अखिलेश यादव ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, बीजेपी कार्यकर्ताओं जैसा काम करने का लगाया आरोप
यूपी पुलिस पर अखिलेश यादव का पुराना आरोप फिर चर्चा में, गोमतीनगर मामले से जुड़ा था बयान
पुलिस की निष्पक्षता पर अखिलेश यादव के सवाल, जानिए कब और किस संदर्भ में दिया था बयान
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लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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5 अगस्त 2024 का मूल बयान, 1 अक्टूबर 2026 के राजनीतिक संदर्भ में समीक्षा
✍️Wasi Siddiqui
यूपी में पुलिस बीजेपी कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रही’, अखिलेश यादव के बयान का संदर्भ
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता लंबे समय से सियासी बहस का विषय रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अलग-अलग मौकों पर प्रदेश की पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, “सरकार चाहती है कि पुलिस बीजेपी के कार्यकर्ताओं की तरह काम करे” वाला चर्चित बयान मौजूदा 1 अक्टूबर 2026 का बयान नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक अखिलेश यादव ने यह टिप्पणी 5 अगस्त 2024 को गोमतीनगर मामले के संदर्भ में की थी।
बयान का मूल संदर्भ
अगस्त 2024 में लखनऊ के गोमतीनगर क्षेत्र में हुई एक घटना को लेकर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि पुलिस ने मामले में आरोपियों की सूची तैयार की थी, लेकिन सरकार की ओर से कार्रवाई में कुछ समुदायों के नामों को लेकर सवाल खड़े हुए। इसी संदर्भ में उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पुलिस से बीजेपी कार्यकर्ताओं की तरह काम कराने की अपेक्षा कर रही है।
यह बयान अखिलेश यादव का राजनीतिक आरोप था। इसे पुलिस के पूरे विभाग की निष्पक्षता पर स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
अखिलेश यादव का आरोप क्या था
अखिलेश यादव का तर्क था कि पुलिस को कानून के मुताबिक सभी आरोपियों के खिलाफ समान कार्रवाई करनी चाहिए। उनके मुताबिक राजनीतिक दबाव के कारण कार्रवाई का स्वरूप प्रभावित नहीं होना चाहिए।
उनका आरोप मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित था कि प्रशासन और पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से अलग रहकर कानून के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। यह उनका राजनीतिक दृष्टिकोण और आरोप था, जिसकी पुष्टि अपने आप में किसी स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष के बराबर नहीं है।
2026 में भी पुलिस पर सवाल
यह मुद्दा 2026 में भी अखिलेश यादव की राजनीतिक बयानबाजी में दिखाई देता है। अगस्त 2026 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था पर भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था से जुड़े आरोप लगाए थे। उन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार पर निशाना साधा और पुलिस व्यवस्था में आम नागरिकों के भरोसे का सवाल उठाया।
सितंबर 2026 में रायबरेली में समाजवादी पार्टी और एबीवीपी से जुड़े कार्यकर्ताओं के बीच विवाद के बाद भी अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने सत्ता के प्रभाव और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। दूसरी तरफ पुलिस ने कहा कि उसका हस्तक्षेप कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए था और सोशल मीडिया पर चल रहे कुछ मारपीट संबंधी दावों को पुलिस ने भ्रामक बताया।
पुलिस की भूमिका पर बहस क्यों महत्वपूर्ण है
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस से राजनीतिक निष्पक्षता और कानून के समान अनुप्रयोग की अपेक्षा की जाती है। किसी भी सरकार के कार्यकाल में पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन किसी राजनीतिक दल के आरोप को स्थापित तथ्य मानने के लिए स्वतंत्र प्रमाण जरूरी होते हैं। किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत, एफआईआर, जांच, न्यायिक टिप्पणी या विभागीय कार्रवाई जैसी ठोस जानकारी सामने आए तो उसके आधार पर पुलिस की भूमिका का अलग से आकलन किया जा सकता है।
चुनावी राजनीति का संदर्भ
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच कानून-व्यवस्था और प्रशासन की निष्पक्षता का मुद्दा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना हुआ है। समाजवादी पार्टी लगातार पुलिस, प्रशासन, रोजगार, सामाजिक न्याय और मतदाता सूची जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है।
सितंबर 2026 में अखिलेश यादव ने रायबरेली से पीडीए रथ यात्रा के जरिए पार्टी के चुनावी अभियान को भी गति दी। ऐसे समय में पुलिस की कार्यप्रणाली पर उनके आरोपों को उत्तर प्रदेश के व्यापक चुनावी विमर्श के संदर्भ में देखा जा रहा है।
पुराने बयान को नए बयान के रूप में पेश करने से बचना जरूरी
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तारीख है। “पुलिस बीजेपी कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रही है” से जुड़ा चर्चित बयान 5 अगस्त 2024 का है। इसलिए इसे 1 अक्टूबर 2026 को अखिलेश यादव द्वारा दिया गया नया बयान बताना सही नहीं होगा।
हालांकि, 2026 में अखिलेश यादव ने पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर अलग-अलग मौकों पर नए आरोप लगाए हैं। इसलिए पुराने बयान की चर्चा को वर्तमान राजनीतिक संदर्भ से जोड़ा जा सकता है, लेकिन दोनों को एक ही बयान के रूप में प्रस्तुत करना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक तथ्य में अंतर
राजनीतिक बयान में लगाए गए आरोप और प्रशासनिक रिकॉर्ड अलग-अलग श्रेणी के तथ्य हैं। अखिलेश यादव का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस पर राजनीतिक प्रभाव है। पुलिस या सरकार की ओर से किसी मामले में अलग तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं तो दोनों पक्षों को अलग-अलग attribution के साथ रखना जरूरी है।
रायबरेली प्रकरण इसका हालिया उदाहरण है। अखिलेश यादव ने प्रशासन पर राजनीतिक पक्षधरता का आरोप लगाया, जबकि पुलिस ने अपनी कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया बताया।
आगे क्या
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता का मुद्दा राजनीतिक बहस में बने रहने की संभावना है। ऐसे मामलों में आगे की तस्वीर एफआईआर, जांच रिपोर्ट, न्यायिक कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होगी।
अखिलेश यादव के पुराने बयान का मौजूदा संदर्भ यही बताता है कि पुलिस की निष्पक्षता पर राजनीतिक बहस नई नहीं है। लेकिन किसी आरोप को तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए स्वतंत्र और दस्तावेजी प्रमाण जरूरी रहेंगे।
अखिलेश यादव का “पुलिस बीजेपी कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रही है” वाला चर्चित बयान 5 अगस्त 2024 का है और इसका तत्काल संदर्भ गोमतीनगर प्रकरण था।
2026 में भी उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर अलग-अलग मौकों पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों और पुलिस के पक्ष को अलग-अलग रखना जरूरी है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फिलहाल इसे राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक जवाब के बीच जारी बहस के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पुलिस की समूची कार्यप्रणाली पर अंतिम निष्कर्ष के रूप में।