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मरने का गम नहीं गम इस बात का यमराज ने रास्ता देख लिया

None 2024-06-11 21:07:45
मरने का गम नहीं गम इस बात का यमराज ने रास्ता देख लिया

देश की मीडिया सत्ता पक्ष प्रतिपक्ष जनता और अपने संस्थानों का विश्वास खोया है,क्या यह खोया हुआ विश्वास कभी वापस मिलेगा , एक पक्षीय भी रहकर किसी को फायदा नहीं दिला पाए और दूसरों के नजरों में उतर गए

~ सी लाल


देश की मीडिया सत्ता पक्ष प्रतिपक्ष जनता और अपने संस्थानों का विश्वास खोया है,क्या यह खोया हुआ विश्वास कभी वापस मिलेगा , एक पक्षीय भी रहकर किसी को फायदा नहीं दिला पाए , और दूसरों के नजरों में उतर गए , गोदी मीडिया के द्वारा एक पक्षीय इतने प्रचार के वजूद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस में कैसे चुनाव जीते यह किसी से छुपा नहीं होगा कितनी मेहनत करनी पड़ी यह भाजपा के नेताओं को भली भांति पता है, वाराणसी की हालत तो यह हुई जैसे लखनऊ में स्वर्गीय अखिलेश दास ने इतना घरों में उपहार दिया था उतना वोट नहीं मिला वही हाल बनारस और अन्य जगहों पर थी, कितनी मेहनत के बाद किसी तरह से सीट बचाई जा सकी,अफवाह और झूठ परोसने से जनता घूमने वाली नहीं है ,वह बहुत समझदार हो गई भले ही उसे 10 साल लग गए समझने में, जो सही है वह सामने आना चाहिए, विजन इंडिया में काम करने वाले बताते हैं।

उत्तर प्रदेश के अखबार और चैनल वालों के काम करने के तरीके निराले हैं, किसी शहर में पहुंचना सुबह 10:00 बजे उठना पार्टी वालों से मिलना एक दो रैली करना या फिर आकर होटल में आराम करना शाम को तरासने के चक्कर में रहना,चैनल वालों का काम चोच लड़वाना जिसमें बाराती और घराती होते थे, उससे क्या खबर निकल कर आएगी वह पार्टी के लोग होते हैं अपने-अपने दलों की बात करते हैं उससे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, एक जिला मुख्यालय से दूसरे जिला मुख्यालय को जोड़ने वाली सड़क पर चार जगह पूछते तो भी फैजाबाद और कई सीटों पर चौंकाने वाले चुनाव परिणाम जो आए उसे समय भी दिखना चाहिए था , यही मीडिया का कर्तव्य था , क्योंकि जनता को सब पता था।

उन्होंने बताया कि गाजियाबाद से बलिया तक 11000 किलोमीटर की यात्रा में केवल बुलंदशहर में एक गांव में कुछ लोग मिले थे जिन्होंने यह बताया की कुछ मीडिया वाले यहां पर आए थे चुनाव के बारे में चर्चा कर रहे थे ,यानी मीडिया वाले जिला मुख्यालय पर पार्टी वालों के व्यवस्था का इंतजार कर रहे थे ,उत्तर प्रदेश में चुनाव हारने के कई कारण थे,
अहंकार के खिलाफ, निजीकरण के खिलाफ , झूठ के खिलाफ, हिंदुत्व की आड़ में जातियों का शोषण हो रहा था, दलित पिछड़े और मुसलमान ठगी के शिकार हो रहे थे समान्य वर्ग के कंधे पर हाथ रखकर उनको केवल खुश किया जा रहा था मिल कुछ नहीं रहा था, और दो प्रतिशत व्यापारियों को पूरा प्रदेश सौप दिया गया था, उत्तर प्रदेश में गुजरात के बढ़ते ठेकेदारों से लोग नाराज थे, सरकारी नौकरियां समय से लोगों को नहीं मिल रही थी ,केवल प्रचार किया जा रहा था ,जिस तरह से विभागों का निजीकरण किया जा रहा था और लोगों को संविदा पर रखा जा रहा था लोगों में आक्रोश था , लोगों में इतना आक्रोश था कि लोग बनारस से ही परिवर्तन की तैयारी कर दिए थे इतना सब कुछ करने के बाद डीसीएम की डीसीएम खाली हो गई और कुछ लाख से चुनाव जीतना पड़ा,हिंदू मुस्लिम लोगों को एकदम पसंद नहीं था, लोग कहते थे हमें रोजगार चाहिए हिंदू मुस्लिम नहीं,जातिवाद का असर तो ऐसा था जिसका असर बलिया में देखने को मिला बलिया में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी कभी जातिवाद की बात नहीं बलिया की बात करते थे हालात इतने खराब हुए कि जातिवाद के कारण भूमिहार और ब्राह्मण को सहन नहीं हुआ और वह साइकिल की सवारी कर लिए ,जबकि दो विधानसभा गाजीपुर जिले में आती है , जनता में नौकरशाहों और पुलिसिया के खिलाफ आक्रोश था,दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल गए उत्तर प्रदेश वालों के अंदर लावा फूटने लगा और जब मुख्तार अंसारी की घटना को लेकर लोगों में ज्वालामुखी फूटने लगी , पीडीए वालों को लगा कि हमारे नेताओं को भी जेल में भेज कर ऐसा हो सकता है ,उनके अंदर आक्रोश पनपने लगा और दलितों पिछड़ों और मुसलमान का ध्रुवीकरण इंडिया गठबंधन की तरफ होने लगा।

जब पहले चरण में सोशल मीडिया पर यह खबर फैलने लगी की समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ईडी के दबाव में चुनाव प्रचार करने नहीं जा रहे हैं, फिर लोगों में गुस्सा देखने लायक था कि भाजपा के प्रत्याशी जाते थे तो लोग हां नहीं करते थे कि आपको वोट देंगे , पढ़े-लिखे लोगों को लगा कि 10 साल में हम लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई,इंडिया गठबंधन का टिकट वितरण भी परवान चढ़ने लगा,हालात यह थी कि अलीगढ़ मंडल में जिन एलार लोगों ने कल्याण सिंह जी को चंदा देते थे उस दौरान चलने के लिए वह लोग भी इंडिया गठबंधन की तरफ भागने लगे, इतना ही नहीं पढ़ा लिखा 50% लोधी एटा में इंडिया गठबंधन की तरफ चला गया,प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री दोनों उपमुख्यमंत्री स्मृति ईरानी के शब्द सुनने के लिए तैयार नहीं थे ,यहां तक की कौशांबी में केशव प्रसाद मौर्य का नाम लोग लेना नहीं चाहते थे,पुलिस का इतना आतंक था इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी प्रचार भी नहीं कर पा रहे थे, उनके पास पैसे नहीं थे वह केवल सोशल मीडिया से प्रचार कर रहे थे, हालात इतने खराब थे महाराजगंज में जो पैसा पंकज चौधरी ने अपना बस्ता लगाने के लिए दो ₹2000 दिए थे मोदी की भाजपा के कार्यकर्ताओं को कार्यकर्ताओं ने एक ₹1000 निकाल कर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को बस्ता लगाने के लिए दिये थें, चुनाव परिणाम और चौंकाने वाले होते,क्योंकि कुछ मतदाताओं को विश्वास नहीं था की जो वोट डालते हैं वह सही जगह जाता है इसीलिए वह निराश थे क्योंकि सोशल मीडिया पर अक्सर यही सुनने को मिलता था, अब लोगों को विश्वास हो गया की जो वोट डालेंगे वह सही जगह जाएगा अब तो बुढ़िया के मरने का गम नहीं यमराज ने रास्ता देख लिए अब आने वाले चुनाव और चौंकाने वाले चुनाव परिणाम आएंगे।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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