीडिंग प्रयोग बेअसर, क्या यह दिखावा था?

दिल्ली में मंगलवार को आईआईटी कानपुर द्वारा की गई क्लाउड सीडिंग असफल रही। कम नमी और प्रतिकूल मौसम ने कृत्रिम बारिश की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। विशेषज्ञों ने इसे प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी हल मानने से इंकार किया।

📍दिल्ली 🗓️ 29 अक्टूबर 2025 ✍️ Asif Khan

शुरुआत: उम्मीदें और हकीकत

दिल्ली के धुंधले आसमान में मंगलवार को उम्मीदें थीं कि तकनीक से बारिश हो जाएगी। आईआईटी कानपुर की टीम ने एक विशेष विमान के ज़रिए सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रसायनों का छिड़काव किया ताकि कृत्रिम बारिश हो सके और हवा में फैला ज़हरीला धुआँ थोड़ा धुल जाए।
मगर मौसम ने साथ नहीं दिया। बादलों में नमी सिर्फ़ 15 से 20 प्रतिशत थी, जबकि ऐसी प्रक्रिया के लिए 50 प्रतिशत नमी चाहिए। नतीजा, आसमान से कुछ बूंदें भी नहीं गिरीं।

नमी की कमी ने किया सारा खेल ख़राब

वैज्ञानिकों के अनुसार, क्लाउड सीडिंग तब काम करती है जब बादलों में पर्याप्त वाष्प मौजूद हो। इस बार हवा सूखी थी, बादल बिखरे हुए थे। परिणाम यह हुआ कि रसायनों से न तो बूंदें जमीं पर उतरीं, न प्रदूषण में कोई बड़ा अंतर दिखा।
विमान ने बुराड़ी, करोल बाग और मयूर विहार जैसे इलाकों के ऊपर उड़ान भरी और लगभग आठ झोकों में रसायनों का छिड़काव किया। हर झोंके में करीब दो किलो तक मिश्रण इस्तेमाल हुआ, लेकिन अपेक्षित असर नहीं हुआ।

तकनीक का इतिहास और सीमाएँ

क्लाउड सीडिंग कोई नई तकनीक नहीं। यह लगभग 80 साल पुरानी विधि है जिसे सबसे पहले वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में विकसित किया गया था। इसका मकसद था बादलों में मौजूद सूक्ष्म कणों को रासायनिक यौगिकों से इस तरह जोड़ना कि वे वर्षा की बूंदों में बदल जाएं।
अमेरिका, चीन, और यूएई जैसे देशों में यह प्रयोग कई बार किया जा चुका है, लेकिन हर बार परिणाम मौसम पर निर्भर रहे हैं। जब नमी या तापमान अनुकूल नहीं होता, यह तकनीक बेअसर साबित होती है।

पर्यावरणविदों का विरोध

पर्यावरण विशेषज्ञों ने दिल्ली सरकार की इस कोशिश को “शॉर्ट-टर्म कॉस्मेटिक मेज़र” बताया है। उनका कहना है कि यह प्रदूषण घटाने का असली समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी राहत भर है।
आईआईटी दिल्ली की वायुमंडलीय विज्ञान विभाग की पूर्व प्रमुख प्रो. मंजू मोहन का कहना है कि “क्लाउड सीडिंग शोध के लिए तो सही है, पर इसे प्रदूषण नियंत्रण के हथियार की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं। बादल अपनी जगह से खिसक जाते हैं, बारिश कहीं और हो जाती है।”
पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा, “यह तरीका शहर-विशिष्ट है। दिल्ली के ऊपर बारिश करा भी दी जाए तो पड़ोसी राज्यों से आने वाला धुआँ क्या करेंगे? असली समाधान ज़मीन पर है — उत्सर्जन कम करना, वाहनों और फैक्ट्रियों पर नियंत्रण।”
ज्योति पांडे लवकारे ने कहा, “प्रदूषण कम करने का एक ही तरीका है — उत्सर्जन घटाना। बादलों में रसायन डालना दिखावे की बात है, असली काम नहीं।”

वैज्ञानिक दृष्टि से क्या गलत हुआ

नमी का स्तर बहुत कम था, जिससे बादल बूंदों में नहीं बदल पाए।

बादलों की ऊँचाई और दिशा अनुकूल नहीं थी, जिससे छिड़के गए रसायन फैल गए।

तापमान ज़्यादा था, जिससे संघनन प्रक्रिया धीमी पड़ गई।

हवा की गति तेज़ थी, रसायन एक जगह टिक नहीं पाए।

इन चारों वजहों ने मिलकर पूरे प्रयोग को असफल बना दिया।

क्या यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित है?

सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रसायन अगर नियंत्रित मात्रा में उपयोग न हों, तो मिट्टी और जल निकायों को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय में यह रसायन कृषि भूमि और पेयजल पर असर डाल सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन पर और अध्ययन की ज़रूरत है।

क्या यह प्रदूषण से राहत दे सकता है?

थोड़े समय के लिए हाँ — अगर बारिश हो जाए तो हवा में मौजूद कण नीचे बैठ जाते हैं और AQI कुछ दिनों के लिए बेहतर दिखता है। लेकिन जैसे ही बारिश बंद, हवा फिर वही।
प्रदूषण का असली इलाज सिर्फ़ उत्सर्जन को घटाना है — गाड़ियों का धुआँ, निर्माण स्थल की धूल, औद्योगिक धुआँ और कचरा जलाने की आदतें।

तकनीक की कोशिश सराहनीय है, लेकिन यह कोशिश प्रकृति के मूड पर निर्भर है। जब बादलों में नमी ही न हो तो कोई तकनीक काम नहीं कर सकती।
यह वैसा ही है जैसे किसी सूखे खेत में बीज डालकर उम्मीद करना कि फसल उग जाएगी — बिना पानी, बिना मिट्टी की नमी।
क्लाउड सीडिंग को चमत्कार नहीं, प्रयोग समझना चाहिए। यह प्रयोग हमें बताता है कि इंसान कितना भी आगे बढ़ जाए, प्रकृति का आखिरी शब्द हमेशा वही बोलती है।

कृत्रिम बारिश फेल, क्लाउड सीडिंग पर उठे सवाल

क्लाउड सीडिंग प्रयोग बेअसर, क्या यह दिखावा था?

दिल्ली में मंगलवार को आईआईटी कानपुर द्वारा की गई क्लाउड सीडिंग असफल रही। कम नमी और प्रतिकूल मौसम ने कृत्रिम बारिश की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। विशेषज्ञों ने इसे प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी हल मानने से इंकार किया।

📍दिल्ली 🗓️ 29 अक्टूबर 2025 ✍️ Asif Khan

शुरुआत: उम्मीदें और हकीकत

दिल्ली के धुंधले आसमान में मंगलवार को उम्मीदें थीं कि तकनीक से बारिश हो जाएगी। आईआईटी कानपुर की टीम ने एक विशेष विमान के ज़रिए सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रसायनों का छिड़काव किया ताकि कृत्रिम बारिश हो सके और हवा में फैला ज़हरीला धुआँ थोड़ा धुल जाए।
मगर मौसम ने साथ नहीं दिया। बादलों में नमी सिर्फ़ 15 से 20 प्रतिशत थी, जबकि ऐसी प्रक्रिया के लिए 50 प्रतिशत नमी चाहिए। नतीजा, आसमान से कुछ बूंदें भी नहीं गिरीं।

नमी की कमी ने किया सारा खेल ख़राब

वैज्ञानिकों के अनुसार, क्लाउड सीडिंग तब काम करती है जब बादलों में पर्याप्त वाष्प मौजूद हो। इस बार हवा सूखी थी, बादल बिखरे हुए थे। परिणाम यह हुआ कि रसायनों से न तो बूंदें जमीं पर उतरीं, न प्रदूषण में कोई बड़ा अंतर दिखा।
विमान ने बुराड़ी, करोल बाग और मयूर विहार जैसे इलाकों के ऊपर उड़ान भरी और लगभग आठ झोकों में रसायनों का छिड़काव किया। हर झोंके में करीब दो किलो तक मिश्रण इस्तेमाल हुआ, लेकिन अपेक्षित असर नहीं हुआ।

तकनीक का इतिहास और सीमाएँ

क्लाउड सीडिंग कोई नई तकनीक नहीं। यह लगभग 80 साल पुरानी विधि है जिसे सबसे पहले वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में विकसित किया गया था। इसका मकसद था बादलों में मौजूद सूक्ष्म कणों को रासायनिक यौगिकों से इस तरह जोड़ना कि वे वर्षा की बूंदों में बदल जाएं।
अमेरिका, चीन, और यूएई जैसे देशों में यह प्रयोग कई बार किया जा चुका है, लेकिन हर बार परिणाम मौसम पर निर्भर रहे हैं। जब नमी या तापमान अनुकूल नहीं होता, यह तकनीक बेअसर साबित होती है।

पर्यावरणविदों का विरोध

पर्यावरण विशेषज्ञों ने दिल्ली सरकार की इस कोशिश को “शॉर्ट-टर्म कॉस्मेटिक मेज़र” बताया है। उनका कहना है कि यह प्रदूषण घटाने का असली समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी राहत भर है।
आईआईटी दिल्ली की वायुमंडलीय विज्ञान विभाग की पूर्व प्रमुख प्रो. मंजू मोहन का कहना है कि “क्लाउड सीडिंग शोध के लिए तो सही है, पर इसे प्रदूषण नियंत्रण के हथियार की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं। बादल अपनी जगह से खिसक जाते हैं, बारिश कहीं और हो जाती है।”
पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा, “यह तरीका शहर-विशिष्ट है। दिल्ली के ऊपर बारिश करा भी दी जाए तो पड़ोसी राज्यों से आने वाला धुआँ क्या करेंगे? असली समाधान ज़मीन पर है — उत्सर्जन कम करना, वाहनों और फैक्ट्रियों पर नियंत्रण।”
ज्योति पांडे लवकारे ने कहा, “प्रदूषण कम करने का एक ही तरीका है — उत्सर्जन घटाना। बादलों में रसायन डालना दिखावे की बात है, असली काम नहीं।”

वैज्ञानिक दृष्टि से क्या गलत हुआ

नमी का स्तर बहुत कम था, जिससे बादल बूंदों में नहीं बदल पाए।

बादलों की ऊँचाई और दिशा अनुकूल नहीं थी, जिससे छिड़के गए रसायन फैल गए।

तापमान ज़्यादा था, जिससे संघनन प्रक्रिया धीमी पड़ गई।

हवा की गति तेज़ थी, रसायन एक जगह टिक नहीं पाए।

इन चारों वजहों ने मिलकर पूरे प्रयोग को असफल बना दिया।

क्या यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित है?

सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रसायन अगर नियंत्रित मात्रा में उपयोग न हों, तो मिट्टी और जल निकायों को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय में यह रसायन कृषि भूमि और पेयजल पर असर डाल सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन पर और अध्ययन की ज़रूरत है।

क्या यह प्रदूषण से राहत दे सकता है?

थोड़े समय के लिए हाँ — अगर बारिश हो जाए तो हवा में मौजूद कण नीचे बैठ जाते हैं और AQI कुछ दिनों के लिए बेहतर दिखता है। लेकिन जैसे ही बारिश बंद, हवा फिर वही।
प्रदूषण का असली इलाज सिर्फ़ उत्सर्जन को घटाना है — गाड़ियों का धुआँ, निर्माण स्थल की धूल, औद्योगिक धुआँ और कचरा जलाने की आदतें।

तकनीक की कोशिश सराहनीय है, लेकिन यह कोशिश प्रकृति के मूड पर निर्भर है। जब बादलों में नमी ही न हो तो कोई तकनीक काम नहीं कर सकती।
यह वैसा ही है जैसे किसी सूखे खेत में बीज डालकर उम्मीद करना कि फसल उग जाएगी — बिना पानी, बिना मिट्टी की नमी।
क्लाउड सीडिंग को चमत्कार नहीं, प्रयोग समझना चाहिए। यह प्रयोग हमें बताता है कि इंसान कितना भी आगे बढ़ जाए, प्रकृति का आखिरी शब्द हमेशा वही बोलती है।

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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