
स्पीकर की कुर्सी और सियासी साख का इम्तिहान
अविश्वास प्रस्ताव: प्रक्रिया, राजनीति और परसेप्शन
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ कांग्रेस और विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ एक संसदीय कदम नहीं है। यह सत्ता, प्रक्रिया, और भरोसे की राजनीति का टकराव है, जहां नियम, रवायत और नैरेटिव आमने सामने खड़े हैं।
कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। प्रस्ताव के पीछे संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन असली लड़ाई संसद की आत्मा, विपक्ष की आवाज और सत्ता के व्यवहार को लेकर है। यह प्रस्ताव पारित हो या न हो, इसके सियासी असर लंबे वक्त तक दिखेंगे।
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
संसद की कुर्सी और सियासत की गर्मी
लोकसभा स्पीकर की कुर्सी को अक्सर ठंडी, तटस्थ और सम्मानित माना जाता है। किताबों में यही पढ़ाया जाता है। लेकिन जब सदन के भीतर आवाजें दबने का एहसास हो, तो वही कुर्सी राजनीति के केंद्र में आ जाती है। कांग्रेस और विपक्ष का ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव इसी बेचैनी का नतीजा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि नियमों का पालन हुआ या नहीं। सवाल यह है कि क्या सदन में भरोसे का संतुलन टूट रहा है।
एक आम दर्शक के लिए यह पूरा मामला जटिल लग सकता है। लेकिन इसे यूं समझिए जैसे किसी मैच में अंपायर पर ही सवाल उठने लगें। मैच चलता रहेगा, स्कोर बनेगा, पर भरोसा डगमगाने लगता है। संसद में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
अविश्वास प्रस्ताव: कानून से आगे की बात
संविधान का अनुच्छेद 94 सी साफ है। स्पीकर को हटाने का रास्ता कठिन रखा गया है, ताकि कुर्सी की गरिमा बनी रहे। इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रस्ताव कभी सफल नहीं हुए। फिर भी हर बार इन्हें लाया गया, क्योंकि कई बार लड़ाई नतीजे से ज्यादा संदेश की होती है।
यहां विपक्ष जानता है कि संख्याबल उसके पक्ष में नहीं है। फिर भी प्रस्ताव लाया गया। मतलब साफ है। यह सत्ता पक्ष के लिए चेतावनी है और जनता के लिए संकेत। यह कहना कि स्पीकर निष्पक्ष नहीं हैं, एक भारी आरोप है। लेकिन विपक्ष का तर्क यह है कि जब नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता, जब निलंबन एकतरफा दिखता है, तो चुप रहना भी गुनाह बन जाता है।
राहुल गांधी का मुद्दा और बड़ा सवाल
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस में राहुल गांधी को बोलने नहीं दिए जाने की बात इस पूरे विवाद की धुरी है। तकनीकी वजहें गिनाई जा सकती हैं। नियमों की किताब खोली जा सकती है। लेकिन राजनीति तकनीक से नहीं, एहसास से चलती है।
विपक्ष कहता है कि यह सिर्फ एक नेता का सवाल नहीं था। यह विपक्ष की जगह का सवाल था। अगर सदन में सवाल उठाने की जगह सिकुड़ती है, तो बाहर सड़कों पर आवाज तेज होती है। इतिहास यही बताता है।
सत्ता का नजरिया भी समझना जरूरी
यह मान लेना आसान है कि सारी गलती सत्ता पक्ष की है। लेकिन एक ईमानदार विश्लेषण में दूसरा पहलू भी देखना होगा। सरकार का तर्क है कि सदन बार बार बाधित किया गया। नियम तोड़े गए। अध्यक्ष को व्यवस्था बनाए रखनी थी।
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास है। विपक्ष कहता है कि हमें बोलने नहीं दिया गया, इसलिए हंगामा हुआ। सत्ता कहती है कि हंगामे की वजह से बोलने का मौका नहीं मिला। यह वही चिकन और एग वाली बहस है, जहां शुरुआत का फैसला ही कहानी तय करता है।
स्पीकर की भूमिका: इंसान बनाम संस्था
स्पीकर कोई मशीन नहीं होता। वह भी इंसान है, राजनीतिक पृष्ठभूमि से आता है। लेकिन कुर्सी पर बैठते ही उससे अलहदगी की उम्मीद की जाती है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती और चुनौती दोनों है।
ओम बिरला के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने नियमों के मुताबिक काम किया। आलोचक कहते हैं कि नियमों की व्याख्या सत्ता के हक में झुकी रही। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। लेकिन समस्या तब होती है जब परसेप्शन हकीकत से ज्यादा भारी हो जाए।
टीएमसी और विपक्ष की दरार
इस पूरे घटनाक्रम में टीएमसी का अलग रुख भी ध्यान देने लायक है। विपक्ष एकजुट दिखना चाहता है, लेकिन अंदर की दरारें साफ दिखती हैं। अभिषेक बनर्जी का यह कहना कि हम मल्ल युद्ध नहीं चाहते, एक तरह से यह स्वीकार करना है कि लड़ाई जरूरी है, पर तरीके पर मतभेद हैं।
यह सवाल भी उठता है कि क्या अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की सामूहिक रणनीति है या कांग्रेस की अगुवाई में लिया गया एक सियासी जोखिम। जवाब आसान नहीं है।
इतिहास की परछाई
1954, 1966 और 1987। तीन बार स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आए और तीनों बार गिरे। हर बार सत्ता मजबूत थी और विपक्ष बिखरा हुआ। आज हालात अलग हैं, लेकिन सत्ता का गणित अब भी वही कहानी कहता है।
फिर भी इतिहास सिर्फ हार जीत नहीं सिखाता। वह यह भी बताता है कि हर प्रस्ताव ने उस दौर की राजनीति को परिभाषित किया। आज का प्रस्ताव भी आने वाले समय की भाषा तय करेगा।
जनता कहां खड़ी है
संसद की बहसें टीवी स्क्रीन और मोबाइल तक सीमित नहीं रहतीं। उनका असर चाय की दुकानों और व्हाट्सएप ग्रुप्स तक जाता है। आम आदमी यह नहीं गिनता कि अनुच्छेद कौन सा है। वह यह देखता है कि उसकी आवाज किसके जरिए सुनी जा रही है।
अगर उसे लगे कि विपक्ष को दबाया जा रहा है, तो सहानुभूति विपक्ष के साथ जाती है। अगर उसे लगे कि सदन को जानबूझकर ठप किया जा रहा है, तो नाराजगी विपक्ष पर गिरती है। यही वजह है कि दोनों पक्ष परसेप्शन की लड़ाई लड़ रहे हैं।
लोकतंत्र का असली टेस्ट
अविश्वास प्रस्ताव पारित होगा या नहीं, यह लगभग तय है। लेकिन असली टेस्ट कहीं और है। सवाल यह है कि क्या इसके बाद संसद ज्यादा खुली होगी या ज्यादा सख्त। क्या सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद की जगह बनेगी या दीवार और ऊंची होगी।
लोकतंत्र सिर्फ बहुमत से नहीं चलता। वह भरोसे से चलता है। और भरोसा टूटे तो कानून भी कमजोर पड़ने लगता है।
आखिर में
कांग्रेस और विपक्ष का यह कदम एक जोखिम है। ओम बिरला के लिए भी यह एक कठिन घड़ी है। लेकिन लोकतंत्र के लिए यह एक जरूरी बहस है। कुर्सी मजबूत तभी रहती है, जब उस पर बैठा इंसान सवालों से भागे नहीं, बल्कि उनका सामना करे।
यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं है। यह संसद की आत्मा की लड़ाई है। और यही बात इसे खास बनाती है।






