अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान कि “India is a friend, but it is hitting us hard with tariffs” अब सिर्फ़ व्यापार विवाद तक सीमित नहीं रहा। यह बयान दोनों देशों के बीच 40 अरब डॉलर से अधिक के रक्षा सौदों को सीधे प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है। सवाल यह है कि क्या यह टकराव सिर्फ़ चुनावी बयानबाज़ी है या फिर इसके पीछे बदलती जियो-पॉलिटिक्स की गहरी रणनीति छुपी है?
शीत युद्ध काल में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते अधिकतर संदेह और दूरी पर आधारित थे।
भारत का झुकाव रूस (सोवियत संघ) की ओर था, जबकि अमेरिका पाकिस्तान को मदद देता रहा।
2000 के बाद स्थितियाँ बदलीं — जॉर्ज बुश के दौर में सिविल न्यूक्लियर डील, और बराक ओबामा के दौर में रणनीतिक साझेदारी की नींव रखी गई।
अब भारत अमेरिका का स्ट्रैटेजिक पार्टनर है, खासकर Indo-Pacific Strategy और Quad Alliance (India, US, Japan, Australia) में।
लेकिन आज जब ट्रंप भारत पर "टैरिफ़ वार" छेड़े हुए हैं, तो यह रिश्तों की गहराई और भविष्य दोनों को चुनौती देता है।
व्हाइट हाउस में ट्रंप ने बार-बार कहा:
“India agreed to zero tariffs but still charging us high. This is unfair.”
ट्रंप का यह बयान उनके Domestic Political Agenda का हिस्सा है।
अमेरिका में किसान, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग लॉबी लगातार टैरिफ़ का दबाव बना रहे हैं।
ट्रंप इस मुद्दे को चुनावी कार्ड की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
परंतु जब यह व्यापार विवाद रक्षा सौदों से जुड़ता है, तो यह सिर्फ़ आर्थिक नहीं बल्कि सुरक्षा रणनीति पर असर डालता है।
1. MQ-9B Sky/Sea Guardian Drone Deal (≈ 4 अरब डॉलर)
भारत 31 ड्रोन खरीदने जा रहा है, 2029 से डिलीवरी शुरू होगी।
ये ड्रोन सर्विलांस के अलावा Hellfire Missiles और Laser-Guided Bombs से लैस होंगे।
टैरिफ़ विवाद से इनकी सप्लाई और लागत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
2. अपाचे हेलीकॉप्टर (600 मिलियन डॉलर)
भारत पहले ही 22 अपाचे ऑपरेट कर रहा है।
6 और हेलीकॉप्टरों की डील हुई है, पहला बैच मिल चुका है।
अगर टकराव बढ़ा, तो अगले बैच में देरी हो सकती है।
3. GE इंजन और LCA तेजस प्रोग्राम
HAL ने 99 इंजनों के लिए 730 मिलियन डॉलर की डील की थी।
नया समझौता 113 इंजनों के लिए लगभग 1 अरब डॉलर का है।
F414 इंजन डील (1.5 अरब डॉलर) – 80% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ।
अगर GE इंजन की सप्लाई रोकी गई तो पूरा तेजस Mk-2 प्रोग्राम खतरे में पड़ जाएगा।
4. P-8I Surveillance Aircraft और अन्य डील्स
भारत ने 12 P-8I खरीद लिए हैं और 6 और के लिए 3 अरब डॉलर की डील लंबित है।
स्ट्राइकर इन्फैंट्री व्हीकल्स (1.5 अरब डॉलर) और जैवलिन मिसाइल्स (500 मिलियन से 1 अरब डॉलर) पर भी बातचीत जारी है।
MRCA प्रोजेक्ट (20 अरब डॉलर) में अमेरिकी कंपनियाँ दौड़ में हैं, लेकिन फ्रांस का राफेल भारी पड़ रहा है।
Economic Impact: टैरिफ़ से भारतीय एक्सपोर्ट प्रभावित होंगे, खासकर एग्रीकल्चर और टेक्सटाइल।
Defense Risk: इंजन और ड्रोन डील्स पर असर पड़ने से भारतीय सेना की आधुनिकीकरण गति रुक सकती है।
Strategic Leverage: अमेरिका इस दबाव का इस्तेमाल भारत को अपने China Containment Strategy में और गहराई से जोड़ने के लिए कर सकता है।
भारत का दृष्टिकोण
भारत ने स्पष्ट कहा कि कृषि क्षेत्र टैरिफ़ समझौते से बाहर रहेगा।
रक्षा सौदों को व्यापारिक विवाद से अलग रखना चाहिए।
भारत ने अफवाहों को खारिज किया कि रक्षा डील्स पर कोई असर पड़ा है।
अमेरिका का दृष्टिकोण
ट्रंप प्रशासन के लिए यह मुद्दा सिर्फ़ "फेयर ट्रेड" नहीं बल्कि इलेक्शन पॉलिटिक्स है।
अमेरिका चाहता है कि भारत "प्रो-अमेरिकन" पोज़िशन ले और चीन से दूरी बनाए।
जियो-पॉलिटिकल एंगल
भारत रूस और फ्रांस जैसे देशों से हथियार खरीदकर अपनी Diversification Strategy जारी रखे हुए है।
अमेरिका भारत को पूरी तरह खो नहीं सकता क्योंकि वह Indo-Pacific Strategy का अहम हिस्सा है।
Status Quo Scenario
टैरिफ़ विवाद चलता रहेगा, लेकिन रक्षा डील्स को अलग रखा जाएगा।
रिश्तों में खटास रहेगी, पर ब्रेकडाउन नहीं होगा।
Conflict Scenario
अगर ट्रंप टैरिफ़ और डील्स दोनों पर कठोर रुख़ अपनाते हैं तो भारत फ्रांस-रूस की ओर झुकेगा।
अमेरिकी डिफेंस कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान होगा।
Reconciliation Scenario
अमेरिका भारत से "बैलेंस्ड डील" करेगा।
रक्षा सौदे फिर पटरी पर आएँगे, लेकिन भारत अपने "मल्टी-एलाईनमेंट" को जारी रखेगा।
भारत और अमेरिका का रिश्ता आज कठिन मोड़ पर है। यह विवाद सिर्फ़ व्यापारिक नहीं बल्कि जियो-पॉलिटिकल रणनीति को भी प्रभावित करता है।
भारत को अब यह तय करना है कि क्या अमेरिका उसका विश्वसनीय साझेदार है या सिर्फ़ चुनावी एजेंडे का हिस्सा। दूसरी ओर, अमेरिका भी यह समझता है कि भारत को खोना मतलब Indo-Pacific में चीन को बढ़त देना।
इसलिए सबसे संभावित रास्ता यही है कि दोनों देश "case-by-case strategy" अपनाएँगे। यानी ज़रूरी डील्स आगे बढ़ेंगी, जबकि विवादित मुद्दों पर धीमी बातचीत जारी रहेगी।
आख़िरी सवाल यही है: क्या यह विवाद ट्रंप प्रशासन तक सीमित रहेगा या यह दीर्घकालिक जियो-पॉलिटिकल री-अलाइनमेंट की शुरुआत है? जवाब आने वाले सालों में तय होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।