
Finance Minister Nirmala Sitharaman signals major customs reform before Budget 2026. Analysis by Shah Times.
बजट 2026 से पहले कस्टम्स में बड़े बदलाव की तैयारी
रिफॉर्म की अगली कड़ी: अब कस्टम्स सिस्टम की बारी
बजट 2026 से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का संकेत साफ है कि अगला बड़ा सुधार कस्टम्स सिस्टम में होगा। सरकार का दावा है कि प्रक्रियाएं सरल होंगी, दरें तर्कसंगत बनेंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह बदलाव ज़मीन तक उसी रफ्तार और असर के साथ पहुंचेगा, जैसा आयकर और जी एस टी में दिखा।
📍नई दिल्ली✍️Asif Khan
कस्टम्स सुधार का वादा और सियासी वक्त
जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह कहती हैं कि कस्टम्स सिस्टम को इतना सरल बनाया जाएगा कि वह बोझ जैसा न लगे, तो यह सिर्फ एक तकनीकी बयान नहीं रहता। यह सियासी समय का भी बयान बन जाता है। बजट 2026 से पहले यह संकेत दिया जा रहा है कि अब रिफॉर्म की अगली लकीर सीमा शुल्क के आंगन में खींची जाएगी। आम तौर पर कस्टम्स को लोग दूर की चीज समझते हैं। यह ऐसा कमरा है जहां आयात निर्यात करने वाले व्यापारी रोज जाते हैं, पर आम नागरिक कभी कभार ही झांकता है। लेकिन उसी कमरे में लिए गए फैसलों का असर मोबाइल से लेकर दवाइयों और गाड़ियों तक पर पड़ता है। इसलिए जब बदलाव की बात होती है, तो वह सिर्फ व्यापार की नहीं, आम जेब की भी बात बन जाती है।
सरलता का मतलब क्या वाकई सरलता
सरलता एक खूबसूरत शब्द है। पर सवाल यह है कि सरकार जिस सरलता की बात कर रही है, उसका मतलब क्या सिर्फ फॉर्मों की भाषा बदलना है या उस सोच को बदलना है जिसमें अफसर और व्यापारी आमने सामने खड़े हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में आयकर और कर व्यवस्था में फेसलेस सिस्टम आया। बहुत से लोगों ने कहा कि अब डर कम हुआ है। कम से कम चेहरे का डर तो कम हुआ। पर क्या कस्टम्स में भी वही तजुर्बा आसानी से दोहराया जा सकता है। कस्टम्स सिर्फ कागजों का खेल नहीं है, यहां कंटेनर हैं, बंदरगाह हैं, सीमाएं हैं, और कई एजेंसियां एक साथ काम करती हैं। यहां हर देरी का मतलब पैसा फंसा रहना है। इसलिए सरलता का मतलब सिर्फ सॉफ्टवेयर नहीं, समय की भी बचत है।
टैक्स आतंक से कस्टम्स आतंक तक का रास्ता
कुछ साल पहले तक आयकर को लेकर एक सीटकारा सा चलता था कि टैक्स आतंक है। लोग डरते थे, नोटिस से घबराते थे। सरकार ने उस छवि को बदलने की कोशिश की। अब वही सवाल कस्टम्स के आंगन में है। आयात करने वाला हर व्यापारी जानता है कि ड्यूटी की दरें, जांच की प्रक्रिया और क्लियरेंस का वक्त कभी कभी कारोबार की सांस रोक देता है। सरकार अगर कहती है कि वह वही पारदर्शिता यहां भी लाना चाहती है, तो यह बड़ा दावा है। लेकिन दावा और दवा में फर्क होता है। दवा अगर सही जगह और सही मात्रा में न पहुंचे तो वह रोग को भी बिगाड़ देती है।
ड्यूटी दरों का तर्क और उद्योग की उम्मीद
वित्त मंत्री ने साफ कहा कि कुछ उत्पादों पर शुल्क अभी भी तर्कसंगत सीमा से ऊपर है। यह बात उद्योग जगत के कानों में जैसे मिठास घोल देती है। आयात करने वाले सोचते हैं कि लागत घटेगी, निर्यात करने वाले सोचते हैं कि कच्चा माल सस्ता मिलेगा। पर यहां एक दूसरा पहलू भी है। ड्यूटी सिर्फ राजस्व का साधन नहीं होती, वह नीति का औजार भी होती है। किसी पर ज्यादा ड्यूटी लगाना कभी कभी घरेलू उद्योग को बचाने के लिए होता है। अगर हर जगह कटौती कर दी गई तो सवाल उठेगा कि क्या हम अपने छोटे उद्योगों को खुले मैदान में छोड़ रहे हैं।
रुपये की कमजोरी और कस्टम्स का रिश्ता
रुपया इस साल डॉलर के मुकाबले कमजोर रहा। यह कोई छुपी हुई बात नहीं है। जब आयात महंगा होता है, तो कस्टम्स सिस्टम का असर और गहरा हो जाता है। अगर ड्यूटी ऊंची और प्रक्रिया धीमी हो तो व्यापारी दो तरफ से दबाव झेलता है। सरकार कह रही है कि रुपया अपना प्राकृतिक स्तर खुद खोज लेगा। यह अर्थशास्त्र की किताब में ठीक लगता है। पर बाज़ार में बैठा कारोबारी यह सवाल करता है कि जब तक वह स्तर मिलेगा, तब तक उसका कारोबार किस सहारे चलेगा। ऐसे में कस्टम्स सुधार का वादा उस पर एक उम्मीद की चादर डालता है।
विकास दर का आत्मविश्वास और ज़मीन का सच
सरकार को भरोसा है कि विकास दर सात प्रतिशत के आसपास रहेगी। पिछली तिमाही में यह आठ से ऊपर थी। आंकड़े हिम्मत देते हैं। पर गांव और कस्बों में बैठा छोटा कारोबारी जब देखता है कि उसका माल अटका हुआ है, तब वह इन आंकड़ों से नहीं, बल्कि अपने बैंक खाते से सवाल करता है। कस्टम्स सुधार तभी सफल माना जाएगा जब आंकड़ों का आत्मविश्वास और ज़मीन का सच एक दूसरे से टकराने की बजाय एक दूसरे का हाथ थाम लें।
व्यापार सुगमता और भ्रष्टाचार का सवाल
सरकार कहती है कि कस्टम्स में सुधार से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। यह बात सुनने में अच्छी लगती है। पर हमारे यहां भ्रष्टाचार सिर्फ सिस्टम की खामी नहीं, बल्कि इंसान की आदत भी है। अगर पारदर्शिता सिर्फ स्क्रीन तक सीमित रही और ज़मीनी अफसर का विवेक वही पुराना रहा, तो सुधार आधा रह जाएगा। हालांकि यह भी सच है कि टेक्नोलॉजी ने बहुत सी जगहों पर डर को कम किया है। जब सब कुछ रिकॉर्ड में होता है तो मनमानी मुश्किल होती है। कस्टम्स में यही प्रयोग अगर ईमानदारी से हुआ, तो यह एक मिसाल बन सकता है।
इज ऑफ डूइंग बिजनेस की असली परीक्षा
सरकार सालों से कहती आई है कि उसने व्यापार सुगमता में बड़ा सुधार किया है। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भी सुधार आया है। पर किसी उद्यमी से पूछिए कि उसका असली अनुभव क्या है। बहुत से लोग आज भी कहते हैं कि लाइसेंस, क्लीयरेंस और निरीक्षण का जाल उनका समय खाता है। कस्टम्स उसी जाल का एक अहम सिरा है। अगर वहां गांठ ढीली होती है, तो पूरा जाल थोड़ा ढीला महसूस होगा। लेकिन अगर वही गांठ और कस गई, तो बाकी सुधार भी फीके पड़ जाएंगे।
वैश्विक हालात और घरेलू फैसले
दुनिया इस वक्त उथल पुथल से गुजर रही है। युद्धों का असर तेल से लेकर अनाज तक पड़ा है। ऐसे समय में कोई भी देश अपनी सीमा शुल्क नीति को पूरी तरह खुले हाथ से नहीं बदलता। सरकार को घरेलू उद्योग, राजस्व और विदेशी दबाव के बीच संतुलन साधना होता है। कस्टम्स सुधार इसी संतुलन की परीक्षा है। बहुत आसानी से कह देना कि सब सरल कर देंगे, राजनीतिक रूप से आकर्षक है। लेकिन अर्थशास्त्र में आकर्षण से ज्यादा अहम संतुलन होता है।
बड़े उद्योग और छोटे कारोबारी का फर्क
जब भी ड्यूटी घटती है या प्रक्रिया सरल होती है, इसका फायदा अक्सर पहले बड़े उद्योग उठाते हैं। उनके पास सलाहकार होते हैं, सिस्टम समझने वाले लोग होते हैं। छोटा कारोबारी अक्सर रास्ता ढूंढते ढूंढते ही थक जाता है। अगर कस्टम्स सुधार सच में सबके लिए है, तो उसे छोटे व्यापारी की भाषा में भी आसान बनाना होगा। सिर्फ अंग्रेजी में लिखे नियमों को सरल कह देना काफी नहीं होगा। वहां ऐसी प्रक्रिया चाहिए जो फोन पर भी समझ आ जाए, और काउंटर पर भी।
फेसलेस सिस्टम की छाया कस्टम्स पर
आयकर में फेसलेस सिस्टम ने अफसर और करदाता के बीच की दूरी बदली है। कस्टम्स में भी ऐसी ख्वाहिश दिख रही है। पर यहां एक फर्क है। आयकर में फाइल कागज पर और अब स्क्रीन पर चलती है। कस्टम्स में माल चलता है। माल की जांच, एक्स रे, सैंपलिंग, यह सब इंसानी हाथ से जुड़ा हुआ है। यहां फेसलेस का मतलब पूरी तरह बेचेहरा नहीं हो सकता। इसलिए सरकार को यह समझना होगा कि यहां तकनीक के साथ भरोसे की भी जरूरत है।
राजस्व का डर और सुधार की हिम्मत
हर वित्त मंत्रालय के मन में एक डर रहता है कि कहीं सुधार से राजस्व न घट जाए। कस्टम्स एक बड़ा स्रोत है। अगर ड्यूटी घटेगी, तो पहली नजर में सरकार की कमाई कम लगेगी। पर लंबी दूरी में व्यापार बढ़ेगा तो राजस्व भी बढ़ेगा। यह एक तरह का जुआ है। सरकार इस जुए में कितनी हिम्मत दिखाती है, वही तय करेगा कि यह सुधार सिर्फ फाइलों में रहेगा या सड़क पर भी दिखेगा।
राजनीति और अर्थनीति का संगम
कस्टम्स सुधार की बात सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी है। बजट से पहले यह संकेत देना कि बड़ा क्लीन अप आने वाला है, एक संदेश है मतदाताओं और उद्योग दोनों के लिए। संदेश यह कि सरकार रुकी नहीं है, वह लगातार बदल रही है। पर विपक्ष यह सवाल भी पूछ सकता है कि जब इतने सालों से सरकार में हैं, तो अब जाकर यह याद क्यों आया। यह बहस लोकतंत्र का हिस्सा है, और शायद इसी बहस से सुधार की दिशा और साफ होगी।
आम आदमी पर इसका असर
कस्टम्स का नाम सुनकर आम आदमी सोचता है कि यह तो बंदरगाह की बात है। पर जब मोबाइल सस्ता होता है, दवाई की कीमत घटती है या कार के पुर्जे सस्ते मिलते हैं, तब कस्टम्स सीधे जेब से जुड़ जाता है। अगर सुधार से आयात सस्ता हुआ, तो बाजार में कुछ राहत दिख सकती है। लेकिन अगर राजस्व की कमी भरने के लिए कहीं और कर बढ़ा दिए गए, तो यह राहत छिन भी सकती है। इसलिए आम आदमी के लिए यह का गणित सीधा नहीं, टेढ़ा है।
सुधार का असली पैमाना क्या होगा
सवाल यह नहीं है कि कस्टम्स सिस्टम बदला या नहीं, सवाल यह है कि कितना बदला। असली पैमाना यह होगा कि एक कंटेनर को क्लियर होने में कितना वक्त लगा, कितने चक्कर लगाने पड़े, और कितनी चाय पानी की चर्चा हुई। अगर यह सब घटा, तो समझिए कि सुधार सफल हुआ। अगर यह सिर्फ प्रेस रिलीज तक सीमित रहा, तो यह एक और अधूरी कहानी बन जाएगी।
सरकार के दावे पर एक स्वस्थ संदेह
सरकार का दावा है कि उसने पिछले वर्षों में कई कठिन चुनौतियों को संभाला। महामारी, युद्धों का असर, सीमाई तनाव, सब गिनाए जाते हैं। यह सच है कि इन हालात में अर्थव्यवस्था को संभालना आसान नहीं था। पर हर सरकार अपने कामों का सबसे अच्छा चेहरा दिखाती है। एक पत्रकार और नागरिक के तौर पर हमारा काम है कि उस चेहरे के पीछे के दाग भी देखें। कस्टम्स सुधार पर भी वही नजर जरूरी है।
बजट २०२६ की तरफ जाती निगाहें
अब सारी निगाहें इस बात पर हैं कि बजट २०२६ में सरकार क्या कदम उठाती है। क्या ड्यूटी दरें सच में घटेंगी। क्या स्लैब कम होंगे। क्या प्रक्रिया का वक्त आधा होगा। या फिर यह सब सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रहेगा। बजट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं होता, वह सरकार की नीयत का आईना होता है। कस्टम्स सुधार उसी आईने में सबसे साफ दिखने वाला चेहरा बन सकता है।
एक खुला सवाल
कस्टम्स सिस्टम को आसान बनाने का वादा उम्मीद जगाता है। पर हर उम्मीद के साथ एक सवाल भी चलता है। क्या यह सुधार ज़मीन तक पहुंचेगा। क्या इससे छोटे व्यापारी को भी वही राहत मिलेगी जो बड़े उद्योग को मिलती है। क्या पारदर्शिता सच में बढ़ेगी या सिर्फ कागजों में चमकेगी। इन सवालों का जवाब आने वाला साल देगा। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि सरकार ने एक बड़ी दिशा की ओर इशारा किया है। अब देखना यह है कि वह दिशा सिर्फ नक्शे पर रहती है या सड़क बनकर हमारे सामने आती है।






