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न्यूटन बने "पायलट", SCERT की किताबों में 1678 गलतियां, ओडिशा सरकार ने शुरू की जवाबदेही की कार्रवाई

Shahana • 2026-06-29 07:18:02
न्यूटन बने "पायलट", SCERT की किताबों में 1678 गलतियां, ओडिशा सरकार ने शुरू की जवाबदेही की कार्रवाई

ओडिशा की नई SCERT पाठ्यपुस्तकों में बड़ी संख्या में तथ्यात्मक और संपादकीय त्रुटियां सामने आई हैं। इस विवाद ने शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता, अकादमिक जवाबदेही और सरकारी प्रकाशन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने जांच शुरू कर दी है जबकि विशेषज्ञ भविष्य में मजबूत गुणवत्ता नियंत्रण की मांग कर रहे हैं।

Location:- Bhubaneswar

Date:- 29 June 2026

Byline:- Shahana

ओडिशा की किताबों का विवाद केवल प्रिंटिंग मिस्टेक नहीं

स्कूल की किताबें किसी भी समाज की बुनियादी अकादमिक विरासत मानी जाती हैं। बच्चे जिस जानकारी को पहली बार पढ़ते हैं, वही आगे चलकर उनके ज्ञान और समझ की नींव बनती है। ऐसे में यदि सरकारी स्तर पर प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में बड़ी संख्या में तथ्यात्मक गलतियां सामने आएं, तो यह केवल एडिटिंग की चूक नहीं बल्कि पूरी अकादमिक प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल बन जाता है। ओडिशा में पहली से आठवीं कक्षा तक की नई SCERT पुस्तकों में सामने आई त्रुटियों ने ठीक यही बहस शुरू कर दी है।

हजारों गलतियों ने बढ़ाई चिंता

सरकारी समीक्षा के दौरान सामने आया कि विभिन्न विषयों की पुस्तकों में कुल 1678 त्रुटियां दर्ज की गईं। इनमें वर्तनी संबंधी भूलों से लेकर तथ्यात्मक गलतियां, नक्शों की त्रुटियां, चित्रों की गलत पहचान और ऐतिहासिक संदर्भों की अशुद्धियां शामिल हैं। सबसे अधिक चर्चा उस तथ्य ने बटोरी जिसमें महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन को एक "महान पायलट" के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी तरह कुछ पुस्तकों में कर्नाटक के विधान सौधा की तस्वीर को ओडिशा विधानसभा बताया गया, जबकि हम्पी के ऐतिहासिक स्मारक को कोणार्क सूर्य मंदिर के रूप में प्रकाशित कर दिया गया। ये उदाहरण केवल प्रतीकात्मक नहीं हैं। ये बताते हैं कि कंटेंट रिव्यू की कई परतें प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकीं।

सरकार की प्रतिक्रिया

मामला सार्वजनिक होने के बाद मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करने का निर्देश दिया। सरकार ने जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू की। राज्य सरकार ने संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई आरंभ की। साथ ही पुस्तकों में सुधार, एराटा जारी करने और भविष्य में प्रकाशन प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाने की घोषणा की गई। सरकार का कहना है कि छात्रों के हित सर्वोपरि हैं और त्रुटियों को शीघ्र ठीक किया जाएगा।

क्या यह केवल मानवीय भूल है

सरकारी प्रकाशनों में सीमित संख्या में प्रिंटिंग त्रुटियां होना असामान्य नहीं माना जाता। लेकिन जब हजारों त्रुटियां एक साथ सामने आती हैं, तब प्रश्न केवल टाइपिंग का नहीं रह जाता। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी पाठ्यपुस्तक को प्रकाशित करने से पहले विषय विशेषज्ञ, भाषा विशेषज्ञ, प्रूफरीडर और अंतिम संपादकीय समिति की कई स्तरों पर समीक्षा होनी चाहिए। यदि इतनी बड़ी संख्या में गलतियां प्रकाशित संस्करण तक पहुंच गईं, तो इसका अर्थ है कि गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली में गंभीर संस्थागत कमियां मौजूद थीं।

शिक्षा पर इसका असर

प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के छात्र पाठ्यपुस्तकों पर सबसे अधिक निर्भर रहते हैं। यदि शुरुआती स्तर पर तथ्य गलत पढ़ाए जाएं, तो आगे चलकर उन्हें सुधारना कठिन हो सकता है। शिक्षकों को भी अतिरिक्त समय देकर छात्रों को सही जानकारी समझानी पड़ सकती है। इससे शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित होती है और पाठ्यक्रम की गति भी धीमी पड़ सकती है। यही कारण है कि शिक्षा विशेषज्ञ केवल त्रुटि सुधार नहीं बल्कि पूरी समीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रहे हैं।

विपक्ष और सार्वजनिक प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को शिक्षा प्रशासन की गंभीर विफलता बताया है। छात्र संगठनों और अभिभावकों ने भी पुस्तकों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि सरकार का तर्क है कि त्रुटियां सामने आते ही सुधार प्रक्रिया शुरू कर दी गई और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई भी की जा रही है। दोनों पक्षों के तर्क लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। अंतिम मूल्यांकन जांच रिपोर्ट और सुधार प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निर्भर करेगा।

आगे की चुनौती

इस विवाद से एक बड़ा सबक सामने आता है। केवल पुस्तकों को दोबारा छाप देना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य में डिजिटल प्रूफिंग, स्वतंत्र अकादमिक समीक्षा, बाहरी विषय विशेषज्ञों की भागीदारी और बहुस्तरीय गुणवत्ता परीक्षण को संस्थागत रूप देना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इसी प्रकार की त्रुटियां दोबारा सामने आ सकती हैं।

ओडिशा की SCERT पुस्तकों का विवाद केवल एक राज्य तक सीमित घटना नहीं है। यह पूरे देश के लिए शिक्षा की गुणवत्ता, सरकारी प्रकाशन प्रणाली और अकादमिक जवाबदेही पर गंभीर आत्ममंथन का अवसर है।

सरकार द्वारा जांच और कार्रवाई की शुरुआत एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब भविष्य की पाठ्यपुस्तकें तथ्यात्मक रूप से विश्वसनीय, संपादकीय रूप से मजबूत और विद्यार्थियों के लिए पूरी तरह भरोसेमंद बन सकें।

 

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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