बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को गहरी चोट दी। सीटें भी घटीं, वोट शेयर भी। महागठबंधन अंदर ही अंदर बिखरा हुआ दिखा, और एनडीए संगठित रहा। राहुल गांधी की वोट चोरी मुहिम, तेजस्वी यादव की नौकरी राजनीति, और गठबंधन की आपसी खींचतान—तीनों ने मिलकर कांग्रेस की राह कठिन कर दी।
📍पटना 🗓️ 14 नवम्बर 2025✍️ आसिफ़ खान
बिहार की राजनीति की अपनी एक खास रूह होती है—यही रूह इस बार कांग्रेस के ख़्वाबों के रास्ते में खड़ी मिलती है। इस चुनाव में महागठबंधन की शिकस्त सिर्फ़ नंबरों की कहानी नहीं, बल्कि एक टूटे हुए तानेबाने, एक बेतरतीब सियासी रचना और एक ऐसे वोटर मूड की दास्तान है जिसने कांग्रेस को फिर हाशिये पर धकेल दिया। यहाँ जो तस्वीर बनती है, वह सिर्फ़ बिहार की नहीं बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय रणनीति पर भी सवाल उठाती है।
चलिये धीरे-धीरे समझते हैं कि आखिर कांग्रेस की तमन्नाएं धूल में क्यों मिलीं।
यह बात सबको मालूम थी कि महागठबंधन एनडीए के मुक़ाबले कम संगठित है, लेकिन जितना बिखराव रुझानों ने दिखाया, वह उम्मीद से कहीं ज़्यादा था। सीट बंटवारे में देरी, कैंडिडेट चयन पर टकराव, कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट और कांग्रेस-आरजेडी का अंदरूनी अविश्वास—ये तमाम चीज़ें एक-एक करके महागठबंधन के पैरों में पत्थर बांधती रहीं।
कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं, मगर उन 61 में भी 9 सीटें ऐसी थीं जहाँ उसके अपने साथी ही उसके ख़िलाफ़ मैदान में थे। यह कैसा गठबंधन था? अगर विपक्ष एनडीए को हराना चाहता था, तो खुद अपने घर में लड़ाई क्यों? यही वह बिंदु है जहाँ बिहार का मतदाता महागठबंधन को गंभीरता से नहीं ले पाया।
महागठबंधन की तरफ़ से एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम भी सामने नहीं आ सका। तेजस्वी यादव नौकरियों पर बोले, कांग्रेस वोट चोरी पर। आरजेडी नीतीश पर हमला करती रही, कांग्रेस चुनाव आयोग पर। इस असंगति ने पूरे कैम्पेन को दिशा हीन कर दिया।
राहुल गांधी ने सोचा कि वोटर लिस्ट गड़बड़ी और वोट चोरी के मुद्दे से बिहार में एक नया सियासी माहौल बनेगा। उन्होंने एसआईआर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की, रैलियाँ कीं, हाइड्रोजन बम बयान दिया, और खुद को चुनावी बहस के केन्द्र में रखा।
मसला यह नहीं कि उनका मुद्दा गलत था। मसला यह है कि बिहार का वोटर इससे जुड़ नहीं पाया।
उर्दू में एक मिसाल है—
“सही बात भी गलत वक़्त पर कही जाए तो असर खो देती है।”
बिहार में मतदाता की फ़िक्र बेरोज़गारी, महंगाई, लोकल विकास और जातीय समीकरणों पर थी। वोट चोरी के आरोप कर्नाटक और हरियाणा उदाहरणों से समझाए गए, जबकि बिहार की ज़मीन अलग थी। मुद्दा राष्ट्रीय था, लेकिन ज़रूरत स्थानीय थी।
और फिर वह लंबा गैप—जब आंदोलन का मूड बन गया था, तब राहुल अचानक विदेश चले गए। इसने कैम्पेन की आग ठंडी कर दी और विपक्ष के सामने नेतृत्व का संकट उभर आया।
तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को गेम-चेंजर बनाने की कोशिश की। नौकरी वाले नारे ने युवाओं के हिस्से में उत्साह भी जगाया। मगर गठबंधन के भीतर कांग्रेस की भूमिका बेहद सीमित दिखी। एक तरफ़ लालू यादव और तेजस्वी सीटों में अपना वर्चस्व बढ़ाते गए, दूसरी तरफ़ कांग्रेस को वह स्पेस नहीं मिला जिसकी उसे तलाश थी।
कई राजनीतिक जानकार कहते हैं कि महागठबंधन शुरुआती दिनों से ही एकतरफ़ा हो गया था। सारा कैंपेन तेजस्वी केंद्रित था, कांग्रेस सिर्फ़ एक सपोर्टिंग कास्ट बनकर रह गयी। उर्दू में कहें—
“किसी महफ़िल में अपनी आवाज़ बुलंद करनी हो तो पहले अपनी पहचान भी बुलंद रखनी पड़ती है।”
कांग्रेस इस पहचान को बना नहीं सकी।
एनडीए ने “जंगलराज” शब्द को एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। यह वही शब्द है जो बरसों पहले अदालत ने किसी और संदर्भ में कहा था, मगर राजनीतिक संदर्भ में यह आरजेडी के खिलाफ एक स्थायी इमेज बन गई।
हर चुनाव में तेजस्वी इस बोझ को ढोते हैं। और जब आरजेडी की इमेज प्रभावित होती है, तो कांग्रेस का भी नुकसान होता है, क्योंकि गठबंधन संयुक्त मूल्यांकन पर चलता है।
एनडीए ने तेजस्वी की नौकरी राजनीति को इस नैरेटिव से काट दिया—
“रोज़गार का वादा ठीक है, पर कानून-व्यवस्था किसके हाथ में दोगे?”
यही सवाल उन undecided वोटर्स को दूसरी तरफ़ खींच ले गया।
सीमांचल की 24 सीटें महागठबंधन की जान मानी जाती थीं। पर इस बार 18 सीटों पर एनडीए आगे दिखा। वजह?
जेडीयू की ग्राउंड पकड़, पसमांदा वोट का झुकाव, और नीतीश की वेलफेयर स्कीमें।
यह ट्रेंड कांग्रेस के लिए ख़तरनाक संकेत है, क्योंकि मुस्लिम वोट उसका पारंपरिक आधार रहा है।
अगर किसी गठबंधन का कोर वोट भी खिसकने लगे, तो खेल मुश्किल हो जाता है।
पार्टी लगातार चौथे विधानसभा चुनाव में 10 प्रतिशत वोट भी नहीं जुटा सकी। बिहार जैसे राज्य में यह आंकड़ा राजनीतिक प्रासंगिकता की बुनियादी शर्त है। नीचे जाते वोट शेयर का मतलब है कि पार्टी ज़मीनी स्तर पर न तो मजबूत है, न वोटर मन में ठहराव है।
दूसरे शब्दों में—
“कांग्रेस अब बिहार की मुख्य लड़ाई में नहीं, साइड स्टोरी में खड़ी दिखती है।”
यह सच्चाई तिक्त है, पर विश्लेषण ईमानदार होना चाहिए।
आलोचक कहते हैं कि कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पार्टी की सबसे बड़ी रुकावट पार्टी खुद है।
कैंडिडेट सिलेक्शन कमजोर, लोकल लीडरशिप सीमित, आखिरी समय में फैसले, और कैम्पेन नैरेटिव में असंगति।
ये सब चीजें बिहार के वोटर को यह अहसास दिलाती हैं कि कांग्रेस आज भी अपने पुराने दौर की छाया में जी रही है।
English में कहें—
“The party is fighting modern elections with a vintage toolkit.”
और यही वजह है कि बिहार के इतिहास में कांग्रेस का यह सबसे खराब चुनाव रहा।
जब विपक्ष बिखरा था, तभी एनडीए संगठित, कैंडिडेट चयन में अनुशासित और कैम्पेन में समन्वित रहा।
नीतीश कुमार की स्थिरता वाली इमेज और नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय अपील—दोनों ने मिलकर एक धारदार राजनीतिक पैकेज तैयार कर दिया।
मतदाता ने सोचा—
“कमजोर गठबंधन से बेहतर है मजबूत सरकार।”
यही भावना चुनाव के नतीजों में दिखी।
और यहाँ मैं आपका intellectual sparring partner बनते हुए कुछ कठिन सवाल सामने रखता हूँ:
क्या कांग्रेस बिहार में अपनी राजनीतिक पहचान दोबारा परिभाषित करने को तैयार है?
क्या वह गठबंधन राजनीति में बराबरी की हैसियत चाहती है या सिर्फ़ support role?
क्या राहुल गांधी की campaign strategy ground reality से disconnect दिखा रही है?
क्या कांग्रेस को Bihar में नए local faces और clan-free leadership लानी चाहिए?
क्या पार्टी अपने narrative को national बनाये या local?
इन सवालों से बचकर कुछ नहीं बदलेगा। सामना करना होगा।
क्योंकि तीन चीजें गायब थीं—
नेतृत्व का consistency
गठबंधन का coherence
और voter connect की clarity
अंत में यही बात समझें—
बुरे वक्त से उठने के लिए सिर्फ़ इरादा काफी नहीं, रास्ता भी साफ़ चाहिए।
इस चुनाव में कांग्रेस के पास इरादा था, पर रास्ता धुंधला था।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।