
India's role appears crucial in the US's new security strategy. The C-5 forum is marking a significant shift in India's diplomacy and global influence.
C-5 के मंच में भारत की स्थिति कितनी मज़बूत?
डोनाल्ड ट्रंप प्लान में C-5 का बढ़ता असर और घटता G-7
US की नई सुरक्षा स्ट्रैटेजी में भारत की भूमिका अहम दिखती है। C-5 मंच से भारत की कूटनीति और वैश्विक प्रभाव में बड़ा बदलाव दिख रहा है।
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
नई सोच या पुरानी हेजेमनी की वापसी?
अमेरिका की नई सुरक्षा स्ट्रैटेजी सामने आते ही किसी दोस्त की अचानक बदली हुई बॉडी लैंग्वेज की तरह दुनिया चौंक गई। दस्तावेज़ में जो खुलकर लिखा है, उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प वो हिस्से हैं जिन पर चुप्पी है। कई पंक्तियाँ ऐसा एहसास दिलाती हैं कि वॉशिंगटन अब अपनी पुरानी हेजेमनी को क़ायम रखने के बजाय एक नया पावर मोडेल गढ़ना चाहता है।
यहाँ एक सवाल उठता है: क्या ये बदलाव मजबूरी है या सूझबूझ? अगर अमेरिका खुद मान रहा है कि हमेशा का वर्चस्व न मुमकिन है, तो ये स्वीकारोक्ति एक तरह से सियासी परिपक्वता भी लगती है। मगर साथ में थोड़ा तजुर्बा ये भी कहता है कि हर बड़ी ताक़त अपने असल मक़सद को हमेशा मुलायम लफ़्ज़ों में पेश करती है।
यूरोप से दूरी या नई क़रीबी की तलाश?
दस्तावेज़ में सामने आया हिस्सा यूरोप से अमेरिकी सुरक्षा कम करने की बात करता है। लेकिन जो हिस्से छिपे रहे, उनमें “यूरोप को फिर महान बनाना” जैसी सियासी ख़्वाहिशें दर्ज हैं।
अजीब स्थिति है: एक तरफ़ अमेरिका कहता है कि यूरोप अपनी पॉलिसियों की वजह से “सभ्यतागत संकट” झेल रहा है, और दूसरी तरफ़ वो ऑस्ट्रिया, पोलैंड और इटली जैसे देशों के साथ गहरी पार्टनरशिप की बात करता है।
यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई दोस्त कहे कि तुम हालत ठीक नहीं, मगर फिर भी साथ बैठकर चाय पीने की ज़िद करे।
C-5: नया मंच या पुराना शक्ति खेल?
लीक ड्राफ्ट में सबसे दिलचस्प बात C-5 का प्रस्ताव है। पाँच बड़े जनसंख्या वाले मुल्क—अमेरिका, चीन, रूस, भारत और जापान—एक ही मंच पर? यह विचार सुनते ही लगता है कि ये दुनिया की नई जियो-पोलिटिकल आर्किटेक्चर की शुरुआत हो सकती है।
लेकिन ज़रा ठहरकर सोचना ज़रूरी है।
क्या इतना अलग-अलग मिज़ाज रखने वाले देश एक टेबल पर ईमानदारी से मसले हल करेंगे? या फिर ये मंच भी उसी तरह का पावर प्ले बन जाएगा जैसा पुरानी संस्थाओं में होता रहा है?
पहली बैठक के लिए इज़रायल और सऊदी अरब के रिश्तों को सुधारने का एजेंडा दर्ज है। ये बताता है कि अमेरिका की दिलचस्पी अभी भी वही है, बस तरीका बदला है।
G-7 का भविष्य और बढ़ती वैश्विक खींचतान
G-7 का असर पहले ही कम हुआ है। G-20 और ब्रिक्स जैसे मंच सक्रिय हैं। अगर C-5 बनता है, तो G-7 का ख़त्म होना सिर्फ़ कल्पना नहीं, बल्कि एक सम्भावना लगेगा।
यहाँ एक विरोधाभास भी है। ट्रंप प्रशासन रूस को G-8 में वापस लाने का समर्थक रहा है, मगर अब एक ऐसा मंच बना रहा है जिसमें रूस पहले से शामिल हो।
ये कुछ वैसा है जैसे टीम बनाते समय नए खिलाड़ियों को जोड़कर पुराने फॉर्मेट को धीरे-धीरे अप्रासंगिक बना दिया जाए।
भारत और वैश्विक शक्ति-संतुलन
भारत आज उस मुकाम पर खड़ा है जहाँ वाशिंगटन से बीजिंग, मॉस्को से टोक्यो तक हर शक्तिशाली देश उसकी strategic अहमियत को नई नज़र से देख रहा है; C-5 ढाँचे में भी भारत की वही “केंद्रीय भूमिका” उभरती है जो उसे एक ज़िम्मेदार, तजुर्बेकार और भरोसेमंद वैश्विक खिलाड़ी की तरह पेश करती है—यानी आज की दुनिया में भारत सिर्फ एक क्षेत्रीय ताक़त नहीं, बल्कि एक ऐसा मुल्क है जो तफ़सीली मुताले, शांत डिप्लोमेसी और मज़बूत नीतियों के ज़रिए नए geopolitical narrative को shape कर रहा है।
क्या यह दुनिया को ज़्यादा स्थिर करेगा?दस्तावेज़ कहता है कि अमेरिका अकेले दुनिया संभाल नहीं सकता। ये बात बिल्कुल हक़ीक़त के करीब लगती है। लेकिन साथ में ये भी लिखा है कि चीन और रूस को नेतृत्व नहीं दिया जा सकता।
यानी साझेदारी चाहिए, मगर बराबरी नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ पूरी स्ट्रैटेजी पर सवाल उठते हैं।
अगर वाकई स्थिरता चाहिए, तो क्या ताक़त की ये खींचतान दुनिया को राहत देगी या नया तनाव पैदा करेगी?
यही वह जगह है जहाँ हमें दोस्त की तरह झिड़ककर पूछना चाहिए: “सच में, ये प्लान काम करेगा? या बस एक नया पॉवर गेम है?”






