
Thick smog over Delhi NCR highlighting air pollution emergency – Shah Times
दिल्ली एनसीआर में स्मॉग क्यों लौट आया,कोहरा प्रदूषण और हमारी लापरवाही
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
दिल्ली एनसीआर में बढ़ती ठंड के साथ लौटा घना कोहरा और जहरीली धुंध सिर्फ मौसम की खबर नहीं है। यह हमारे शहरी जीवन, नीतियों और आदतों पर सीधा सवाल है। यह विश्लेषण हवा की गुणवत्ता, बदलते मौसम और हमारी जिम्मेदारी को संतुलित नजर से देखता है।
शहर की सुबह और एक कड़वी सच्चाई
दिल्ली की सुबह अब चाय की भाप और अखबार की खुशबू से नहीं खुलती। खिड़की से बाहर देखिए तो धुंध की मोटी परत दिखाई देती है, जो सूरज को भी शर्मिंदा कर देती है। सड़क पर चलती गाड़ियां धीमी हैं, हॉर्न कम बज रहे हैं, लेकिन सांसें भारी हैं। यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं है। यह रोज का अनुभव बन चुका है। जब एक्यूआई चार सौ के पार जाता है, तब यह आंकड़ा नहीं रहता, यह शरीर में उतरने वाली थकान बन जाता है।
आंकड़ों से आगे की कहानी
आनंद विहार, गाजीपुर, आईटीओ या वजीरपुर जैसे नाम अब सिर्फ इलाके नहीं रहे। ये चेतावनी के संकेत बन चुके हैं। चार सौ से ऊपर का स्तर गंभीर कहा जाता है, लेकिन सवाल यह है कि गंभीर किसके लिए। उस बच्चे के लिए जो स्कूल बस का इंतजार कर रहा है, या उस बुजुर्ग के लिए जो सुबह की सैर को जीवन मानता है। आंकड़े बताते हैं कि हालात खराब हैं, लेकिन अनुभव बताता है कि हालात सामान्य मान लिए गए हैं।
कोहरा, धुंध और भ्रम
अक्सर कहा जाता है कि यह तो ठंड का मौसम है, कोहरा तो होगा ही। यही सबसे बड़ा भ्रम है। कोहरा और प्रदूषण का फर्क समझना जरूरी है। कोहरा प्रकृति की प्रक्रिया है, लेकिन जहरीली धुंध हमारी बनाई हुई है। जब दोनों मिलते हैं, तब दृश्यता ही नहीं, समझ भी धुंधली हो जाती है। लोग मौसम को दोष देकर राहत ढूंढ लेते हैं, जबकि असल जिम्मेदारी कहीं और है।
वाहन, विकास और विरोधाभास
दिल्ली में वाहन बढ़े हैं, यह किसी से छुपा नहीं। हर परिवार में दो गाड़ियां अब सुविधा नहीं, जरूरत मानी जाती हैं। हम चाहते हैं कि सड़कें चौड़ी हों, सफर तेज हो, लेकिन हवा साफ रहे। यह विरोधाभास हमारे रोजमर्रा के फैसलों में छुपा है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की समिति बनना एक जरूरी कदम है, लेकिन समिति तब तक कागज ही रहेगी, जब तक उसकी सिफारिशें सड़क पर न दिखें।
नीतियां और उनका अधूरापन
नीतियां बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन क्रियान्वयन अक्सर कमजोर पड़ जाता है। कभी ऑड ईवन आता है, कभी निर्माण पर रोक लगती है। कुछ दिन राहत मिलती है, फिर वही हालात। यह सवाल उठता है कि क्या हम दीर्घकालिक सोच से डरते हैं। प्रदूषण नियंत्रण कोई तात्कालिक अभियान नहीं, यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
मौसम का बदलता मिजाज
इस साल ठंड देर से आई, लेकिन तीखी आई। मानसून का व्यवहार भी अनियमित रहा। कभी बारिश कम, कभी अचानक बाढ़। मौसम वैज्ञानिक इसे बदलते पैटर्न का संकेत मानते हैं। यह बदलाव सिर्फ किताबों की बात नहीं है। यह हमारे शहरों, खेतों और शरीर पर असर डाल रहा है। जब हवा ठहर जाती है, तो प्रदूषक नीचे ही फंसे रहते हैं। यही दिल्ली में हो रहा है।
स्वास्थ्य पर चुप असर
प्रदूषण का असर तुरंत अस्पताल की कतारों में नहीं दिखता, लेकिन यह धीरे धीरे शरीर को कमजोर करता है। अस्थमा, एलर्जी, आंखों में जलन अब आम शिकायतें हैं। डॉक्टर सलाह देते हैं कि बाहर कम निकलें, मास्क पहनें। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक शहर हमेशा मास्क में रह सकता है। यह सलाह जरूरी है, समाधान नहीं।
आम नागरिक की भूमिका
अक्सर उंगली सरकार की तरफ उठती है, और उठनी भी चाहिए। लेकिन आम नागरिक की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हम कचरा जलाते हैं, छोटी दूरी के लिए भी गाड़ी निकालते हैं, पेड़ों को जगह की रुकावट मानते हैं। फिर साफ हवा की मांग करते हैं। यह दोहरा रवैया हमें खुद से पूछने पर मजबूर करता है।
क्या विकास की कीमत यही है
यह तर्क दिया जाता है कि बड़े शहरों में प्रदूषण तो होगा ही। यह कीमत है विकास की। लेकिन दुनिया के कई शहर इस तर्क को गलत साबित कर चुके हैं। बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सख्त नियम और नागरिक भागीदारी से फर्क पड़ा है। दिल्ली भी यह कर सकती है, अगर इच्छा हो।
राजनीति और प्रदूषण
हर सर्दी में प्रदूषण राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। आरोप प्रत्यारोप होते हैं, पड़ोसी राज्यों पर दोष डाला जाता है। पर हवा सीमाएं नहीं मानती। राजनीति का धुआं भी हवा को और जहरीला करता है। जरूरत है सहयोग की, न कि दोषारोपण की।
छोटे कदम और बड़ी उम्मीद
अगर हर व्यक्ति हफ्ते में एक दिन गाड़ी न निकाले, अगर कार्यालय समय लचीला हो, अगर निर्माण नियम सख्ती से लागू हों, तो फर्क पड़ेगा। ये छोटे कदम हैं, लेकिन सामूहिक रूप से बड़े असर वाले हैं। उम्मीद इसी में है कि समाधान भी साझा होगा।एक चेतावनी, एक मौका
दिल्ली की जहरीली हवा सिर्फ संकट नहीं, एक चेतावनी है। यह मौका है अपने शहर को नए सिरे से सोचने का। सवाल यह नहीं कि हवा कब साफ होगी, सवाल यह है कि हम कब गंभीर होंगे। अगर अब भी नहीं, तो अगली पीढ़ी को धुंध के अलावा क्या विरासत मिलेगी।






