री-NEET परीक्षा के दौरान बिहार के लखीसराय में एक बड़े सॉल्वर गैंग का खुलासा हुआ है, जो 60 लाख रुपये तक लेकर उम्मीदवारों की जगह दूसरे लोगों को परीक्षा दिलवाता था। जांच में सामने आया कि गैंग ने बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम में सेंध लगाई और कुछ सुपरवाइजर्स को अपने प्रभाव में लिया। 21 जून को NTA और बिहार पुलिस को मिले गुप्त ईमेल के बाद कार्रवाई तेज हुई। मामले में MBBS के छात्रों की संलिप्तता भी सामने आई है, जिससे परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं।
री-NEET घोटाला: परीक्षा प्रणाली पर फिर सवाल
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। री-NEET परीक्षा के दौरान बिहार के लखीसराय से सामने आया सॉल्वर गैंग का मामला न सिर्फ परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह संगठित तरीके से शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाई जा रही है। यह मामला तब सामने आया जब जांच एजेंसियों को एक गुप्त ईमेल के जरिए परीक्षा केंद्र में गड़बड़ी की सूचना मिली। इसके बाद जो खुलासा हुआ, उसने पूरे सिस्टम को हिला कर रख दिया।
क्या हुआ था लखीसराय में
21 जून को दोपहर 12 बजे बिहार पुलिस मुख्यालय और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को एक महत्वपूर्ण गुप्त ईमेल प्राप्त हुआ। इस ईमेल में बताया गया कि लखीसराय के केंद्रीय विद्यालय परीक्षा केंद्र पर एक उम्मीदवार की जगह कोई और व्यक्ति परीक्षा दे रहा है। सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और जांच एजेंसियों ने तुरंत कार्रवाई की। मौके पर पहुंचकर जांच की गई तो पता चला कि एक संगठित गिरोह परीक्षा केंद्र के अंदर सक्रिय था। जांच में सामने आया कि अश्विनी कुमार नाम का व्यक्ति बायोमेट्रिक कर्मचारी बनकर केंद्र में दाखिल हुआ था। वह अंदर बैठकर वास्तविक उम्मीदवारों की जगह ‘सॉल्वर’ को बैठाने में मदद कर रहा था।
60 लाख रुपये में होती थी डील
जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई छोटा-मोटा नेटवर्क नहीं था। यह गैंग एक उम्मीदवार से 50 से 60 लाख रुपये तक लेकर उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने का दावा करता था। गैंग के सदस्य पहले अभ्यर्थियों से संपर्क करते, फिर उन्हें भरोसा दिलाते कि वे उनकी जगह बेहतर तैयारी वाले सॉल्वर को परीक्षा में बैठाएंगे। इसके लिए पूरी योजना बनाई जाती थी, जिसमें बायोमेट्रिक सिस्टम तक को हैक या मैनेज किया जाता था।
MBBS छात्रों की भूमिका
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसमें MBBS के कई छात्र भी शामिल पाए गए हैं। ये छात्र खुद मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन पैसे के लालच में दूसरों के लिए परीक्षा देने का काम कर रहे थे।
जांच में यह भी सामने आया कि ये छात्र परीक्षा के पैटर्न और सवालों की गहरी समझ रखते थे, जिससे वे आसानी से अच्छे अंक ला सकते थे। इसी वजह से सॉल्वर के तौर पर उनकी मांग ज्यादा थी।
बायोमेट्रिक सिस्टम में सेंध
इस पूरे घोटाले की सफलता का सबसे बड़ा कारण बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम में की गई सेंध थी। सूत्रों के अनुसार, 14 जून को एडमिट कार्ड जारी होने के बाद गैंग ने एक निजी एजेंसी ‘इनोवेटिव व्यू’ के कुछ सुपरवाइजर्स को अपने प्रभाव में ले लिया। इसके बाद उन्होंने असली उम्मीदवारों की पहचान को बदलने और सॉल्वर को अंदर बैठाने की योजना बनाई। बायोमेट्रिक सिस्टम को इस तरह से मैनेज किया गया कि फर्जी उम्मीदवार आसानी से प्रवेश कर सकें और किसी को शक भी न हो।
टाइमलाइन: कैसे खुला पूरा मामला
14 जून को एडमिट कार्ड जारी होते ही गैंग सक्रिय हो गया और परीक्षा केंद्रों पर अपनी पकड़ बनाने लगा। 21 जून को गुप्त ईमेल के जरिए NTA और बिहार पुलिस को जानकारी मिली। उसी दिन जांच शुरू हुई और मौके पर कार्रवाई की गई। प्रारंभिक जांच में कई संदिग्धों को हिरासत में लिया गया और धीरे-धीरे पूरे नेटवर्क का खुलासा होने लगा।
जनता और छात्रों की प्रतिक्रिया
इस घटना के सामने आने के बाद छात्रों और अभिभावकों में भारी आक्रोश है। सोशल मीडिया पर लोग परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। कई छात्रों का कहना है कि वे सालों की मेहनत से परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन इस तरह के घोटाले उनकी मेहनत को बेकार कर देते हैं। अभिभावकों ने भी सरकार और NTA से सख्त कार्रवाई की मांग की है।
राजनीतिक और सामाजिक असर
यह मामला अब राजनीतिक रंग भी ले चुका है। विपक्षी दलों ने सरकार पर परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है। साथ ही, यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा कैसे संभव हुआ। क्या इसमें सिर्फ कुछ लोग शामिल थे या यह एक बड़ा संगठित नेटवर्क है?
क्या सिर्फ यही मामला है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक उदाहरण हो सकता है। देशभर में ऐसे कई नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली कर रहे हैं। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि परीक्षा प्रणाली में तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सुधार की जरूरत है।
काउंटर आर्ग्युमेंट: सिस्टम पूरी तरह फेल नहीं
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस मामले का खुलासा होना ही सिस्टम की मजबूती को दर्शाता है। अगर गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई संभव हुई, तो इसका मतलब है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भविष्य में ऐसे मामलों को पूरी तरह रोका जा सकता है?
ग्राउंड रियलिटी: कैसे काम करता है सॉल्वर गैंग
ग्राउंड स्तर पर यह गैंग बेहद संगठित तरीके से काम करता है। पहले वे ऐसे छात्रों को टारगेट करते हैं जो मेडिकल में दाखिला चाहते हैं लेकिन तैयारी कमजोर होती है। फिर उन्हें पैसे के बदले गारंटी दी जाती है। इसके बाद परीक्षा केंद्रों पर अपने लोगों की मदद से पूरी व्यवस्था तैयार की जाती है।
संभावित परिणाम और सख्त कार्रवाई
इस मामले के सामने आने के बाद जांच एजेंसियों ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। संभावना है कि इसमें शामिल छात्रों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, NTA भी अपनी परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव कर सकता है।
भविष्य की दिशा
यह घटना भारत की परीक्षा प्रणाली के लिए एक चेतावनी है। अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो ऐसे घोटाले आगे भी सामने आ सकते हैं। टेक्नोलॉजी को और मजबूत करने, निगरानी बढ़ाने और दोषियों को सख्त सजा देने से ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
री-NEET सॉल्वर गैंग का यह खुलासा सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौती को उजागर करता है। जब मेडिकल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश के लिए इस तरह के तरीके अपनाए जाएं, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। अब देखना यह है कि सरकार और एजेंसियां इस मामले से क्या सीख लेती हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।